Asthi Daan
Asthi Daan

Hindi Katha: प्राचीन काल में दधीचि नामक एक प्रसिद्ध ऋषि हुए। वे परम तपस्वी, विद्वान और श्रेष्ठ गुणों से सुशोभित थे । उनका विवाह गभस्तिनी नामक युवती से हुआ, जो अगस्त्य मुनि की पत्नी लोपामुद्रा की बहन थी । गभस्तिनी अपने पति का अनुसरण करती थी और उन्हीं के समान परम तपस्विनी थी। इस प्रकार वे दोनों गृहस्थ का पालन करते हुए भगवान् की आराधना में मग्न रहते थे।

एक दिन दधीचि मुनि के आश्रम पर भगवान् शिव, श्रीविष्णु, सूर्यदेव, इन्द्र, यम, अश्विनीकुमार, अग्नि, वरुण, कुबेर आदि देवगण पधारे। उस समय वे दैत्यों को युद्ध में पराजित करके वहाँ आए थे और इस कारण सभी बड़े प्रसन्न थे। महर्षि दधीचि ने उनका अतिथि सत्कार किया। फिर आसन पर बिठाकर उनकी स्तुति करते हुए बोले – “देवगण ! इस आश्रम में पधार कर आपने मुझे धन्य कर दिया। आपकी चरण- – धूलि से यह आश्रम पवित्र हो गया। मैं बड़ा सौभाग्यशाली हूँ, जो मुझे एक साथ आपके दर्शन प्राप्त हुए । मैं आपकी क्या सेवा करूँ?”

देवगण बोले – ” महर्षि ! आप पृथ्वी के कल्पवृक्ष हैं। आप जैसे श्रेष्ठ महर्षि की कृपा-दृष्टि होते हुए हमारे लिए जगत् में कौन-सी वस्तु दुर्लभ होगी? मुनिवर ! मनुष्यों का यही धर्म है कि वे तीर्थों में स्नान, समस्त प्राणियों पर दया और आप जैसे सत्पुरुषों का दर्शन करें। महर्षि ! इस समय हम एक विशेष कार्य से आपके पास आए हैं। कृपया हमारी बात ध्यानपूर्वक सुनें । हमने सभी पराक्रमी और क्रूर दैत्यों का संहार कर दिया है। इससे सभी प्राणी सुखी हैं। अब हमें इन दिव्य अस्त्र-शस्त्रों की कोई आवश्यकता नहीं है । अत: आप इन्हें आपने आश्रम में रख लें। मुनिवर ! यहाँ दैत्यों और राक्षसों का भय नहीं है। आपके तपोबल से आश्रम और इसके आस-पास का क्षेत्र पवित्र और सुरक्षित है। आपके पास ये अस्त्र-शस्त्र पूर्णतः सुरक्षित रहेंगे। आप इन्हें स्वीकार करें। ” परम दयालु दधीचि मुनि ने उन दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को अपने पास रख लिया।

तभी गभस्तिनी उन्हें रोकते हुए बोले ‘स्वामी ! यह कार्य संकट उत्पन्न करने वाला है। यदि आप देवताओं के अस्त्र-शस्त्र अपने आश्रम में रखेंगे तो उनके शत्रु आपसे भी शत्रुता करेंगे और यदि इनमें से कोई अस्त्र नष्ट अथवा चोरी हो गया तो ये देवगण भी कुपित होकर हमारे शत्रु बन जाएँगे। नाथ ! आप तो परम ज्ञानी और वेदों के ज्ञाता हैं। आप यह भली-भाँति जानते हैं कि पराई वस्तु को धरोहर के रूप में रखना तपस्वी मनुष्यों को शोभा नहीं देता। इसलिए आप यह कार्य न करें। “

पत्नी की बात सुनकर दधीचि बोले – “देवी ! देवगण ने यहाँ स्वयं आकर अपने आयुध रखने की प्रार्थना की है। वे हमारे अतिथि हैं और उनकी बात को अस्वीकार करना घर आए अतिथि को दुत्कार कर भगा देने जैसा है। अब चाहे कितने ही दुःख क्यों न आएँ, मैं सहर्ष भोगने के लिए तैयार हूँ।” यह कहकर उन्होंने वे अस्त्र-शस्त्र अपने आश्रम में रख लिए और देवगण अपने-अपने लोक चले गए।

कुछ समय बाद दैत्यों को भी यह ज्ञात हो गया कि देवगण ने अपने आयुध दधीचि मुनि के आश्रम में रखे हैं। वे उन्हें प्राप्त करने का प्रयास करने लगे। किंतु अपने मनोरथ में सफल नहीं हो सके।

एक दिन गभस्तिनी दधीचि मुनि से बोली -” स्वामी ! अनेक वर्ष बीत गए हैं, किंतु देवगण अपने आयुध ले जाना नहीं चाहते और इधर दैत्य भी हमसे शत्रुता करने लगे हैं। वे बड़े वीर, बलवान, तपस्वी और मायावी हैं। वे इन अस्त्र-शस्त्रों को अवश्य चुरा लेंगे। इसलिए आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे कि इन्हें चुराना दैत्यों के लिए असम्भव हो जाए। “

पत्नी की बात सुनकर दधीचि मुनि ने कुछ समय तक सोच-विचार किया। फिर अस्त्र-शस्त्रों को पवित्र जल से धोकर उस तेजयुक्त जल को स्वयं पी गए। तेजहीन हो जाने के कारण वे आयुध शक्तिहीन होकर समयानुसार नष्ट हो गए। कालांतर में एक दिन देवगण वहाँ आए और महर्षि दधीचि से बोले – ” मुनिश्रेष्ठ ! दैत्यों ने हम पर आक्रमण कर दिया है, हमें अपने अस्त्र-शस्त्रों की आवश्यकता है। कृपया हमारे आयुध हमें दे दीजिए, जिसके कि हम दैत्यों का संहार कर सकें। “

महर्षि दधीचि शांत स्वर में बोले – “देवगण ! आप अनेक वर्षों तक अपने आयुधों को लेने नहीं आए और इधर दैत्य उन्हें चुराने का प्रयास करने लगे । इसलिए उनके भय से उन अस्त्रों की शक्ति को मैं पी गया हूँ। वे मेरे शरीर में स्थित हैं। अत: अब आपको जो उचित लगे, कहें। ‘

देवगण पतिव्रता गभस्तिनी से डरते थे। किंतु उस समय वह आश्रम में नहीं थी। इसलिए अनुकूल अवसर जानकर वे याचना करते हुए बोले – ” महर्षि ! आपकी दयालुता की प्रशंसा बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और देवगण करते हैं। आप जैसे उदार और परम दयालु महापुरुष अपनी कौन- सी प्रिय वस्तु न्यौछावर नहीं कर सकते ? मुनिश्रेष्ठ ! इस समय सृष्टि के कल्याण के लिए हमें आपके शरीर की आवश्यकता है। यदि आप हमारी याचना स्वीकार करें तो तीनों लोक दैत्यों के अत्याचारों से मुक्त हो जाएँगे । यद्यपि ऐसा करना अत्यंत कठिन है, तथापि आप जैसे श्रेष्ठ महर्षि के लिए यह कोई असम्भव कार्य नहीं है । “

दधीचि मुनि मुस्कराते हुए बोले “देवेन्द्र ! जब एक दिन यह शरीर मुझे छोड़ने ही वाला है तो फिर मैं इसे रखकर क्या करूँगा? जो मनुष्य जन-कल्याण के लिए अपना शरीर प्रदान नहीं कर सकता, वह जीवित भी मृत के समान होता है । सृष्टि – कल्याण के लिए प्राण त्यागने से मुझे अवश्य श्रीविष्णु के चरणों में स्थान मिलेगा। यह लीजिए, मैं इसी क्षण अपना शरीर त्यागता हूँ। “

यह कहकर महर्षि दधीचि ने योग-विद्या द्वारा प्राण त्याग दिए ।

इन्द्र ने कुछ गौओं के मुख वज्र के समान कठोर बना दिए। उन गौओं ने देखते-ही-देखते दधीचि मुनि के शरीर को चाट-चाट कर हड्डियाँ निकाल लीं और उन्हें देवगण को सौंप दिया। तत्पश्चात् देवता उत्साह में भरकर वहाँ से चले गए।

गभस्तिनी जब आश्रम लौटी तो उसे अग्निदेव द्वारा सारी घटना ज्ञात हुई। पति की मृत्यु के बारे में सुनकर वह अत्यंत दुखी होकर बोली – ” मैं देवताओं को शाप देकर उनका नाश कर सकती हूँ, लेकिन ऐसा करके मैं अपने स्वामी के बलिदान को निरर्थक नहीं होने दूँगी। पति के बिना पत्नी के जीवन का कोई महत्त्व नहीं है, इसलिए मैं अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्याग दूँगी । “

उस समय वह गर्भवती थी, इसलिए उसने अपना पेट चीर कर उसमें से एक बालक को निकाला। फिर आश्रम की वनस्पतियों और औषधियों को सम्बोधित कर बोली – “मेरा यह बालक माता – पिता से हीन है। इसका कोई बंधु-बांधव भी नहीं है, अत: आप इसकी रक्षा करें। ” यह कहकर उसने बालक को पीपल के एक वृक्ष के निकट लिटा दिया और स्वयं अग्नि में प्रवेश कर दिव्य लोक पधार गई ।

तब वनस्पतियों और औषधियों ने अपने राजा सोम से अमृत लाकर उस बालक को पिला दिया। वह बालक धीरे-धीरे युवा होने लगा। चूँकि पीपल के वृक्ष ने उसका पालन-पोषण किया था, अतः बड़ा होकर वह बालक पिप्पलाद मुनि के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

एक दिन पिप्पलाद ने वृक्षों से अपने माता-पिता के विषय में पूछा। उन्होंने दधीचि मुनि की मृत्यु तथा गभस्तिनी के अग्नि प्रवेश की सारी घटना बताई। तब पिप्पलाद मुनि क्रोधित होकर देवताओं से प्रतिशोध लेने के लिए उद्यत हो गए । उन्होंने भगवान् महादेव की आराधना कर उनसे भयंकर कृत्या प्राप्त की और उसे देवगण के संहार का आदेश दिया। उस भयंकर कृत्या को देखकर देवगण भयभीत हो गए। वे उसी क्षण भगवान् शिव के साथ पिप्पलाद के पास गए और उन्हें समझा- बुझाकर शांत किया।

तब पिप्पलाद बोले – “देवगण ! संसार में वे प्राणी धन्य हैं, जिन्हें माता- पिता की सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। इसलिए मैं भी अपने माता-पिता की सेवा करना चाहता हूँ; उन्हें देखना चाहता हूँ । यदि मैं उनके दर्शन मात्र भी पा जाऊँ तो मेरा जीवन धन्य हो जाएगा। ‘

देवगण ने तथास्तु कहकर उनकी इच्छा पूर्ण कर दी। इसके बाद देवगण ने भगवान् महादेव से स्वयं के, गौओं के और महर्षि दधीचि की हड्डियों के पवित्र होने का उपाय पूछा। भगवान् शिव ने उन्हें गौतमी गंगा में स्नान करने का परामर्श दिया। तदंतर वे गौतमी में स्नान कर पवित्र हो गए। जहाँ देवगण पापमुक्त हुए, ‘पापनाशन तीर्थ’ कहलाया । वहाँ स्नान और दान करने से ब्रह्म-हत्या का पाप भी नष्ट हो जाता है। जहाँ गौएँ पवित्र हुईं, वह ‘गौ तीर्थ’ और जिस स्थान पर दधीचि मुनि की हड्डियाँ पवित्र की गईं, वह ‘पितृ तीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

पिप्पलाद ने जिस स्थान पर भगवान् शिव की स्थापना की, वह स्थान पिप्पलेश्वर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। फिर उन्होंने गौतम मुनि की पुत्री से विवाह किया। अंत में भगवान् शिव की पूजा-स्तवन करते हुए वे अपने स्वजन के साथ स्वर्ग लोक चले गए। पिप्पलेश्वर को ही चक्रेश्वर भी कहा जाता है। यह स्थान चक्रतीर्थ कहलाता है। यह तीर्थ घोर पापों का नाश कर देने वाला भी कहा गया है।