दीवाली कोई मजाक नहीं है, अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। लोग लोन एप्लाई करके भी संतुष्ट नहीं हो पाते हैं। खटकती रहती है कि थोड़ा सा रुपया और मिल जाता तो ये कर लेते वो कर लेते। लेकिन रुपया बड़े नाच नचाता है। जिसके पास होता है वह सात तालों में रखता है, जिसके पास नहीं होता है वह मनौतियां मनाता है तथा अनुष्ठान्न कराता है। लेकिन रुपया है कि तब भी नहीं आता। लक्ष्मी पूजन की परम्परा के पीछे भी यह मरदुआ रुपया ही है- जिसे प्राप्त कर लेने के लिए हम सब अथक प्रयत्न करते हैं। इस बार यह दीवाली केवल हराम की कमाई पर डिपेंड करेगी। आम आदमी की खैर नहीं। लूट का शिकार होता रहेगा पूरे महीने। काला धन जब बाजार में आयेगा तो सामान्य उपभोक्ता के तो वैसे ही परखचे उड़ जायेंगे। भारत में दीवाली का प्रचलन जोरों पर है तथा यह कपड़े लत्तों से लेकर मिठाई, घरों की सजावट तथा बंब-पटाखों की बदखर्ची तक चलता है।
पोपट लाल जी इसी पेसोपेश में हैं कि दीवाली का कैसे-क्या करना है। उधर पत्नी साडिय़ों को चिंतित हैं तो इधर बच्चों ने नये कपड़ों तथा फुलझड़ी पटाखों का ग्यारह सूत्री ज्ञापन दे दिया है उन्हें। परमात्मा ही पोपट लाल जी की रक्षा करेंगे। वे अपने कुर्ते-पायजामे के प्रति चिंतित नहीं है जितने बाल-बच्चों तथा पत्नी के प्रति सजग हैं। इस बार मात खायी कि पूरे साल रोना चलता रहेगा। इसलिए वे इसे अपना लहू बहाकर भी शानो-शौकत से मनाकर मौहल्ले को मात देंगे। दीवाली से पहले ही एक दिन सुबह मैंने उन्हें जा छेड़ा- ‘भाई पोपट लाल जी
हमें तो महंगाई मार गई? ‘और मुझे यह दीवाली, अभी पूरे सात दिन बाकी है लेकिन मेरे छक्के छुड़ा रखे हैं। लोहे के चने चबा रहा हूं इन दिनों। दिल चीरकर बता पाता कि भीतर के घाव कितने गहरे हैं। पोपट लाल जी बेदर्दी से बोले। मैंने मुंह पर उदासी और घनी की और बोला- ‘सच कहते हो, मुझे पता है- दिल छलनी हो चुका होगा अब तक। लेकिन क्यों, ऐसा क्या कार्यक्रम है-जो दीवाली ने दिन में ही तारे दिखा दिये हैं। ‘यार शर्मा, मिठाई 4 सौ रुपया किलो चल रही है। क्या लाऊंगा? मिठाई खाने वालों की कमी नहीं है, न ही मधुमेह के बाद लोगों ने इसे खाना बंद किया है। क्या दीवाली के लिए चने लेकर आऊं? ‘सच कह रहे हो पोपट लाल जी इच्छा होती है, दो पैसे का जहर लेकर दोनों एक साथ खालें। ‘आप भी निरे बेवकूफ हैं, दो पैसे का जहर आता है। खा भी लो तो कोई गारंटी नहीं कि मुक्ति हो ही जायेगी। जिन्दा रह गये तो वैसे दुर्गति है। यह पलायनवादी विचार तो हमें लाना ही नहीं है। यदि इस मर्ज से ग्रस्त हो तो कहीं से लोन का जुगाड़ बैठाओ। उन्होंने कहा। मैं बोला- ‘एल.आई.सी., पी.एफ. तथा वेलफेयर फंड से तो ले चुका हूं। यदि प्राइवेट सैक्टर में स्कोप हो तो बताओ, ब्याज देकर भी ले लेंगे।
‘ले लोगे?
‘हां, ले लेंगे, देंगे तो हम ही।
‘क्या मतलब? पोपट लाल जी घबराये।
‘मतलब यह कि लोन की एवज कहीं से अनुदान की व्यवस्था नहीं हो सकती है क्या? या फिर लोन में सबसिडी मिल जाये। मैंने कहा।
पोपट लाल जी ने दांत बजाये और कहा’
देखो शर्मा, तुम्हें दीवाली के प्रति कोई क्रेज नहीं है। तुम ऐसा करो, इसी समय अपनी तशरीफ को टोकरा कहीं दूसरी जगह ले जाओ, ताकि मैं चिंतन कर सकूं कि क्या करना है या क्या नहीं।
तुम दीवाली को बहुत लाइटली ले रहे हो। ‘आप मेरी बात को समझ नहीं पा रहे हैं पोपटलाल जी, मेरे कहने का तात्पर्य है बंधुवर यदि आप लोन ले रहे हैं तो मुझे भी अपनी जमानत पर दिला दीजिये। ‘नहीं, जमानत तो पत्नी के जेवर देंगे। ‘कमाल करते हैं आप, जेवर पत्नी दीवाली के दिन पहनेगी या गिरवी रखेगी, जेवर दीवाली पर बनाये जाते हैं न की रेहन रखे जाते हैं। कुछ गैरत रखिये। मैंने कहा।
…’मैंने कहा न, तुम दीवाली के प्रति कतई सीरियस नहीं हो, लेकिन मेरी नाक का सवाल है। वह साला वर्मा, कल का छोकरा परसों फ्रिज उठा लाया। दीवाली पर कोई नया आयटम यदि घर में आ जाये तो बुरा क्या है। इस बहाने कुछ चीज आ जाती है।
सुना है फ्रिज भी किश्तों में मिल रहे हैं। पोपट लाल जी ने कहा।
मैं बोला- ‘किश्तों में क्या नहीं मिलता, बस आपकी गारंटी देने वाला चाहिए।
‘क्यों, क्या तुम नहीं दोगे गारंटी?
‘आदमी एक दूसरे का पूरक होता हैं, आप मुझे नकद दिलाने में जमानत दे दो तो मैं तुम्हारी फ्रिज खरीद में गारंटर बन जाऊंगा। ताली दोनों हाथ से बजती है, एक से नहीं।
‘तुम समझते नहीं शर्मा?
‘क्या नहीं समझता?
‘यही कि फ्रिज लाना कितना जरूरी है।
‘लेकिन अब जबकि सर्दी शुरू हो गई है,
फ्रिज लाने की उपयोगिता क्या है? मैंने कहा।
पोपट लाल जी गंभीर होकर बोले- ‘सवाल उपयोगिता या अनुपयोगिता का नहीं है, स्टेटस का है। जब साले मरे हुये दो कोडी के छोकरे ले जाये हैं तो मैं तो पच्चीस साल से भाड़ झोंक रहा हूं सरकारी नौकरी में। ‘और मैं यह कह रहा था कि फ्रिज में रखने की क्या व्यवस्था है। मेरा मतलब पानी को बोतलें या फिर प्याज और आलू के अलावा क्या रख पाओगे? रहा सवाल पानी का तो भाई जी सर्दी में ठंडा पानी पिया नहीं जाता और आलू-प्याज बिना फ्रिज के भी खराब नहीं होते। फल खाये तुम्हें एक दशक से ऊपर हो गया है। दूध तुम्हारे यहां बचता नहीं और यदि बचता है तो लो अभी चाय बनाकर पिलवाओ, मैं मान जाऊंगा व्यर्थ में फ्रिज का भूत सवार कर रखा है। मैंने कहा।
पोपट लाल जी बोले- ‘अमां शर्मा जी, तुम भी खूब हो यार, चाय तुम्हें पिलवायेंगे भाई, लेकिन गारंटर बनने की गारंटी तो देवो। चाय के साथ बताशे खिलाकर भी मुंह मीठा करायेंगे।
खील खिला देंगे आपको।
‘बस खील और बताशे, अमां शर्म करो मेरे भाई, मिठाई की बात करो मिठाई की। मैंने कहा।
वे बोले- ‘मैंने तुमसे पहले ही कहा कि मिठाई इस बार केवल पूजन के लिए ही खरीद पाऊंगा।
‘एक काम करो पोपट लाल जी आप तो।
‘बोलो भाई, जल्दी बोलो, यदि नेक सलाह है तो जरूर काम में लूंगा।
मैं बोला- ‘सलाह तो नेक ही है, यह आप पर है कि आप उसे मानेंगे या नहीं। ऐसा करो
इस बार आप लंगोट सिलवाओ।
‘लंगोट, क्या मतलब?
‘मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा पोपट लाल जी। आपके दर्द इतने गहरे हैं कि उन पर मरहम लगाना इंसान की तो बस की बात है नहीं? मैंने कहा। तभी श्रीमती पोपट लाल वहां आ धमकी। बातों में शामिल होते हुए बोली’ क्यों, किसी नतीजे पर पहुंचे आप लोग?
‘नतीजा तो हमें पता है मैडम। पोपट लाल
जी कराह कर बोले।
‘क्या पता है? मिसेज पोपट लाल ने पूछा।
‘कि नतीजा बहुत बुरा होगा।
‘नतीजा, नतीजा होता है उसमें क्या बुरा और क्या अच्छा। यदि बुरे नतीजों से डरते रहे तो अच्छे प्रयासों का क्या होगा? जब शर्मा जी गारंटी देने को तैयार हैं तो आप दुम को दबा रहे हैं? श्रीमती पोपट लाल ने कहा। पोपट लाल जी ने लगभग पीड़ा से आह भरते हुए कहा- ‘वह खुद शर्मा जी से तुम बात कर लो?
फिर वे मेरी और मुखातिब होकर बोलीं-‘क्यों शर्मा जी क्या प्रॉब्लम है?
‘प्रॉब्लम, प्रॉब्लम तो कुछ नहीं, बस वह मुझे भी थोड़ा सा नकद लोन चाहिए था।
‘और वह भी पचास प्रतिशत सबसिडी वाला। बीच में ही पोपट लाल जी मुंह बनाकर बोले।
श्रीमती पोपट लाल को इस पैंतरे का पता नहीं था। वे नहीं जानती थीं कि मैं भी घुटा हुआ हूं। लेकिन उन्होंने नहले पर दहला मारा तथा गुरुघंटाल होने का परिचय देते हुए कहा- ‘शर्मा जी लोन तो हम दिला देंगे, लेकिन आप पहले गारंटी दें। बस पहले फ्रिज ले आते हैं बाद में आपके उधार के लिए बात करते हैं।
‘बातों के बताशे मैं नहीं खाता। मैं थोड़ा व्यावहारिक हूं। मेरे पिता ने बस मुझे यही सिखाया है कि बेटा पहले अपना उल्लू सीधा कर लो, बाद में हो जाओ रफू चक्कर।
इस बार पोपट लाल जी बोले- ‘और मेरे पिता ने भी यही सिखाया है।
‘तो फिर ऐसा करिये मैं बताती हूं राज की बात। चूंकि हम दोनों ही जब गुरुघंटाल तथा पहुंचे हुए हैं तो दीवाली दिलों से मनाइये।
श्रीमती पोपट लाल ने कहा। ‘क्या मतलब? मैंने और पोपट लाल जी ने
एक साथ पूछा।
‘मतलब यह है कि न तो आप फ्रिज लाइये और न आप लोन लीजिए। बस दिलों में उत्साह और उमंग भर लीजिए। क्योंकि दीवाली तो दिलवालों की होती है।
‘हां-ठीक तो है। हम दोनों बोले- ‘लेकिन फिर?
‘फिर क्या, जितना है उनमें आनन्द लीजिये। बदखर्ची, फिजूलखर्ची तथा महंगाई से जीतने का बस यही तो राज है।
‘क्या तुम सच कह रही हो? पोपट लाल जी ने अपनी बांछे खिलाते हुए कहा।
‘मैं नहीं। वह दूसरे कमरे में बैठी श्रीमती शर्मा भी यही कह रही हैं। तभी मेरी पत्नी भी आ गई और बोली- ‘हां सच है, दीवाली दिलवालों की होती है। दिलों में खुशी हो तो पैसों की कमी भी नहीं खलती।
मेरे और पोपट लाल जी के दिल में दीवाली से पहले ही बम्ब-पटाखे चलने लगे तथा खुशियों की फुलझडिय़ां जलने लगीं।
ये भी पढ़ें-
