two kids are fighting
Gali ke Jhagde

Summary: माँ की समझदारी बनाम दादी का गुस्सा

राहुल और अंकित के गली के झगड़े में बच्चों की भावनाओं, गुस्से और संवेदनशीलता का संघर्ष उभरता है। सीमा की समझदारी और प्यार से परिवार सीखता है कि डर या धमकी नहीं, बल्कि संवाद और सहानुभूति ही असली ताकत है।

Hindi Motivational Story: धूप तेज़ थी, लेकिन गलियों में बच्चों की चहल-पहल और खिलखिलाहट का सैलाब गली के कोने तक पहुँच रहा था। राहुल, नौवीं का लड़का, अपनी लंबी कद-काठी और तेज़-तर्रार चाल में खड़ा था। उसकी नजरें वही छोटी-प्यारी अंकित पर टिकी थीं, जो पांचवीं में पढ़ता था। अंकित संवेदनशील और भावुक था; छोटी-सी बात पर भी उसका दिल टूट जाता।

आज भी मामला वैसा ही था। राहुल गुस्से में था। उसने गलती से या जानबूझकर अंकित का खिलौना छीना।

“अरे, छोड़ो यार!” अंकित चीखा, पर आवाज़ कांप रही थी।

“क्या छोड़ूँ? ये मेरा है!” राहुल ने गुस्से में धक्का दिया। अंकित असंतुलित होकर गिर पड़ा और दर्द से फर्श पर पड़ा। राहुल ने बिना सोचे-समझे उसके पेट पर लात मार दी।

“आह! मम्मी!” अंकित की आवाज़ में डर और दर्द का मिश्रण था।

सीमा, अंकित की माँ, दौड़ती हुई आई। “राहुल! क्या कर रहे हो तुम? उठाओ इसे!” उसने जोर से कहा। उसके शब्दों में डर नहीं था, बल्कि नियंत्रण और समझदारी की ताकत थी। उसने अंकित को गोद में उठाया और धीरे से सहलाया।

तभी अंकित की दादी वहाँ आईं। “पुलिस बुलाओ! ये बच्चा घायल हो गया, राहुल को सज़ा मिलनी चाहिए!” उनकी आवाज़ ने पूरी गली में हलचल मचा दी। अंकित डर के मारे अपनी माँ की गोद से चिपक गया।

“दादी, प्लीज… इसे डराने से क्या होगा?” सीमा ने शांत होकर कहा, लेकिन दादी की आंखें आग उगल रही थीं।

राहुल भी खड़ा था, आँखों में गुस्सा और कुछ डर। वह जानता था कि उसने गलती की, लेकिन ताकत दिखाने का संतोष भी उसके चेहरे पर था।

Hindi Motivational Story-A old woman Scolding Kid
A old woman Scolding Kid

“अंकित, डर मत। ये सिर्फ झगड़ा है, हम संभाल लेंगे,” सीमा ने फुसफुसाया। अंकित ने हिचकिचाते हुए सिर हिलाया।

राहुल की माँ ने भी आकर कहा, “देखो, बच्चे हैं, गलती हो गई। हम सिखा देंगे कि झगड़ा क्यों नहीं करना चाहिए।”

सीमा ने राहुल के पास जाकर कहा, “तुम्हें गुस्सा आता है, हम इसे समझ सकते हैं। लेकिन किसी को चोट पहुँचाना समाधान नहीं है।”

“पर मम्मी, वो हमेशा मुझे चिढ़ाता है!” राहुल ने नाराज़ होकर कहा।

“तो क्या हमें दूसरों को चोट पहुँचानी चाहिए?” सीमा ने धैर्य से पूछा।

अंकित की दादी ने चिल्लाया, “बिलकुल नहीं! अब तो पुलिस बुलाऊँगी। ये बच्चा घायल हुआ है, और तुम बस बहाने बना रहे हो!”

अंकित छोटे-छोटे कदमों से पीछे हट गया। “मम्मी… डर लग रहा है…” उसकी आवाज़ कांप रही थी। सीमा ने उसे गले लगाते हुए कहा, “कोई डर नहीं, हम सब हैं न।”

गली में लोग रुके, कुछ छतों से झाँक रहे थे, और कुछ बच्चे चुपचाप देख रहे थे। माहौल गहन और तनावपूर्ण था।

सीमा ने दोनों परिवारों को समझाने की कोशिश की। “देखिए, बच्चों की मनोस्थिति बहुत नाजुक होती है। अंकित का रोना केवल डर और चोट की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उसकी संवेदनशीलता का संकेत है। और राहुल का गुस्सा… यह केवल ताकत दिखाने की प्रवृत्ति है। हमें इसे समझना होगा, सिर्फ सज़ा देने से कुछ नहीं होगा।”

राहुल की माँ ने झुकी हुई आवाज़ में कहा, “हमें उसे यह समझाना होगा कि गुस्सा और हिंसा का परिणाम क्या होता है।”

दादी ने गर्दन घुमा कर कहा, “समझाना? अब तो पुलिस ही सही जवाब है।”

सीमा ने गहरी सांस ली, आँखों में हल्की नमी और आवाज़ में दृढ़ता के साथ कहा, “दादी, मैं आपको बस एक बात समझाना चाहती हूँ। ये उम्र — किशोरावस्था — ऐसी होती है। गुस्सा आना, जल्दी चिढ़ना, छोटी बात पर प्रतिक्रिया देना… ये सब स्वाभाविक है। अंकित भी संवेदनशील है, यह भी स्वाभाविक है। हम बच्चों को डर और धमकी से नहीं, बल्कि प्यार और समझदारी से संभाल सकते हैं।”

दादी ने सख्ती से कहा, “पर उसने चोट पहुँचाई!”

सीमा ने आँसू भरी हल्की मुस्कान के साथ कहा, “दादी, सोचिए… कल आपका अपना बच्चा बड़ा होगा। वह भी कभी-कभी किसी से झगड़ा करेगा, कभी-कभी गलत निर्णय लेगा। और आप वही करेंगी जो आज कर रही हैं — डराएँगी, धमकाएँगी। आप क्या उम्मीद करेंगी कि बच्चा तब कैसे सीखेगा? हम सबको समझना होगा कि बच्चों के मनोविज्ञान को समझना, उनकी भावनाओं को पढ़ना, यही असली परिवारिक शिक्षा है।”

दादी की आँखों में अब हल्की शर्म और समझदारी झलकने लगी।

सीमा ने अंकित को गले लगाते हुए राहुल के हाथ को थामते हुए कहा, “देखिए, बच्चे हैं। गलती करना स्वाभाविक है। राहुल, गुस्सा आना स्वाभाविक है, लेकिन इसे सही दिशा में इस्तेमाल करना सीखो। अंकित, डर लगना सामान्य है, लेकिन अपनी बात हमेशा कह सकते हो। यही उन्हें मजबूत बनाता है।”

धीरे-धीरे माहौल ठंडा हुआ। गली में हल्की हवा चली और बच्चों की हँसी फिर से गली में गूँजने लगी। राहुल और अंकित ने आंखों में समझदारी और हल्की शर्म के साथ एक-दूसरे को देखा। अब उन्हें पता था कि झगड़ा केवल पल का होता है, लेकिन समझदारी और संवेदनशीलता स्थायी होती है।

सीमा ने दादी को देखते हुए कहा, “दादी, समझिए… यह सिर्फ आज की घटना नहीं है। यह उनकी जिंदगी का हिस्सा है। अगर हम अब समझदारी और संवेदनशीलता दिखाएँ, तो कल के लिए उन्हें मजबूत बनाते हैं। याद रखिए, शक्ति केवल दिखावे में नहीं, संवेदनशीलता और समझदारी में है। यही असली ताकत है।”

दादी ने धीरे-धीरे सिर हिलाया। उनकी आँखों में अब सख्ती नहीं, बल्कि हल्की नरमी और स्वीकृति थी।

सीमा ने अंत में कहा, “हम सभी का दायित्व है कि हम बच्चों को डर और धमकी से नहीं, बल्कि प्यार, समझ और संवाद से मार्गदर्शन दें। यही परिवार की असली शिक्षा है। यही हमें सीख देती है कि कल जब हमारे बच्चे बड़े होंगे, तो हम उन्हें समझकर ही उनकी गलतियों से सीखने देंगे।”

गली में फिर से बच्चों की हँसी गूँजने लगी, लेकिन अब एक नई सीख के साथ — कि गलती होना स्वाभाविक है, गुस्सा होना भी, लेकिन समझदारी और संवेदनशीलता ही उन्हें जीवन में सही निर्णय लेने की ताकत देती है। जीवन में हर बच्चा अपनी गति से सीखता है। कभी वह गुस्से में प्रतिक्रिया करेगा, कभी डर या शर्म के कारण पीछे हट जाएगा। लेकिन प्यार, समझदारी और सही मार्गदर्शन से उसकी सोच, आत्मविश्वास और संवेदनशीलता विकसित होती है। परिवार का दायित्व केवल नियम और सज़ा नहीं, बल्कि बच्चों के भावनात्मक विकास को समझना भी है। जब हम उन्हें सुनते हैं, उनके मन की परतों को पहचानते हैं और उन्हें सिखाते हैं कि गलती करने में डरने की जरूरत नहीं, तभी वे जीवन में स्थायी ताकत और निर्णय लेने की क्षमता हासिल करते हैं। यही असली शिक्षा है।

राधिका शर्मा को प्रिंट मीडिया, प्रूफ रीडिंग और अनुवाद कार्यों में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखती हैं। लेखन और पेंटिंग में गहरी रुचि है। लाइफस्टाइल, हेल्थ, कुकिंग, धर्म और महिला विषयों पर काम...