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Benefits of Meditation: ध्यान मन को विशुद्ध करने की प्रक्रिया है
Benefits of Meditation

Benefits of Meditation: ध्यान मन को विशुद्ध करने एवं इसे एक लक्ष्य, अंतर्गामी एवं प्रशान्त बनाने की प्रक्रिया है। ध्यान की विधि के द्वारा मन आपको आपके अस्तित्व के गहनतम स्तरों को भली-भांति समझने में सहायता करेगा एवं आपको अनुभूति की सर्वोच्च स्थिति तक ले जाएगा। एक जिज्ञासु होते हुये ध्यान का अभ्यास करते समय सावधान एवं दृढ़ रहना चाहिए। प्रारम्भावस्था से ही बहुत अधिक अपेक्षा मत कीजिए। ध्यान की कोई त्वरित विधि नहीं होती है। आधुनिक शिष्य ध्यान से तात्कालिक परिणामों की अपेक्षा करते हैं एवं यह अपेक्षा उनके लिए अविलक्षण कल्पना, कल्पनातीत विचार एवं अनेकों
बातों की मतिभ्रमता होने का कारण बनती है जिसे वे आध्यात्मिक अनुभव समझते हैं। ये अनुभव वास्तव में अर्ध चेतन मन के उत्पाद हैं। परिणामत: वे कुंठित एवं असंतुलित बन जाते है और या तो वे ध्यान करना बंद कर देते हैं अथवा वे अनजान विधियों का अनुकरण करना आरम्भ करते हैं जो उनकी प्रगति के लिए हानिकारक होते हैं।

ध्यान केलिए अन्दर से एक दृढ़ व ज्वलंत इच्छा का होना जरूरी है। जब आपके पास ध्यान करने की ज्वलंत इच्छा होगी तो यही आपका नेतृत्व करेगी। संकल्पशक्ति की आवश्यकता होती है। ‘आज मैं ध्यान में बैठूंगा। किसी के पास मुझे रोकने की शक्ति नहीं है। विचार मन का उत्पाद है। मैं विचारों से संबंन्धित नहीं हूं।

आपको बाह्य् संसार में वस्तुओं को देखने एवं परीक्षण करने के लिए सिखाया गया है। किसी ने आपको अंतर्मन में देखना एवं खोजना नहीं सिखाया है। कोई और अन्य मार्ग नहीं है बल्कि ध्यान ही है। संसार की कोई वस्तु आपको वह शक्ति प्रदान नहीं कर सकती जो आपको ध्यान प्रदान कर सकता है। मैं आप को सलाह देता हूं कि जब आप ध्यान में बैठतें हंै तो विभिन्न प्रकार के प्रकाश को देखने के लिए चिन्ता मत कीजिए। आपको अपने स्थान को पूर्ण अंधकार में बनाना सीखना होगा ताकि आप उस मधुर प्रकाश को देख सकें। यदि आप कोई प्रकाश नहीं देखते अथवा कोई अनुभव नहीं करते अथवा कुछ नहीं देखते तो चिन्ता मत कीजिए।

यदि आपके पास धैर्य है एवं यदि आप स्थिर होकर बैठना सीख जाते है, तो जीवन एवं प्रकाश का केंद्र आपके समक्ष स्वयं को प्रकट करना आरम्भ कर देगा। तब तक व्यर्थ के प्रकाशों की कल्पना करना हानिप्रद है। प्रकाश की प्रतीक्षा करते हुए अन्धकार में रहना सीखिए। ध्यान में किसी प्रकार का अनुभव न होना ही सही अनुभव है। यदि आप ध्यान की विधि का क्रमिक रूप से अनुसरण कर रहे हैं तो आपको चिन्ता एवं महसूस करने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि आप उन्नति नहीं कर रहे हैं। जब कभी आप ध्यान कर रहे हैं होते हैं अथवा ध्यान करने का प्रयास कर रहे होते हैं तो आप कुछ न कुछ कर रहे हैं। यह मत कहिए एवं यह मत सोचिए कि आप अपने कर्मों का फल प्राप्त नहीं कर रहे हैं। यह
संभव नहीं है। यह अवैज्ञानिक है कि आप कुछ करें एवं आपको कुछ भी प्राप्त न हो। प्रत्येक क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है।

स्थिरता

ध्यान एक बिना गति की यात्रा है। बाह्य्सं सार में आपको आगे निकलने के लिए चलना पड़ता है, ध्यान में आप चलते नहीं हैं फिर भी आप प्राप्त कर लेते हैं। प्रथम बात आपको यह सीखनी चाहिए कि शारीरिक रूप से कैसे स्थिर हुआ जाए। एक माह शरीर को स्थिर बनाने में लगाइये। आप पायेंगे कि आप सरलता से अपने शरीर के खिचावों, कपकंपी एवं झटकों को रोकने में समर्थ हैं।

जब शरीर स्थिर होता है तो आप अति आनंद एवं विश्वास को पायेंगे। इस स्थिरता का आनन्द लेना सीखिए। आपने अभी तक चाहे जितने भी आनन्दों का अनुभव किया हो, स्थिरता समस्त आनन्दों में सर्वोच्च है। प्रतिदिन एक ही समय पर दृढ़ निश्चय के साथ एक शान्त एवं निर्वात स्थान पर स्थिर बैठना सीखिए। बिना हिले-डुले आरामदायक स्थिति में बने रहना सीखिए। अपने मन को कहिए कि शरीर को स्थिर बनाये। ऐसा करने में किसी प्रकार की जबरदस्ती या कठोरता नहीं होनी चाहिए।
यदि आप यह जानते हैं कि कुछ समय तक स्थिर कैसे रहा जाए तो आप अपनी श्वास को शान्त बनाने में समर्थ होंगे। बिना शांत श्वास एवं प्रशांत मन के आध्यात्मिकता नहीं होती है। हम शरीर को स्थिर, श्वास को शांत एवं मन को निश्चल क्यों बनाते हैं? हम यह इसलिए करते हैं ताकि ये हमारे लिए व्यवधान उत्पन्न न करें। अपने अंगूठे को तर्जनी से स्पर्श कराते हुए अपनी उंगलियों से एक मुद्रा बनाइये, फिर हाथों को घुटनों के ऊपर रख दीजिए। यह मुद्रा अथवा भंगिमा शरीर में एक चक्कर बनाती है जो आपकी ऊर्जा को बाह्य्ग मन करने से बचाती है। अपने सिर, ग्रीवा एवं धड़ को सीधा रखिए एवं फिर धीरे से अपनी आंखें बंद कीजिए तथा अपने शरीर की स्थिरता का मानसिक रूप से निरीक्षण कीजिए। आपका शरीर आगे की ओर झुकना आरम्भ कर सकता है। आपकी आन्तरिक कुंठाऐं एवं भावनाएं शरीर के हिलने-डुलने का कारण होती हैं। प्रथम कुछ दिनों तक आपको स्थिरता का निरीक्षण करना चाहिए। स्थिरता का आनन्द लीजिए। स्थिरता से अति आनन्द बाहर आयेगा। जितनी शक्ति चाल में होती है उतनी ही शान्ति स्थिरता में।

आसन

आपको अपने लिए एक आसन का चयन करना होगा। आसन जिसे आप ध्यान के लिए प्रयोग करते हैं वह ऐसा होना चाहिए जिसमें आप अचल एवं आराम से रहें एवं ऐसा होना चाहिए जो आपके सिर, ग्रीवा एवं धड़ को एक सीधी रेखा में रख सके। ध्यान के लिए कुछ पारम्परिक आसन है। सुखासन (आरामदायक आसन) सबसे सरल आसन पालती मारकर जमीन पर बैठना है। यदि आपके पैर लचीले हैं तो आप स्वास्तिक आसन (शुभ मुद्रा) को अधिक सुविधाजनक पा सकते हैं। पद्ïमासन (कमल मुद्रा) का प्रयोग करने की सलाह नहीं दी गई है क्योंकि इस आसन में मूलबंध को करना संभव नहीं होता है। ध्यान के लिए सर्वोच्च आसन सिद्धासन (पूर्ण मुद्रा) है। इस मुद्रा में यदि आप
धीरे-धीरे एवं क्रमिक रूप से अभ्यास करते हैं तो आप पायेंगे कि आपका शरीर एक मूर्ति की तरह बन गया है। सिद्धासन को उन लोगों द्वारा प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए जो अभी प्रारंभिक अवस्था में हैं। आप ध्यान के लिए चाहे कोई भी आसन प्रयोग कर रहे हो आरम्भ से ही आपको मूलबंध को करना सीखना चाहिए। आपको गुदा अवरोधनी का संकुचन करना चाहिए एवं तब तक इस संकुचन को बनाये रखना चाहिए जब तक आपका आसन लगा हुआ हो।

श्वास

दिन में कम से कम तीन बार आपको कुछ सामान्य श्वास की क्रियाओं को करना चाहिए। श्वास की नियमिता व्यक्ति को आसानी से मन के रूपांतरणों पर नियंत्रण प्राप्त करने में सहायता करती है। अपनी पूर्ण क्षमता के साथ धीरे से अपने होठों को बंद रखते हुए एवं नथुनों से श्वास को लेते हुए अपने उदर (पेट) को अन्दर की तरफ धकेलिए फिर अपने उदर को बिना किसी बल अथवा श्वास लेकर
शिथिल कीजिए। अपनी पूर्ण क्षमता के अनुसार कम से कम दस बार श्वास लीजिए एवं छोड़िये। यह आपकी निष्क्रिय एवं नकारात्मक मनोदशा को शान्त करने में सहायता करेगा।

जब आप श्वासों के व्यायाम को कर रहे हैं तो पूरा ध्यान मन को एकाग्र करने पर (मनोयोग) दीजिए। मनोयोगता श्वास एवं ध्यान दोनों की कुंजी है। जब आप ध्यान करते हैं तो तर्जनी व अंगूठे को जोड़ते हुए एक बंद बनाकर हाथों को अपने घुटनों पर रखिये। अपने शरीर का, सिर से पांव तक सर्वेक्षण कीजिये एवं देखिए कि आपके शरीर का प्रत्येक भाग पूर्णतया आराम में है। धीरे से अपनी आंख बंद कर लीजिए एवं पुन: मानसिक रूप से निरीक्षण कीजिए। मन को शरीर के प्रति जागरुकता लाना सीखने दीजिए। यौगिक श्वास के व्यायामों के अभ्यास करने से व्यक्ति श्वास लेने व छोड़ने के मध्य संतुलन को प्राप्त करता है। श्वास लेने तथा छोड़ने की नियमितता शरीर तथा मन को स्थिर करने में सहायता करती है।

श्वास का ध्यान

जब आसन दृढ़ हो, शरीर स्थिर एवं आरामपूर्वक हो एवं आप उर: प्राचीर (डायफ्राम) से श्वांस ले रहें हों, अगला चरण श्वास पर ध्यान देना होता है अपनी श्वास के प्रवाह का अवलोकन करना। अपने मन को श्वास पर केंद्रित होने दीजिए एवं मन को श्वास के साथ प्रवाहित होने दीजिए। श्वास में झटके अथवा उथलापन नहीं होना चाहिए, इसमें शोर नहीं होना चाहिए एवं अनावश्यक रूप से आपको श्वास लेने तथा छोड़ने के मध्य के प्राकृतिक विराम को बढ़ाना नहीं चाहिए। श्वास व्यक्ति की आन्तरिक स्थिति को मापने के लिए एक वायु मापक यंत्र है। जब आप यह अवलोकन करते हैं कि आपकी श्वास शान्त, गहरी एवं बिना किसी अनावश्यक विराम के है तो आप बहुत सुविधा एवं आनन्द के भाव का अनुभव करेंगे। जब आप मन को श्वास के साथ समन्वित कर लेते हैं तो आप एक विलक्षण आनंद पायेंगे। धीरे-धीरे आप अपने मन को श्वास से ध्वनि की तरफ ले जायेंगे। सोऽहं की ध्वनि पर धारणा (एकाग्रता) करना सर्वोत्तम है। जब आप सोऽहं का स्मरण करते है, सो श्वास लेने की ध्वनि होती है एवं ऽहं श्वांस छोड़ने की ध्वनि होती है। अपनी बंद आंखों के साथ रीढ़ की हड्ïडी के सबसे निचले केंद्र जिसे मूलाधार कहते हैं पर मन को केंद्रित कीजिए। ऐसे श्वास लीजिए जैसे कि आप सो की ध्वनि को अन्दर ले जा रहे हैं, फिर ऽहं की ध्वनि के साथ श्वास इस प्रकार से छोड़िए जैसे आप अपने सिर के ऊपरी भाग से पांव की उंगलियों तक श्वास छोड़ रहे हो। इस प्रकार श्वास लेने तथा छोड़ने का अनुपात दुगना हो जाएगा-चार तक श्वास लेने व आठ तक श्वांस छोड़ना। उर: प्राचीर (डायफ्राम) से श्वास लेने के बाद इसे दस बार कीजिए। कुछ दिनों के पश्चात्ï आप पाएंगे कि आपकी श्वास बहुत शांत हो गई है।
जब कभी भी आप बहुत अधिक हर्ष (आनंद) में हों, आप पायेंगे कि मन शांत है एवं श्वांस प्रशांत है। जब तक मन एवं श्वास के मध्य एक पूर्ण समन्वय न हो तब तक आप कभी भी खुश एवं प्रसन्न नहीं
रह सकते हैं।

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