holi dishes and precaution
Be Careful on Holi

Holi 2022: हमारी संस्कृति में जितना महत्त्व तीज-त्योहारों और मेलों का है, उतना ही महत्त्व इन मौकों पर खान-पान का भी है। हमारे यहां हर व्यंजन किसी न किसी त्योहार के साथ जुड़े हुए हैं। मसलन दीपावली मिठाइयों का त्योहार है, तो होली के माहौल पर गुझिया छाई रहती है। त्योहारों के अलावा मेलों में भी मौज-मस्ती के साथ खान-पान पर पूरा जोर दिया जाता है। जब से मेलों ने व्यावसायिकता का दामन थामा है, तब से तमाम तरह के देशी-विदेशी व्यंजन मेलों की जान बन गए हैं। मेला चाहे होली, दीवाली या दशहरे का हो, चाउमीन और बर्गर जैसे विदेशी ‘फास्ट फूड’ से लेकर पारंपरिक डोसा, छोले-भटूरे, सरसों की रोटी और मक्के का साग तक खूब बिकते हैं। मेलों में सबसे ज्यादा भीड़ इन्हीं स्टॉलों पर दिखाई देती है।

दरअसल हम भारतीय मसालेदार चटपटे स्वाद के गुलाम हैं। मिठाई हमारी खास कमजोरी मानी जाती है। इसीलिए तीज-त्योहारों पर खान-पान से जुड़ी तमाम तरह की चेतावनियों को भुलाकर व्यंजनों के मैदान में टूट पड़ते हैं। बेचारे पेट पर तमाम तरह के व्यंजनों और पकवानों के प्रहार होने लगते हैं। मुसीबत यह है कि देर-सबेर इन प्रहारों की चोट कई रोगों और परेशानियों की शक्ल में हमें झेलने पड़ते हैं। सवाल उठता है कि जो भारतीय भोजन सदियों से हमारे लिए कल्याणकारी था, वही आज हम पर चोट क्यों कर रहा है? खान-पान से सेहत को होने वाले नुकसान का असल दोषी हमारी बदली हुई जीवन शैली, व्यंजन या पकवान बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली खाद्य सामग्री, खतरनाक रसायनों या सामग्री की मिलावट और गंदगी है। इन तीनों का मेल हमारे लिए खतरनाक साबित हो रहा है।

पाक-कला और मसाले

Holi 2022
Spices

पारंपरिक भारतीय भोजन की सबसे बड़ी खूबी या कमजोरी इसका मसालेदार होना है। पाकशास्त्र की पुरानी किताबों में 106 तरह के मसाले गिनाए गए हैं। अनोखी सुगंध और स्वाद के कारण भारतीय मसाले दुनिया भर में विख्यात थे और उसके निर्यात में भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा कमाई जाती थी। यह सिलसिला आज भी जारी है। परंतु मसाले केवल सुगंध या स्वाद के लिए नहीं हैं। आधुनिक खोजों से पता चला है कि तमाम मसाले औषधीय गुणों से भरपूर हैं। कई मसालों में ‘एंटीबायोटिक’ यानी रोग फैलाने वाले जीवाणुओं को मारने की क्षमता भी देखी गई है।

भारतीय भेाजन में प्रचुरता से इस्तेमाल किए जाने वाले प्याज, लहसुन की औषधीय उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है। प्याज के सेवन से रक्त पतला हो जाता है, जिससे दिल का दौरा पड़ने की संभावना काफी घट जाती है। लहसुन रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) घटाता है और दिल की धड़कन नियमित होती है। इसी तरह सौंफ के सेवन से पेट में गैस नहीं बनती, कालीमिर्च गले को दुरुस्त रखती है, हरी मिर्च सर्दी-जुकाम दूर रखती है। परंतु ये सभी फायदे तभी हैं, जब मसालों का उपयोग समुचित मात्रा में किया जाए। व्यंजन को अधिक चटपटा और जायकेदार बनाने के लिए मसाले झोंक देने से फायदे की जगह नुकसान होने लगता है। इसके अलावा मसालों को खूब देर तक तलने से भी इनके गुण नष्ट हो जाते हैं। बताया गया है कि यदि दालचीनी, लौंग, कालीमिर्च और इलायची जैसे मसालों को खूब तल दिया जाए, तो ये भोजन में नुकसानदायक कार्बन की मात्रा बढ़ा देते हैं। जरूरत से अधिक मसाले आंतों की भीतरी सतह में प्रेवश कर हानि पहुंचाते हैं। इससे पेट में अम्लता और जलन उत्पन्न होती है। लम्बे समय तक पेट में यह स्थिति बनी रहने से आंतों का कैंसर पनप सकता हैं।

Holi
Food does not rot or spoil quickly in the presence of spices

हाल में मसालों के साथ एक बड़ा खतरा मिलावट का हो गया हे क्योंकि इसका सत् पहले ही सोख लिया जाता है। मेलों मे व्यंजनों को ज्यादा जायकेदार और चटपटा बनाने के लिए इतने अधिक तथा घटिया मसाले झोंक दिए जाते हैं कि व्यंजन तमाम रोगों के पिटारे बन जाते हैं। मेलों में व्यजनों को आकर्षक बनाने के लिए हलवाई कई तरह के नुकसानदायक रंगों तथा रसायनों का इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकते। इसलिए इनसे परहेज रखें तो बेहतर होगा हलवाई मसालों का ज्यादा इस्तेमाल इनकी एक खास खूबी के कारण भी करते हैं। मसालों की मौजूदगी में भोजन जल्दी सड़ता या खराब नहीं होता। यह बात हाल में हुई वैज्ञानिक खोजों  से भी सिद्ध हुई है।

मसालों के अलावा भारतीय भोजन की दूसरी सबसे बड़ी खूबी इसे पकाने के तरीके में है। ज्यादा पकाने  और ज्यादा तलने से भोजन के पौष्टिक गुण खत्म हो जाते हैंं। यदि सब्जियों को जरूरत से ज्यादा पका दिया जाए, तो वे मात्र पोषण-विहीन हो जाती हैं। खनिज एवं विटामिन यूं गायब हो जाते हैं जैसे कभी थे ही नहीं। दरअसल भोजन को खूब अच्छी तरह से तलने के लिए ज्यादा तेल या घी का इस्तेमाल किया जाता है जिससे भोजन में आवश्यकता से कहीं ज्यादा चिकनाई पहुंच जाती है जो नुकसानदायक है। तलने के दौरान भोजन को अधिक समय तक आंच पर रखने से इसमें कैंसर जनक तत्त्वों के प्रवेश की संभावना बहुत बढ़ जाती है। चिकनाई में मौजूद कोलेस्ट्रॉल तो दिल के दुश्मन नंबर एक के रूप में खासा कुख्याति अर्जित कर चुका है। यह एक अलग मुद्दा है कि भोजन पकाने के लिए कौन सा तेल इस्तेमाल किया जाए और कौन सा नहीं। पर इतना तय है कि चिकनाई से परहेज रखने में ही भलाई है। 

लेकिन हां यदि चिकनाई का सेवन उपयुक्त मात्रा में किया जाए तो इससे रक्त वाहिकाओं में लचीलापन बना रहता है और बुढ़ापा भी दूर रहता है। 

संतुलित हो आहार

Holi
A Balanced Diet

शरीर को ऊर्जा प्रदान करने के लिए भी वसा की जरूरत पड़ती है। पोषण विज्ञानी बताते हैं कि हमारे भोजन में 25 प्रतिशत वसा मौजूद होनी चाहिए। इसके अलावा 50-60 प्रतिशत कार्बोहाइडे्रट, 15-20 प्रतिशत प्रोटीन, 5 प्रतिशत विटामिन व खनिज तथा 5 प्रतिशत रेशों की मौजूदगी भी जरूरी है। मुख्य रूप से अनाजों में मिलने वाला कार्बोहाइडे्रट तथा वसा शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। जबकि दालों, मांस व दूध से मिलने वाले प्रोटीन से शरीर के ऊतकों का निर्माण होता है। विटामिन और खनिज शरीर की भीतरी क्रियाओं के लिए जरूरी हैं। रेशों द्वारा देह की भीतरी साफ-सफाई का काम किया जाता है। संतुलित आहार में ये सभी अवयव ऊपर बताई गई मात्रा में मौजूद होने चाहिए। यदि यह संतुलन एक-दो या कुछ दिन के लिए डगमगा जाए, तो कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन जब यह सिलसिला हफ्तों या महीनों तक चले तो सेहत चैपट होने का पूरा अंदेशा बन जाता है।

संतुलित आहार का सारा खेल कैलोरी पर टिका है। कैलोरी उस ऊर्जा की इकाई है जो हमें भोजन में मौजूद वसा या कार्बोहाइडे्रट के पाचन से मिलती है। हिसाब लगाया गया है कि शरीर को औसतन हर रोज 2400 कैलोरी ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। यह जरूरत औसत कार्य करने वाले वयस्क पुरुष के लिए आंकी गई है। अधिक शारीरिक श्रम करने वाले पुरुष को अधिक कैलोरी की जरूरत पड़ेगी। औसत वयस्क महिला के लिए हर रोज 1600 कैलोरी ऊर्जा पर्याप्त होती है। हमारे भोजन में कैलोरी का इससे कम या ज्यादा होना नुकसानदायक साबित होता है। यदि कैलोरी कम हुई तो शरीर थका-थका महसूस करेगा। कैलोरी अधिक होने पर यदि उसे खर्च न किया जाए, तो शरीर का भार तेजी से बढ़ने लगता है। देह पर मोटापा छाने लगता है। इसके साथ ही रक्तचाप भी ऊपर चढ़ता है। यदि इस दशा में भी खान-पान पर अंकुश न लगाया जाए, तो दिल का दौरा पड़ने के आसार बन जाते हैं। हमारी बदली हुई जीवनशैली में शारीरिक श्रम बहुत कम होता है इसलिए उच्च रक्तचाप महामारी की तरह फैल रहा है। चिकित्सक कहते हैं कि उच्च रक्तचाप पर अंकुश लगाने का एक ही तरीका है-खान-पान पर नियंत्रण और सुबह की लंबी सैर एवं व्यायाम। त्योहार के दिनों में उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिए बदहजमी काफी मंहगी साबित हो सकती है। दिल की सेहत के लिए जुबान पर काबू रखना बेहतर होगा।

Holi 2022
The whole game of a balanced diet rests on calories

खान-पान की आदतों पर अंकुश लगाना जरूरी है। स्वीट डिश के रूप में ऌफ्रूट सलाद खाने की सलाह दी जाती है। जरूरत से ज्यादा खाना हमारे देश में एक आम प्रचलन है। आज के माहौल में ‘एक और-एक और’ की जगह ‘एक कम’ की जरूरत है। पोषण विज्ञानियों की मान्यता है कि बंधे-बंधाए ‘टाइम टेबल’ के हिसाब से नाश्ता और भोजन करना ठीक नहीं है। इससे व्यक्ति भूख न होते भी जबरन भोजन करके ढेरों अतिरिक्त कैलोरी बटोर लेता है। हमें भोजन तभी करना चाहिए जब भूख लगे। दरअसल भूख लगने का अर्थ भी यही है कि शरीर को ऊर्जा की जरूरत है। इसीलिए आजकल चिकित्सक बच्चों को ठोक-पीटकर खाना खिलाने के पक्ष में नही हैं। शहरों में इन दिनों होटलों में कई व्यंजनों वाली ‘थाली’ खूब लोकप्रिय हो गई है। मेलों में भी ये थाली दिखाई देती है। इससे बचकर रहना चाहिए क्योंकि ये ‘ओवर ईटिंग’ का सबसे बड़ा माध्यम है। दरअसल पेट भर जाने पर भी व्यक्ति पूरा पैसा वसूलने के लिए ‘थाली’ में कुछ नहीं छोड़ना चाहता भले ही पेट खराब हो जाए।

चिकित्सक बताते हैं कि त्योहारों के तुरंत बाद पेट के रोगियों की तादाद बढ़ने के साथ ही उच्च रक्तचाप के पुराने रोगियों की समस्याएं उठ खड़ी होती हैं। मजे की बात है कि ज्यादा खाने के बाद भी व्यक्ति को संतुलित भोजन नहीं मिल पाता। सेहत के भले के लिए सही मात्रा में सही भोजन करना जरूरी है। अगर ऐसा न हो, तो हमें कई बीमारियां घेर लेती हैं। मसलन खान-पान में आयोडीन नामक तत्त्व की कमी से घेंघा नामक गले का रोग जकड़ लेता है। यदि शरीर में कैल्सियम की कमी हो जाए, तो हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। संतरा, नींबू और अमरूद जैसे फल विटामिन सी से भरपूर होते हैं। यदि इनका नियमित सेवन न किया जाए, तो देह में विटामिन सी की कमी होने से सर्दी-जुकाम जल्दी-जल्दी जकड़ने लगता है। हरी सब्जियों, दूध, गाजर, मक्खन आदि से प्रचुर मात्रा में मिलने वाले विटामिन-ए मिलता है। इसकी कमी से आंखों की रोशनी विदा ले सकती है।

दरअसल पारंपरिक भोजन में कोई खोट नहीं है। यदि मसालों और तेल-घी का उपयोग समुचित मात्रा में किया जाए और आवश्यकता से अधिक भोजन न किया जाए, तो हमें इससे कोई नुकसान नहीं होने वाला परंतु इसके साथ शारीरिक श्रम की शर्त अनिवार्य रूप से जुड़ी है।