मुझे शुरू से ही दोपहर का भोजन करने के बाद थोड़ी देर लेटने की आदत रही है। शादी के बाद ससुराल आने पर घर के काम निपटाकर सोने की आदत बनी हुई थी। दिन में सोने को मेरी सासुमां आलस्य का घर मानती थी। इसलिए यह आदत उन्हें पसंद नहीं थी। इशारों से जब बात नहीं बनी तो एक दिन उन्होंने टोक ही दिया। उनके द्वारा टोका जाना मुझे रास नहीं आया और मैंने भी गुस्से में कह डाला, ‘मां जी, रात में तो ये (पतिदेव) मुझे सोने नहीं देते और दिन में आप। अब मैं कहां, कब और कैसे सोऊं?
पतिदेव पास ही में खड़े थे। मेरा जवाब सुनकर मंद-मंद मुस्कुराने लगे। सासुमां को बात समझ में आई तो उन्होंने भी ठहाका लगा दिया। बची मैं, तो बात का मतलब समझ में आते ही झेंप गई और शर्म से लाल हो गई।