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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

कुसुम दुबक कर अपनी मां की गोद में छिप गई। आज फिर गाँव में चीलगाड़ी आयी है। यह चीलगाड़ी जब भी गाँव में आती है, खूब धूल उड़ाती है। आवाज भी खूब करती है। पूरे गाँव में इतनी बड़ी एक भी गाड़ी नहीं है। मात्र तीन साल की कुसुम को इस चीलगाड़ी से बहुत डर लगता है। जब भी वो रोती है, खाना नही खाती है या फिर किसी चीज के लिए हठ करती है। राजू भैया जो उससे तीन साल बड़े है उसे इस चीलगाड़ी के नाम से डराने लगते हैं। कहते- “इसमें झोलू बाबा बैठा है जो तुझे अपने झोले में भरकर दूसरे देश ले जाएगा। वहाँ अम्माँ- बाबूजी, भैया कोई नहीं होगा।” कुसुम बहुत डर जाती और चुप हो जाती या जल्दी-जल्दी बिना चबाये ही खाना गिटक जाया करती। माँ राजू को ऐसा करने से मना करती। कहती- “इस तरह चीलगाड़ी यानि विमान और उसमें बैठने वाले यात्रियों को लेकर कुसुम के बाल मन में डर बैठ जाएगा जो निकाले नहीं निकलेगा। बचपन का डर बाद में बड़ा दुखकारी होता है। इसलिए मत डराया कर।” पर राजू को तो मजा आता था और जब गोरी-गोरी, गोल-गोल, गब्दू-गब्दू कुसुम तुतलाते हुए “भैया मुझे दर लगता है” कहकर उससे चिपट जाया करती तो उसे बहुत अच्छा लगता था, फिर वो कुसुम को खूब प्यार करता। उस छोटे से गाँव में विमान का आना-जाना लगा रहता था। फिरंगी विमान से उस गाँव में आते और गाँव के बड़े भारी चर्च में दो-चार दिन रूककर चले जाते। क्यों आते थे, यह कोई नहीं जानता; सिवाय फादर के, जो चर्च में ही रहा करते थे।

कुसुम धीरे-धीरे बड़ी होने लगी थी। अब वो चौदह साल की हो गई। कुसुम जब तीन बरस की थी तभी से कुसुम की माँ चर्च में फिरंगियों के लिए खाना बनाती थी। विदेशी उसके काम से खुश होकर उसे खूब पैसा देते थे। इसलिए वहाँ का काम छोड़ने का विचार भी उसके मन में कभी नहीं आया। अक्सर वो कुसुम को अपने साथ ले जाती थी। बड़ी होने के साथसाथ कसम चर्च में मां के कामों में हाथ बंटाने लगी और अब तो कई बार माँ उसे अकेले ही भेज देती। अब तो कुसुम को चीलगाडी से डर भी नहीं लगता। उसे मालूम पड़ चुका था कि ये विमान है जिसमें बैठकर लोग एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। बसें सड़कों पर दौड़ती है और विमान आसमान में उड़ता है। उसे भी आसमान में उड़ने का मन करता। विमान की सीट बहुत आरामदायक होती है। सीट पर बैठे-बैठे ही खाना-पीना सब मिल जाता है। जेम्स से उसने सुन रखा था। जेम्स हमेशा कुसुम से कहता- “मैं तुम्हें उड़ा कर ले जाऊंगा; इसी विमान में, सात समुन्दर पार।”

जेम्स अठारह बरस का युवक था, जो विदेशियों के साथ ही आता था। इसी चर्च में रूकता। कुसुम को हमेशा कहता- “समुन्दर-सी तुम्हारी आँखों में डूब जाने को जी करता है। कुसुम ‘धत’ कहकर लजा जाती। कुसुम के पीठ पर लहराती काली नागिन-सी लंबी चोटी का तो वह दीवाना था। उसकी चोटी को खींचकर उसे खूब छेड़ता इस पर कुसुम रूठ जाया करती। तब जेम्स कान पकडकर सलीम की तरह उसके सामने बैठ जाता. उससे माफी मांगता। कुसुम भी अनारकली की तरह अपना बांया हाथ मटकाकर कहती” जाओ जहाँपनाह; मलिका ने तुम्हें माफ किया। फिर दोनों खिलखिलाकर हंस पड़ते। रूठने-मनाने का यह खेल पिछले दो बरस से चल रहा था।

तब कुसुम को पढ़ने-लिखने में रुचि नहीं थी। जेम्स उसे पढ़ने के लिए प्रेरित करता। उसे पढ़ाई का महत्व समझाता, पढ़ाई के फायदे बताता और कहता कि यदि वह नहीं पढ़ेगी तो जेम्स के साथ विदेश नहीं जा सकेगी इस पर कुसुम पढ़ने को तैयार हो जाती। फिर तो जब भी कुसुम को समय मिलता चर्च के काम समेटकर वो कॉपी किताब लेकर जेम्स के पास पढ़ने के लिए बैठ जाती। अब उसे पढ़ना अच्छा लगने लगा था। रंग-बिरंगे चित्रों वाली किताबों से पढ़ने के लिए अब कुसुम जल्दी-जल्दी चर्च का काम समेटती। अपने घर पर भी जब वो रहती उसे पढ़ते रहने का मन करता। जेम्स उसे पढ़ाता भी रोचक तरीके से था। आस-पास की वस्तुओं का उदाहरण देकर पाठ को सरल बना देता था ताकि कुसुम सब समझ सके। कुसुम को याद है; जेम्स ने उससे पूछा था -“सबसे पहले क्या लिखना सीखोगी तुम?” कुसुम ने तब तपाक से जवाब दिया था “चीलगाड़ी।” अब तो कुसुम चीलगाड़ी का पूरा इतिहास लिख सकती है। जेम्स जब कभी चीलगाड़ी में बैठकर अपने देश जाता, कुसुम के लिए रंग-बिरंगे चित्रों वाली किताब लाता। जिनमें बड़ी-बड़ी फैक्टरी, चीलगाड़ी, चौड़ी-चौड़ी सड़कें, और उन सड़कों पर कारों में सवार गोरी-गोरी, सुंदर-सुंदर, नीली-नीली आँखों वाली मेमसाहब की फोटू होती। कुसुम सोचती ‘भगवान ने इन्हें एकदम फुरसत के क्षणों में बनाया होगा। कितनी सुंदर है; ये सब मेमसाब’ वो जेम्स से भी कह डालती पर जेम्स को तो कुसुम के सिवाय कभी कोई न भाया।

अब तो दोनों साथ-साथ घूमने-फिरने लगे थे। कुसुम का सारा समय अब जेम्स के साथ ही बीतने लगा था। जेम्स के लिए खाना बनाना, उसे परोसना, उसका कमरा साफ करना, उसके कपड़े धोना, तह करना, उससे पढ़ना आदि सब काम कुसुम को बहुत अच्छा लगता था। माँ को जेम्स के साथ कुसुम का यह मेल-जोल, हंसना-बोलना, घूमना-फिरना अच्छा न लगता। वो कुसुम को मना करती। पर कुसुम कुछ न समझती। वह उमर तो होती ही है बेल की तरह; जिसे जो सहारा उस समय मिल जाए उसी से लिपट जाती है। माँ ने जेम्स को भी समझाया लेकिन जेम्स ने कहा कि वो कुसुम से ब्याह करना चाहता है। दोनों समझने को तैयार नहीं थे। हार कर माँ, पंच-सरपंच और पादरी को साथ लेकर जेम्स के पिता से बात करने पहुंची। पादरी ने जेम्स के पिता की राय जानना चाहा। जेम्स के पिता तैयार नहीं थे किन्तु बेटे की खुशी के खातिर मान गये और गाँव के चर्च में ही दोनों का विवाह हो गया।

जेम्स ने जिला कार्यालय में कुसुम का वीजा बनाने के लिए आवेदन कर दिया था। कुसुम बहुत खुश थी। उसे अपने सपनों का राजकुमार मिल गया था जो उसे चीलगाड़ी में बिठाकर सात समुंदर पार के देश ले जाएगा। वह सोचती चीलगाड़ी से सब कुछ कैसे दिखता होगा- उसकी झोपड़ी कैसे दिखेगी? इतनी ऊँचाई से राजू भैया और माँ कैसे दिखेंगें और बुधिया काकी, मंगलू काका सब भी तो दिखेंगें न! कितना अच्छा लगेगा, जब उसके साथ-साथ नदी-पहाड़, समुंदर भी चीलगाड़ी में बैठकर जेम्स के घर जाएंगे। विदेश! जेम्स उसकी बातें सुनकर हंस देता और कहता कि जब तुम बैठोगी खुद ही देख लेना।

इस बार जेम्स विदेश अकेले ही जा रहा था। कुसुम का वीजा और पासपोर्ट नहीं बन पाया था। अगली बार कुसुम का साथ जाना तय था। कुसुम को अच्छा नहीं लग रहा था किंतु और कोई उपाय भी नहीं था; फिर जेम्स पर उसे और मां के साथ-साथ पूरे गांव वालों को भी पूरा भरोसा था।

पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। जेम्स जिस प्लेन से जा रहा था वह क्रैश हो गया। एक भी यात्री नहीं बचे, जेम्स भी नहीं। कुसुम ने सुना तो बिलख-बिलख कर रो पड़ी। हाथों की चूड़ियाँ उसने तोड़ डाली, माथे का कुमकुम भी उसने पोंछ दिया। कुसुम की सुंदरता को प्रेम की नजर से देखने वाला जेम्स ही तो था। जेम्स नहीं तो अब कैसा बनाव-श्रृंगार, किसके लिए सजना- संवरना। किसे रिझाना, किसे लुभाना? जेम्स के साथ मिलकर कुसुम ने सैकड़ों सपने संजोयें थे। जेम्स के न रहने पर आज उसके सारे सपने बिखरकर चूर-चूर हो गये। उसकी स्थिति पागलों जैसी हो गई। वह अब जीना नहीं चाहती लेकिन उसे जीना पड़ेगा। जेम्स के बच्चे के लिए; जो उसकी कोख में पल रहा था।

जेम्स की मौत के बाद जेम्स के पिता आये थे; कुसुम को ले जाने के लिए। किन्तु कुसुम ने मना कर दिया। क्या करेगी अब वो विदेश जाकर? पराई जमीन, पराई भाषा, पराए लोग। जो उसका अपना था वो तो रहा नहीं अब इस दुनियाँ में। पढ़-लिखकर सब कुछ जानने लगी थी कुसुम।

चार बरस बीत गए। चीलगाड़ी की आवाज सुनकर सूरज दौड़ता हुआ आकर माँ की गोद में छिप गया। सूरज………जेम्स का बेटा! वही आँखें, वही सुनहरे बाल, वही गोरा रंग और जेम्स जैसा ही एकदम प्यारा। कुसुम ने प्यार से उसके बालों में हाथ फेरा और उसे उठाकर बाहर ले आई, चीलगाड़ी दिखाने। वो नहीं चाहती कि सूरज विमान से डरे। जेम्स का बेटा है फिर चीलगाड़ी से डर कैसा?

कुसुम अतीत की यादों में खो गई। सूरज के जन्म के समय कुसुम मात्र सोलह बरस की थी। वह उम्र बच्चा जनने का नहीं था। उसका शरीर इसके लिए तैयार नहीं था। इसलिए बहुत तकलीफ के बाद सूरज का जन्म हुआ था। उसके जन्म के बाद भी कुसुम की तकलीफ कम नहीं हुई। शरीर तो किसी तरह संभल गया लेकिन अब जीवन कैसे कटे? कुसुम के सामने पूरी जिंदगी पड़ी थी और अब उसे अकेले ही इस जिंदगी से लडाई लड़नी थी।

जेम्स ने कुसुम से वादा लिया था कि अब वह किसी की चाकरी नही करेगी। जेम्स को दिए वचन के खातिर कुसुम अब कोई सम्मानजनक काम करना चाहती थी। जेम्स का पढाया आखिर किस दिन काम आता? उसने तय किया कि गाँव में रहकर ही अब वह बच्चों और प्रौढ़ों को पढ़ायेगी। गाँव में यूँ भी शिक्षा की कमी थी। कोई गुरुजी पढ़ाने आते भी तो सब तरह की सुविधा न होने के कारण दो-चार माह में अपना तबादला करवा कर चले जाते इसलिए चाहकर भी सब लड़के-बच्चे पढ़ नही पाते और प्रौढ़ों के लिए तो कुछ व्यवस्था थी ही नहीं। माँ से कहकर कुसुम ने सबको बुलावा भेज दिया।

शाम को सब लोग कुसुम के घर इकट्ठे हो गए। कुसुम उसी गाँव की बेटी थी। कुसुम के साथ हुए हादसे को सब लोग जानते थे। कुसुम ने सबको पढ़ाई का महत्व बतलाते हुए कहा कि पढ़ाई का जीवन से बहुत गहरा नाता है। यह संसार एक युद्धभूमि है जहाँ हमें हर रोज एक नई लड़ाई लड़नी पड़ती है। इस लड़ाई के लिए पहले अपने आपको तैयार करना पड़ता है। शिक्षा वो अस्त्र है जिसके जरिए हम बड़ी से बड़ी लड़ाई लड़ सकते हैं और जीत भी सकते हैं। पहले मैनें भी शिक्षा के महत्व को नहीं समझा था किंतु जेम्स के नहीं रहने के बाद मुझे सब समझ आ रहा है। मुझे तो जेम्स ने इसके लिए तैयार कर दिया था किंतु क्या आप सब तैयार हैं: विपरीत स्थिति आने पर पढ़-लिखकर उससे जूझने के लिए? अपनी बात जारी रखते हुए उसने आगे कहा कि सब दिन एक समान नहीं होता। कब कौन-सा संकट आ जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। इसलिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए। पढने-लिखने से समझदारी आती है। हर संकट से मुकाबला करने के लिए व्यक्ति तैयार रहता है। मेहनती तो तुम सब हो ही, पढ़ना लिखना भी आ जाएगा तो तुम अपने अधिकार के लिए लड़ भी सकोगे। कोई तुम्हारी धन-संपदा छीन नहीं सकेगा। और सबसे बड़ी बात-तुम अपनी संतानों को भी शिक्षा का महत्व बताकर देश के लिए अच्छे नागरिकों का निर्माण करने में सहायक बनोगे अतः अब मैं तुम लोगों को पढ़ाऊंगी। तुम सब रोज काम निपटाकर शाम को पढ़ने आना और बच्चे सुबह पढ़ाई करेंगे। मुझे जेम्स ने पढ़ना-लिखना सीखा दिया है। अब तुम्हें भी सीखना है जिससे तुम सब भी अपना नाम-पता लिख सको। खत-वत लिख सको और गर्व से कह सको कि तुम्हें भी पढ़ना आता है।

सबने कुसुम की बात मान ली। दिन में बच्चे और शाम को सभी औरतें तथा पुरुष पढ़ने के लिए आने लगे। कुसुम का घर अब पाठशाला की तरह लगने लगा था। गाँव के मुखिया ने भी इस ओर ध्यान देना शुरू किया। उसके प्रयास से वहीं पर सरकारी जमीन मिल गई। जहाँ उन्होंने एक पाठशाला बनवा दिया। इधर समझदार कुसुम ने भी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन पत्र भेज दिया और कुछ परीक्षाओं को पास करने के बाद अब वो सरकारी शिक्षक बन गई थी। पंच ने कोशिश करके गाँव में ही उसकी पदस्थापना करवा दी। परिणाम बहुत सुखद रहा। कुछ वर्षों में गाँव के अधिकांश लोग पढ़-लिखकर काबिल बन गए। उस गाँव में अब कोई गुमनाम जिंदगी नहीं जी रहा था। सबका नाम था, सबकी पहचान थी। कुछ लोग गाँव में ही नौकरी कर रहे थे, तो कुछ गाँव के बाहर। लेकिन जब कभी गाँव आते ‘कुसुम दीदी’ से मिलना नहीं भूलते। सूरज भी तो हाईस्कूल तक की पढ़ाई वहीं करके बाहर चला गया था; आगे की पढ़ाई करने के लिए। दरअसल सरकारी नौकरी मिलने के बाद कुसुम की अच्छी आमदनी होने लगी थी। हाथ में पैसा आने पर कुसुम ने बेटे के बारे में सोचना शुरू कर दिया और उसे पढ़ाने के लिए शहर के एक बड़े स्कूल में भेज दिया। सूरज पढ़ाई में होशियार तो था ही अतः उसे छात्रवृत्ति मिलने लगी। बाद में उसका खत आया था कुसुम के पास कि जिस कॉलेज में उसने पढ़ाई पूरी की थी उसी कॉलेज ने उसे नौकरी भी दे दी। अब उसके अच्छे काम और ईमानदारी से खुश होकर आगे के काम और पढ़ाई के लिए सरकार उसे विदेश भेज रही है। समय कम है इसलिए वह अभी नहीं आ रहा है। लेकिन जल्दी ही आयेगा और माँ को भी अपने साथ ले जाएगा।

आज सूरज माँ को लेने आ रहा है, चीलगाड़ी में। कुसुम के कान चीलगाड़ी की आवाज सुनने को बेताब थे। चीलगाड़ी में बैठने की उसकी इस इच्छा को उसका बेटा पूरा कर रहा है। उसकी आँखों में एक बार फिर रंगीन सपने झिलमिला उठे थे। अपने आस-पास के वातावरण से वो पूरी तरह बेखबर थी। तभी अचानक उसके कानों में “माँ’ शब्द सुनाई पडा। कुसुम की तंद्रा टूटी। सूरज सामने खड़ा था; भोर के सूरज की भांति दप-दप करता। आत्मविश्वास से भरा हुआ; सुंदर कद-काठी तो थी ही। युवा होकर और भी निखर गया था। कुसुम उसे देखती रह गई। चीलगाड़ी कब आई; उसे पता ही नहीं चला। उसने बेटे को गले से लगा लिया।

दूसरे दिन देश-विदेश जाने वाली विमान ने जैसे ही उड़ान भरी, कुसुम को एहसास हुआ मानों वह बिना पंखों के ही हवा में हौले-हौले उड़ती चली जा रही है। जेम्स सामने मुस्कुराते हुए खड़ा है और उससे पूछ रहा है कि चीलगाड़ी में बैठकर उसे कैसा महसूस हो रहा है? उसने अपनी बंद पलकों को धीरे से खोला। एक नजर पास बैठे अपने बेटे सूरज पर डाला, जिसने आज उसके सपनों को साकार कर दिया था। वह फूली नहीं समा रही थी। वह खुश थी-बहुत खुश।

उसकी आँखों से झर-झर आँसू बह निकले। सूरज ने देखा-अपनी ऊंगली की पोर से माँ की आँखों से बहते आंसू को उसने पोछने का प्रयास किया किंतु माँ ने ऐसा करने से रोक दिया। आज इन आंसुओं को बह जाने देना चाहती थी वो। उसे मालूम था ये खुशी के आंसू हैं और इनके बहने से उसकी खुशियां कम नहीं होगीं अपितु बढ़ती ही जाएंगी।

वो खुश थी, बहुत खुश। सचमुच पिंजरे के इस पंछी को आज समूचा आसमान मिल गया।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’