Bride and groom seated near the sacred fire during a Hindu wedding ceremony, surrounded by family members as they perform traditional rituals in a community setting.
Expenditure Limits Set for Weddings in Himachal Pradesh:

Summary:फिजूलखर्ची पर लगाम: हिमाचल के टोंरु गांव ने बदली शादी की परंपरा

टोंरु गांव ने शादियों और सामाजिक आयोजनों में होने वाले अनावश्यक खर्च पर रोक लगाने का फैसला किया है। इससे गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों को बड़ी राहत मिलने वाली है।

Tonru Village Himachal Simple Wedding: बदलते समय के साथ शादियां और सामाजिक आयोजन अब सिर्फ खुशियों का ही मौका नहीं रह गए हैं, बल्कि अब इसे लेकर दिखावे की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। इसी वजह से लोग अपने बजट से कहीं ज्यादा खर्च करने को मजबूर हो गए हैं। वैसे तो हर कोई शादियों में खूब खर्च करते हैं, लेकिन हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के हाटी समुदाय में होने वाली शादी सबसे महंगी शादी मानी जाती है।

यहाँ कि शादियों में लाखों रुपए की खर्ची के कारण परिवार पर आर्थिक बोझ इतना बढ़ जाता है कि कर्ज लेने की नौबत आ जाती है। इस बोझ को खत्म करने के लिए आंजभोज क्षेत्र के टोंरु गांव ने एक बेहतरीन पहल की है और कई कुरीतियों व फ़िज़ूलख़र्ची को रोकने के लिए कड़े फ़ैसले लिए हैं, जिसकी हर तरफ खूब चर्चा हो रही है।

Residents of a Himalayan village sitting together outdoors in a community meeting, discussing social matters and collective decisions in a rural setting.
Wasteful Spending on Events to be Curtailed

टोंरु गांव के लोगों ने आपसी सहमति से तय किया कि अब बच्चे के जन्म से लेकर शादी और मृत्यु भोज जैसे आयोजनों में होने वाली फिजूलखर्ची पर रोक लगाई जाएगी। इस फैसले का मकसद किसी भी परंपरा को खत्म करना नहीं है, बल्कि उसे सादगी और समानता के साथ निभाना है, ताकि कोई भी परिवार कर्ज के बोझ तले ना दबे।

Close-up view of a bride and groom holding hands during a traditional Indian wedding ritual, with the bride’s hands decorated with mehndi and bangles and the groom wearing ceremonial attire.
The Biggest Change in Wedding Celebrations

पलटोज पार्टी में तो ऐसे हालात होते थे कि गांव की शादीशुदा बेटियां अपने बच्चों के सहित पहुंचती थीं। बाहर से आने वाले रिश्तेदारों को जोड़ दिया जाए तो मेहमानों की यह गिनती डेढ़ हजार से भी ज्यादा हो जाती थी। अब यह फैसला लिया गया है कि पलटोज पार्टी केवल बेड़े तक सीमित रहेगी। यानी इसमें केवल नजदीकी परिवार और गांव के कुछ प्रमुख लोग ही शामिल होंगे।

अब गांव में शादी-विवाह समारोह में शराब परोसने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया गया है। अब शादियों में डीजे सिर्फ एक दिन ही बजेगा, जिससे शोर-शराबे और अनावश्यक खर्च दोनों पर लगाम लगाने में आसानी होगी।

महिलाओं को घी, शक्कर, सिक्के, कपड़े या बर्तन देने जैसी परंपराएं भी खत्म कर दी गई हैं। इसके अलावा, अब शादी में दिन के टोलूवा के रूप में महिलाओं और पुरुषों को बकरा देने की प्रथा भी खत्म कर दी गई है, जो यहाँ की शादियों में लंबे समय से आर्थिक बोझ का कारण बनती रही थी।

A smiling young child lying beside a newborn baby indoors, showing a tender sibling moment and family bonding after the birth of a child.
No grand celebrations for childbirth either.

दसूठन की परंपरा को लेकर भी बड़ा बदलाव किया गया है। लड़का या लड़की के जन्म पर बड़े आयोजन करने की परंपरा अब नहीं रहेगी। अब यह आयोजन केवल बड़े पुत्र के जन्म पर ही किया जाएगा और उसमें भी सिर्फ चार-पांच नजदीकी परिवारों को ही बुलाया जाएगा।

अब से यहाँ मृत्यु के बाद होने वाले शोक, तेरहवीं और बरसी जैसे कार्यक्रम भी बेड़े तक ही सीमित रहेंगे। शोकाकुल परिवार के अलावा केवल दो-तीन करीबी लोग ही इसमें शामिल होंगे, जिससे दुख की घड़ी में परिवार पर अतिरिक्त खर्च और सामाजिक दबाव नहीं हो।

ए अंकिता को मीडिया इंडस्ट्री में 9 वर्षों का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से की और खास तौर पर लाइफस्टाइल और एंटरटेनमेंट बीट में रुचि रखती हैं। लेखन के अलावा वेब सीरीज़ देखना, घूमना, संगीत सुनना और फोटोग्राफी...