Summary: सास-बहू के रिश्ते में जब आया नया मोड़
सास और बहू की नोंकझोंक सालों चलती रही, फिर कुछ ऐसा हुआ कि दूरियां मिट गई और दिल मिल गए।
Hindi Short Story: पहले ही दिन, सास विनीता खड़ी थीं, हाथ में कपड़ा थामे और बहू नीरु की ओर कड़ी नज़र से देख रही थीं।
“नीरु, फिर ये कपड़े ऐसे ही पड़े हैं? क्या तुम्हें घर संभालना आता है या सिर्फ़ मेरी नजरें चुभाना?”
नीरु ने पलकों के पीछे आँसू छुपाते हुए कहा, “सासू माँ, अगर सबकुछ आपकी तरह करना होता तो शायद मैं पैदा ही नहीं होती।”
लड़ाई, 15 सालों की तरह, उसी तरह शुरू हो गई। छोटी-छोटी बातें कपड़े, सफाई, खाना…झगड़े का बहाना बन रही थीं। हर शब्द चुभता, हर नजरें ठंडी लगती। विनीता और नीरु, दोनों एक-दूसरे की बातों को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थीं।
अगले दिन, फोन आया….विनीता के पिता की मृत्यु हो गई।
अब विनीता को मायके जाना पड़ा। 15 दिन। शुरुआत में, यह दूरी केवल चुप्पी और ठंडक लेकर आई। नीरु ने घर संभाला, काम किया, पर दिल में कोई बड़ा अहसास नहीं था…बस चुपचाप सब कुछ किया।
विनीता, मायके में, घर और नीरु के बारे में नहीं सोच रही थीं। उनकी आँखें, उनके पिता, उनके परिवार की याद में भरी थीं। हाँ, घर में उनकी गैरमौजूदगी का कोई बड़ा असर नहीं था वो सोच रही थीं कि “15 दिन… क्या फर्क पड़ेगा।”
दिन बीतते गए। हर रोज़ का काम…रसोई, कपड़े, सफाई…अब अकेले करना पड़ रहा था। शुरुआत में नीरु को यह “सौभाग्य” जैसा लगा कि वह घर पर अकेले सब संभाल रही है। लेकिन धीरे-धीरे छोटी-छोटी चीज़ें…बर्तन का ठीक से न रखना, कपड़े उलझना, रसोई का खालीपन…नीरु को अंदर से परेशान करने लगीं।
सातवें दिन, नीरु ने पहली बार देखा कि घर खाली-सा लगता है। किसी से बात करने की आदत, विनीता की आवाज़, उस कटु अंदाज़ की डांट…सब याद आने लगा।
दसवें दिन, विनीता ने फोन किया। “नीरु… सब ठीक है?”
नीरु ने पहले तो सामान्य जवाब दिया, पर फिर धीरे-धीरे उसकी आवाज़ में हल्की असहजता और एक अनजाना खालीपन झलकने लगा। 14वें दिन, नीरु अकेले काम करते-करते थक कर बैठ गई। वह समझ गई कि यह घर विनीता के बिना वैसा नहीं है जैसा लगता था, लेकिन अब भी उसने सीधे शब्दों में महसूस नहीं किया…बस मन में हल्की खलिश थी।
15वें दिन, विनीता घर लौटी। नीरु ने दरवाजा खोला और चुपचाप विनीता को देखा। कोई शब्द नहीं, सिर्फ़ एक लंबी, भारी सांस और आँखों में हल्की नमी।
विनीता ने भी पलकों के पीछे हल्की नमी दबाई। कोई तुरंत “मैं तुम्हारी कमी महसूस कर रही हूँ” नहीं बोला। बस आँखों और हाव-भाव से समझा गया कि अब दोनों के लिए सब बदल चुका है।

धीरे-धीरे, छोटी-छोटी बातें..सफाई, खाना, कपड़े-झगड़े का बहाना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की उपस्थिति का अहसास बन गईं। 15 दिन की दूरी ने उन्हें सिखाया कि कभी-कभी अहसास धीरे-धीरे आता है, लेकिन असर हमेशा गहरा होता है। अब एक दूसरे की कीमत बिना बोले समझ आने लगी और महसूस होने लगा कि कितना समय यूँ ही व्यर्थ कर दिया लड़ाई झगड़ों में…।
अब तो दोनों को साथ कोई भी देखता तो उसे आँखों पर यकीन नहीं होता कि कहाँ कभी एक दूसरे से चिढ़ते थे और आज एक दूसरे की इतनी परवाह और इज्जत कर रहे हैं। कुछ रिश्ते समय माँगते हैं अपनी गहराईयों तक जाने में..!
