हरि अनंत हरिकथा अनंता: TV Serial Reality
TV Serial Reality

TV Serial Reality: पहले टीवी को इडियट बॉक्स कहते थे, लेकिन आज के सीरियल्स देखकर लगता है कि इडियट टीवी नहीं, बल्कि उसके दर्शक हैं। पढ़िए यह व्यंग्य-

इस देश में किसी भी दल की सरकार भले पांच साल चले न चले, मगर टीवी धारावाहिक कई वर्षों तक धाराप्रवाह चलते रहते हैं। इस दौरान सीरियल के मुख्य पात्र दो-तीन साल बड़े पर्दे पर जाकर लौट भी आएं तो भी दर्शक बुरा नहीं मानते। वे भला बुरा क्यूं मानने लगे। वे तो चटपटा देखने की लत के शिकार हैं। चौबीसों घंटे टीवी देखने को लाचार हैं।

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उन्हें तो कुछ न कुछ दाल-दलिया चाहिए ही। सीरियल निर्माता न जाने कहां-कहां की बेसिर-पैर की हांकता रहेगा, बीसियों नए पात्र, घटनाएं व मोड़ खड़े कर दे, टीआरपी बढ़ती ही रहेगी। जैसे कहावत है कि उधार की नानी कभी नहीं मरती, वैसे ही इन धारावाहिकों के पात्र कितने ही साल दूर जाकर भी जब कभी भी पास आते हैं तो बिल्कुल सहज लगने लगते हैं। उन्हें ऐसे मसाला डालकर खपा दिया जाता है।
कोई भी टॉम, डिक या हैरी यानी ऐरा-गैरा, नत्थू-खैरा टीवी के लिए सफल धारावाहिक बना सकता है। शर्त यह है कि उसे पक्का यकीन होना चाहिए कि टीवी के दर्शकों में किसी किस्म का तर्क करने की अक्ल नहीं होती। धारावाहिक तो फिल्म बनाने से कहीं ज्यादा सस्ता और आसान है, क्योंकि इसमें पैसा बिल्कुल नहीं चाहिए। सारा पैसा विज्ञापन ही साथ-साथ पूरा करते चलते हैं।


धारावाहिक में न गीत-संगीत चाहिए, न कहानी, न स्टंट। महंगे अभिनेता लेने की भी जरूरत नहीं। कोई भी सुंदर नौजवान जो मांसपेशियां दिखा सके और एक साथ दो-तीन तितलियों से फ्लर्ट कर सके, चल जाएगा। हीरोइन सुंदर हो, चिकनी और चंट हो, लटके-झटके दिखाकर काम चल जाता है।
जब सत्यजीत राय को सिनेमा के लिए लाइफ टाइम ऑस्कर अवॉर्ड मिला था, तब मुख्यधारा के खैरख्वाह लोगों ने जलन के मारे शोर किया था कि सत्यजीत राय ने भारत की गंदगी, गरीबी, अनपढ़ता और अंधविश्वास को बाहर के लोगों के सामने परोसा। आज टीवी में आप कोई भी धारावाहिक देखें तो पता चलता है कि अब सीरियल निर्माताओं ने देश की गंदगी और गरीबी को पूरी तरह से ढक दिया है। धारावाहिक में दिखाए जाने वाले परिवार सजे-धजे व खाते-पीते लोग हैं, जो आलीशान कोठियों में रहते हैं। बड़े-बड़े सुसज्जित कमरों में कई जोड़ों वाले दपदपाते कुनबे क्या शान से रहते दिखाई देते हैं।


इन धारावाहिकों में विस्तृत व विशाल स्टार कास्ट लेनी पड़ती है। इसमें हर शेड व रंग के चरित्र दिखाने पड़ते हैं, जो स्याह काले से लेकर भूरे व बर्फ के समान सफेद हो सकते हैं। इन धारावाहिकों की स्टोरी लाइन विशाल हिंदू परिवार की आंतरिक कलह की महागाथा होती है, जिसमें गहरे विद्रूपपूर्ण षड्यंत्र, सास-बहू का अंतहीन टकराव, धुआंधार व आलीशान पाॢटयां, लंबे-लंबे वैभव भरे धाॢमक व सामाजिक आयोजन देखने को मिलते हैं। एक खास बात का ख्याल रखना पड़ता है कि प्रसारण वाले दिनों में पड़ने वाले त्योहारों- मसलन होली, करवा चौथ, दीवाली, क्रिसमस, रक्षा बंधन, वेलेंटाइन डे आदि सब पर्वों के लिए विशेष एपिसोड तैयार करने होते हैं। इससे टीआरपी में अपार बढ़ोत्तरी होती है। आपको तो पता ही है कि देखने वाले उकताए, बौराए और दुखी लोग हैं, जिनके पास आपके सीरियल देखने के सिवा कोई अन्य विकल्प है ही नहीं।
सबसे अधिक गंदा, काला व मक्कार चरित्र घर की बुआ व ननद निभाती है जो कुंवारी तो नहीं बहुधा शादीशुदा होती हैं और हर समय मायके में ही सफलतापूर्वक रहती दिखाई जाती हैं। ननदोई या फूफा कहीं नजर नहीं आते। इससे बजट बचता है। बस आप देखते जाइए। विज्ञापनों की लीला रंग दिखाती है। निर्माता जानता है कि दर्शक अपनी बुद्धि या तर्क शक्ति का प्रयोग नहीं करेगा। वह कहानी को खींच-खींचकर अधमरा कर देता है। दर्शक तनाव में है मगर उसका तनाव कम करने के लिए असंख्य दूसरे सीरियल बीसियों चैनलों पर चल रहे हैं। प्रभु की लीला
अनंत है।