‘‘नेस्टिंग इंस्टिंक्ट बनी-बनाई बात है या सच है?”
पक्षियों की तरह मनुष्य में भी यह भावना पाई जाती है। जिस तरह पक्षी अंडे देने से पहले घोंसला बनाते हैं। उसी तरह इंसान के मन में भी यह व्यग्रता आ जाती है।डिलीवरी से कुछ समय पहले मांएँ घर का हर कोना झाड़-पोंछ कर चमका देना चाहती हैं। हर चीज़ ठीक-ठिकाने पर रख देना चाहती हैं। कुछ तो घर में 6 महीने का राशन भरने के लिए बेचैन हो जाती हैं। कुछ नर्सरी का कोना-कोना साफ करती हैं।रसोईघर को नए सिरे से सजाती हैं। घंटों शिशु का सामान सहेजती हैं।
कई बार एड्रेनलिन के स्तर की वजह से भी ऐसा होता है। याद रखें कि ऐसा सभी के साथ नहीं होता। कुछ महिलाएँ बड़े मजे से टी.वी. के आगे बैठकर खाते-पीते अपना सारा वक्त बिताती हैं। उन्हें कोई ऐसी इच्छा नहीं होती।
यदि आपको भी ऐसा लग रहा है तो कृपया शिशु की नर्सरी को अपने-आपको भेंट न करें।आप सीढ़ियों से गिर सकती हैं। अपने-आप को घर के काम से पूरी तरह न थकाएँ। आपको अभी बहुत सी ऊर्जा बचा कर रखनी है। अपनी हदें कभी न भूलें। आप एक इंसान हैं और आप अकेले ही सारे काम नहीं कर सकतीं।
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