Prerna
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Hindi Kahani: मैं यही कहना चाहूंगी कि विचारो के बदलने से भी आती है जिंदगी में रोशनी, सिर्फ सूरज के चमकने से जिंदगी रोशन नहीं होती।

बचपन से कठिनाइयों से जूझते-जूझते मैं यह भूल ही गई कि परेशानियों से मुकाबला किया जा सकता है। मुझे
लगता था कि मेरी किस्मत ही ऐसी है और मुझे ऐसे ही जीना होगा। मेरी जिंदगी ने भी मुझ पर रहम करना छोड़ दिया।
मां-बाप की मजबूरी कि गरीबी और बच्चे दोनों को संभालते-संभालते, बुढ़ापा जवानी में ही दस्तक दे देता है। ऐसी ही परिस्थितियों में मेरा बचपन बीता। गरीब के घर जवान बेटी खुली किताब की तरह होती है, जिसे पढ़ना तो हर कोई चाहता है, पर बाद उसका मोल, रद्दी पेपर कि तरह, फेंक कर किया जाता है। किसी तरह मैंने दसवीं तक पढ़ाई की, आगे गांव में पढ़ने की व्यवस्था नहीं होने से मेरी पढ़ाई रोक दी गई। घर के काम-काज करो और इसी तरह घर में रहो। एक बड़े घर से मेरे लिए रिश्ता आया। घर से सब भौचक्के रह गए। हमारा और इनका क्या मेल? वो प्रदेश के बड़े नेता, उनके सुपुत्र एक बड़ी कंपनी के मालिक, आखिर ये रिश्ता हो
ही कैसे सकता है?

गरीबी कि एक खासियत होती है कि भगवान इन्हें बेटी देता है, मेहनती होने से कसा हुआ शरीर, गोरा रंग, लंबे बाल, इस कदर खूबसूरत बेटी, किसी को भी मोहित करने के लिए काफी है। बस यही खूबसूरती मेरे हिस्से
भी आई।
सास-ससुर ने कहा कि ‘भगवान का दिया हमारे पास सब कुछ है, बस एक सुंदर सुशील कन्या चाहिए, जो मेरे बेटे की गृहस्थी संभाल सके। भगवान ने आपको इतनी सुंदर बेटी दी है, जो मेरे बेटे को बहुत पसंद आई है। हम
आपसे आपकी बेटी मांगते हैं, हमें निराश न कीजिएगा, बस जैसी है, वैसी ही विदा कर दीजिए।
हम सबकी आंखों में खुशी के आंसू थे, मां-बाप बार-बार मेरी नजर उतार रहे थे, कहीं उनकी बेटी कि किस्मत को किसी की नजर न लगे।
बड़ी ही सादगी से हमारा विवाह संपन्न हुआ। बड़े ही डरते-डरते, मन में अंजानी सी बेचैनी और सपने लेकर, ससुराल में कदम रखा। जब तक घर में मेहमान थे, तब तक मुझे खूब ह्रश्वयार दिया गया, सम्मान दिया गया।
चार दिन की चांदनी किसे कहते हैं, मुझे जल्दी ही समझ में आ गया। पांचवे दिन से ही मेरे हर काम में मीन-मेख निकाला जाने लगा, हर बात में टोकाटाकी, ताने-उलाहने। मुझे नौकरो की तरह रखा जाने लगा, रसोई
संभालो, घर के कामकाज चुपचाप रह कर करते रहो, कुछ भी कहने की आजादी न थी।
सास-ननद, पति डांटते-मारते, गालियां देते, कभी-कभी तो मुझे समझ में भी नहीं आता था कि मेरी गलती क्या है। अचानक मुझे अपने अंदर कुछ बदलाव महसूस होने लगा, अरे! ये तो मेरे गर्भ में खुशियां पल रही हैं। मुझे लगा शायद अब सब ठीक हो जाएगा, मेरे हालात बदलेंगे। पर नहीं अब मुझ पर हर वक्त यही दबाव डाला जाने लगा कि, खानदान को वारिस चाहिए, बेटा ही होना चाहिए। मुझे तो अब सांस लेने में भी डर
लगने लगा था।
किसी तरह नौ महीने का समय बीता, मैंने एक ह्रश्वयारी-सी बेटी को जन्म दिया। पर मुझ पर तो आसमान टूट पड़ा, हर वक्त मुझे बेटी होने और बेटा न होने के लिए दोष दिया जा रहा था।
जल्दी ही मुझे समझ में आ गया कि मेरे हालात तो बदलने से रहे पर मेरे साथ मेरी बेटी क्यों भुगते, उसका क्या दोष, उसका क्या कसूर, हर बच्चे का हक है कि ह्रश्वयार मिले, सही परवरिश मिले। बस, बिना किसी से कुछ कहे बेटी को लेकर मायके आ गई। मैंने मां से कहा, ‘मैं चार घर जा कर बर्तन मांजूंगी, काम करूंगी और
अपनी बेटी को पालूंगी, ससुराल वापस नहीं जाऊंगी।

काफी कोशिशों के बाद मैंने स्नातक की पदवी प्राह्रश्वत की। मेरा पढ़ाई के प्रति जुनून देख कर मेरी एक प्राध्यापिका ने मेरा बहुत साथ दिया, मार्गदर्शन किया। उन्होंने मेरे रिजल्ट को देखते हुए प्रदेश लोक सेवा आयोग का फार्म मुझसे भरवाया, मेरा मार्गदर्शन किया। मेरी मेहनत रंग लाई और मैंने अच्छे नंबरों से परीक्षा
में सफलता प्राह्रश्वत की। आज मैं अपनी बेटी की, अपने मां-बाप की जिंदगी को संवार पाई। अनेको को प्रेरणा दे पाई। मेरा मानना है, ‘नाम और पहचान भले छोटी हो, पर खुद की होनी चाहिए।

मैंने अपने भाषण में भी यही दोहराया कि, अपनी मदद हम स्वयं ही कर सकते हैं, कोई और नहीं। लोग हमें मंजिल का पता बता सकते हैं पर चलना हमें स्वयं ही पड़ेगा। डगर पथरीली हो या पैरों में छाले हो, जो बिना रुके कोशिश करता है वही जीवन की हर परीक्षा में सफल होता है। हर आदमी की पहचान उसका चेहरा नहीं, विचार वाणी और कर्म होते हैं। आज भगवान की दया और मेरी मेहनत से मैंने मेरे नाम ‘प्रेरणा’ को सार्थक किया और मेरे जैसी जाने कितनों की प्रेरणा बन गई।