gunahon ka Saudagar by rahul | Hindi Novel | Grehlakshmi
gunahon ka Saudagar by rahul

कई दिनों बाद विवेक कॉलेज जाने के लिए तैयार होकर निकला…उस रात के बाद देवयानी बिल्कुल उस वर्ग की बस्ती के शरीफ घराने की बहू बन गई थी…उसने विवेक को भी मन से अपना लिया था…फिर एग्जाम तक के लिए वह मांजी और विवेक की अनुमति से बंगले पर चली गई थी…विवेक खुश हो गया था कि बला टली।

कच्चे धागे नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

वह सोच रहा था कॉलेज में अंजला से जरूर भेंट होगी।

कालेज पहुंचते ही उसे अंजला नजर आ गई…वह कार से उतरी थी, लेकिन महेश साथ नहीं था। इसलिए विवेक और भी खुश हो गया।

अंजला ने उसे नहीं देखा था और जब तक वह उसकी ओर बढ़ता, अंजला अपनी क्लास की ओर जा चुकी थी…चूंकि पीरियड शुरू हो चुका था इसलिए विवेक को भी अपनी क्लास में जाना पड़ा था…लेकिन उसका मन पढ़ाई में नहीं लगा।

इन्टरवल तक अंजला से भेंट नहीं हो सकी और जब इन्टरवल में वह उसे ढूंढ़ने निकला तो पार्किंग में उसकी कार दिखाई नहीं दी…उसके दिल को धक्का-सा लगा। उसने उस लड़के को रोका जिसकी मोटरसाइकिल लेकर एक बार वह भागा था‒

“तेरे को मालूम है अंजला किधर गई?”

“अरे! अब तो उसका पीछा छोड़….अब वह तेरे दोस्त की पत्नी है।”

“अबे….अपन तुझसे पता पूछेला है…रिश्ता नहीं।” विवेक ने उसका गिरेबान पकड़ कर झिंझोड़ कर गुस्से से कहा।

“अरे…अरे…यह क्या करते हो?” अचानक पीछे से देवयानी ने आकर कहा।

“ऐ देवयानी…तेरे को कौन बोला अपन लोग के बीच में पड़ने को?”

“यार! अजीब लड़का है….वह तेरी पत्नी है।” शरद ने अपना गिरेबान ठीक करते हुए कहा।

देवयानी विवेक की बांह पकड़कर अलग ले आई और नर्मी से समझाते हुए बोली‒”विवेक! क्या तुम सचमुच बुद्धू हो?”

“जबान संभालकर बोलने का…बात किससे करेली है।”

“अपने हसबैंड से।” देवयानी ने मुस्करा कर कहा।

“साली…तेरे को मालूम है अपन तेरा हसबैंड…फ्रैंड नहीं है, न अंजू-वह सामने महेश की बीवी है…उस साले को भी मरने का है…और तेरे को भी।”

“यह भेद केवल तुम्हें, मुझे, अंजला और महेश को ही तो मालूम है…दूसरे लोग तो नहीं जानते हैं।”

“इससे क्या फर्क पड़ता है…अपन सबको बता देगा।”

“पागल हो गए हो तुम! यह बताओगे कि तुमने अपनी प्रेमिका की शादी इसलिए अपने दोस्त से करा दी है कि अगर तुम उससे शादी कर लेते तो तुम मर जाते। लोग तुम्हें डरपोक नहीं समझेंगे…कि मरने से डरते हो।”

“अरे! अपन डरपोक नहीं है।”

“तो फिर थोड़ा डिप्लोमैसी से काम लो…लोगों को मालूम है कि हम दोनों हसबैंड वाइफ हैं तो समझने दो…अंजला और महेश पति-पत्नी हैं, तो यह भी समझने दो-जब महेश मर जाएगा तो अंजला आजाद हो जाएगी…मैं मर जाऊंगी तो तुम आजाद हो जाओगे‒तब तुम दोनों शादी कर लेना।”

“वह तो करने का ही है…साला कौन रोकेगा अपन लोग को…अपन दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं।”

“कोई रोक नहीं सकता, मगर अभी तो किसी को नहीं मालूम कि तुम्हारी और अंजला की हाथ की लकीरों में क्या लिखा है….अगर तुम ऐसा कुछ बोलते रहोगे तो लोग तुम्हें स्वार्थी कहेंगे।”

“साली! अपन, क्या स्वार्थी है?”

“बिल्कुल नहीं….तुम तो बहुत अच्छे हो…एकदम सच्चे…साफ दिल के।”

“मसका मारेली है।”

“नहीं, जब से तुम्हारे साथ हूं तुम्हें अच्छी तरह समझने लगी हूं-हम हम दोनों भले ही हसबैंड वाइफ बनकर न रहें, लेकिन अच्छे दोस्त बनकर तो रह सकते हैं। अब अंजला ही को देख लो…उसे मालूम है कि महेश मर जाएगा, मगर वह महेश को बिलकुल हसबैंड ही की तरह ट्रीट कर रही है ताकि लोग सच्चाई समझें और तुम्हारी बदनामी न हो…इसी प्रकार तुम मुझसे भी ट्रीट करो ताकि लोग तुम्हें गलत न समझें‒मैं तो वैसे भी मर जाऊंगी…जब तक जिन्दा हूं हम दोनों दोस्त बनकर तो रहें।”

“साली! आज तेरी जबान पर ‘रसगुल्ले’ काहे को घुल रहे हैं।”

“तुम सबके बीच रहकर मुझे भी विश्वास हो गया है कि ऊपर वाला आदमी का भाग्य उसके हाथ की रेखाओं ही में लिखता है…इसलिए मुझे सचमुच यकीन हो गया है अब तक जितने भी दोस्तों से मेरा घनिष्ठ सम्बन्ध रहा, सबने मुझे एक्सलाइट किया…केवल तुम एक मात्र वह नौजवान हो जिसने मेरी जवानी….मेरी सुन्दरता का लाभ नहीं उठाया…लेकिन मैं तुम्हारी टेम्परेरी वाइफ हूं…और तुम्हें अधिकार है इसलिए मैं समझती हूं कि मेरे लिए तुमसे अच्छा कोई दोस्त नहीं हो सकता…अगर महेश मुझसे पहले मर गया तो मैं स्वयं अपने हाथों से तुम्हारी ओर अंजला की शादी कराऊंगी।”

“सच बोलेला है?”

“एकदम सच।”

“अरे वाह! अपन भी आज से तेरे ही को ‘दोस्त’ समझेंगा…..तेरी हर बात मानेंगा….पर एक शर्त होएगा…अपन को तेरे बंगले नहीं जाने का है।”

“बिल्कुल नहीं ले जाऊंगी।”

“ऐ साली! आज तू बड़ी अच्छी-अच्छी बातें करेली है?”

“मैं जब तक जिन्दा हूं अच्छी-अच्छी बातें ही करूंगी…तुम मानो या-न मानो मैंने तुम्हें अपना स्वामी मान लिया है….आज तुम घर बस पर नहीं जाना…मैं तुम्हें कार से ड्राप करती जाऊंगी और कॉलेज जाने के लिए तुम्हें खोली से पिकअप कर लिया करूंगी।”

“नहीं साली-अपन को अपनी आदत नहीं बिगाड़ने का है।”

“आदत कैसे बिगड़ेगी? जब तुम अंजला के हसबैंड बन जाओगे तो क्या तुम बंगले में नहीं रहोगे?”

“एकदम नहीं…. वह साला बुड्ढ़ा खूसट अपन को एक आंख नहीं भाएला…जब अपन को दामाद बनाएला था तो कैसा चमचागिरी करेला था…जब साला महेश को दामाद बनाने लगा तो तोते के माफिक आंखें फेर लिया।”

“तो क्या अंजला की दौलत…किसी और को चली जाएगी….वह गुरनाम अंकल की इकलौती बेटी है…सब कुछ उसी का है…इसलिए तुम्हें सब स्वीकार करना ही पड़ेगा….वैसे भी जब तुम इंजीनियर बन जाओगे तो मैं तुम्हें अच्छी नौकरी दिलवा दूंगी-बस्ती से तो तुम्हें वैसे भी निकलना ही है।”

“अभी अपन कोई फैसला नहीं करेंगा…बाद में देखा जाएगा।”

“चलो बाद में सही…आज तो मेरे साथ ही चलना…केवल आज…फिर मैं तुमसे नहीं कहूंगी।”

“ओ.के. …अपन चलेंगे।”

इन्टरवल समाप्त हो गया और वे लोग अपनी-अपनी क्लासों में चले गए। अब विवेक के दिल का बोझ कुछ कम हो गया था…उसने ध्यान से लैक्चर सुना और नोट लिए।

जब कॉलेज से छुट्टी होने पर वह देवयानी की कार की ओर आया तो उसके कानों में चटाख की आवाज आई-उसने चौंककर उधर देखा…देवयानी कॉलेज के किसी दोस्त को थप्पड़ मार कर गुर्रा रही थी‒”यू बास्टर्ड, डर्टी बीस्ट, अब अगर तुमने मुझे बहकाने, भटकाने और किसी ढंग से एक्सपलाइट करने की कोशिश की तो तुम्हारा ‘रिस्टीकेशन’ करा दूंगी।”

लड़का गाल पर हाथ रखे, आंखें फाड़े आश्चर्य से देवयानी को देख रहा था। विवेक उन दोनों के पास पहुंच गया और लड़के की ओर हाथ उठाकर बोला‒”आ गएला मजा।”

“कम ऑन विवेक!” गुस्से में हांफते हुए देवयानी ने कार का दरवाजा खोलकर कहा।

विवेक हंसता हुआ कार में बैठ गया और लड़का खड़े का खड़ा देखता रहा। गाड़ी सड़क पर आई तो विवेक ने देवयानी से कहा‒

“अरे! तेरे को क्या हो गयाला है…काहे को मारा उसे?”

“विवेक….प्लीज…!”

“ओ.के. ओ.के…आई एम सॉरी…अच्छा, अपन ने तेरी बात मान लिया…आज तेरे साथ चलेला है…अपन का एक काम करेंगी।”

“जरूर करूंगी।”

“बस एक बार अपन से अकेले में अंजला को मिला दे…कसम है…बहुत याद आएली है कई दिनों से अपन को।”

“ठीक है…कल मिला दूंगी।”

“यू आर ग्रेट देवयानी।”

देवयानी कुछ नहीं बोली…कार सड़क पर दौड़ती रही।

देवयानी कार्निश पर रखी महेश की बड़ी तस्वीर देख रही थी…अचानक उसके कानों में आवाज आई‒”देवयानी!”

देवयानी चौंक पड़ी सामने अंजला खड़ी थी…उसके चेहरे से यूं लग रहा था मानो मुस्कराहट उसके होंठों से सदा के लिए विदा हो गई हो। देवयानी उसकी आंखों में देखती हुई बोली‒”अंजला! यह क्या हो गया है तुझे?”

अंजला के होंठों पर फीकी-सी मुस्कराहट फैल गई…अंजला ने धीरे कहा‒”कुछ नहीं…ठीक तो हूं…तू कैसे निकल आई?”

“महेश कहां है?”

“मंथली मेडिकल चेकअप के लिए गए हैं।”

“किस पोजीशन में है वह अब?”

“यहां के डॉक्टर तो जवाब दे चुके हैं…फाइनल एग्जाम हो जाएं तो हम लोग अमरीका जाएंगे।”

“तुम्हारे डैडी को सच्चाई मालूम हो गई है?”

“हां! मैंने कह दिया है कि मैं महेश से प्यार करती थी‒इसलिए वह जैसा भी है मैंने उससे शादी कर ली।”

“और…वह छः महीने के अंदर-अंदर मर जाएगा?”

“देवयानी!” अंजला की आवाज भर्रा गई।

“तूने यह जानते हुए ही तो उससे शादी की थी ताकि एक बार विधवा होने के बाद तू विवेक से शादी कर सके।”

“यह मेरे प्यार का स्वार्थ था देवयानी…शायद भगवान मुझे इसी स्वार्थ की सजा दे रहा है।”

“यह तू क्या कह रही है?”

अंजला ने अपने आंसू पोंछ कर रुंधे गले से कहा‒”विवेक ने महेश से वचन लिया था कि वह शादी के बाद मेरे साथ सुहागरात नहीं मनाएगा।”

“और ऐसा हो गया?”

“उसने मेरे साथ जबरदस्ती नहीं की।”

“फिर…?”

“वह बहुत टूटा हुआ था…दिल से दुखी था…उसके डैडी यह जानते थे कि वह मर जाएगा इसलिए वह चाहते थे कि महेश कोई निशानी उन्हें दे जाए।”

“फिर…?”

“महेश ने जिस भाव और ढंग से मुझसे विनती की‒मैं इनकार नहीं कर सकी।”

“और अब!”

“मेरी कोख में महेश का गर्भ है…गर्भदान समझो।”

देवयानी के मस्तिष्क में छनाका-सा हुआ।

“तू जानती है कि अगर यह बात विवेक को मालूम हो गई तो उसके दिल पर क्या बीतेगी।”

“जानती हूं…इसी कारण मुझे उससे आंखें मिलाने का साहस नहीं हो पा रहा।”

“तो क्या तू महेश की मौत के बाद भी इस घर की बहू बनकर रहेगी?”

“मुझे कुछ नहीं मालूम देवयानी…मेरा दिमाग काम नहीं करता….मैं जानती हूं कि महेश का बचना मुश्किल है…लेकिन उसका चेहरा देखकर मुझे दया आती है…ज्यों-ज्यों मौत उसके निकट आ रही है वह बुझता जा रहा है…उसकी आंखों से यह भी लगता है कि वह जीना चाहता है। कोई भी मरना नहीं चाहता…वह भी इस उमर में।”

“कहीं तू महेश से प्रेम तो नहीं करने लगी?”

“नहीं…मुझे आज भी विवेक से मुहब्बत है…उसकी सादगी, उसकी सच्चाई, उसका भोलापन…वह किसी ऐसे बच्चे की तरह है जिसे देखकर जी चाहने लगे कि यह बच्चा हमारा हो।”

“फिर तू क्या करेगी?”

“मैं क्या करूंगी? अब तो जो भी करेगा समय करेगा।” देवयानी उसे बड़े ध्यान से देखती रही…अंजला ने फिर आंसू पोंछकर कहा‒”क्या तू खुश है विवेक से शादी करके!”

“बहुत खुश हूं…मम्मी की दी हुई बेलगाम आजादी ने मुझे वासना की पुतली बना दिया था। मैं भूल गई थी कि मैं भी भारतीय नारी हूं…भारतीय सभ्यता क्या होती है यह मैंने थोड़े ही समय में विवेक के साथ खोली में रह कर सीखा है‒बहुत कुछ विवेक की मां से….उन्होंने मुझे जानवर से इन्सान बना दिया।

मैंने उससे तेरे कहने पर शादी की थी‒तब मैं शादी के बंधन को मजाक से ज्यादा महत्व नहीं देती थी…हसबैंड को एक ढाल समझती थी…लेकिन आज मुझे लगता है कि शादी का अभिप्राय और अर्थ क्या है‒एक गृहस्थी क्या होती होती है‒शायद तू विश्वास नहीं करेगी कि शादी के बाद से आज तक विवेक ने मेरे साथ सुहागरात नहीं मनाई।”

“नहीं!”

“फिर भी मैं उसे पति का स्थान देती हूं…अपना देवता मानती हूं, क्योंकि वह सचमुच देवता है।”

“तो क्या मेरे कहने पर उसे तलाक दे देगी?”

“पहले मैं इसलिए उसको तलाक दे देती कि शादी मेरे लिए एक गुड़िया-गुड्डे का खेल थी…लेकिन अब…अब मैं इसलिए तलाक देने को तैयार रहूंगी कि मैं सचमुच विवेक के योग्य नहीं हूं‒उसके लिए तेरे ही जैसी जीवनसाथी की जरूरत है।”

“देवयानी-!”

“अंजला! हो सके तो महेश का गर्भ गिरवा दे…अगर सचमुच महेश मरने वाला है तो विवेक को अपनाने के लिए तू महेश का गर्भ गिरवा दे वरना विवेक तेरी बेवफाई और दोस्त के स्वार्थ का आघात सहन नहीं कर सकेगा…हो सकता है, आज का देवता कल का शैतान बन जाए।”

“नहीं-!”

“वह तुझे बहुत प्यार करता है….महेश को भी दोस्त के नाते प्यार करता है…मगर तुझे पाने के लिए वह महेश की मौत का इन्तजार कर रहा है-हर रोज कैलेंडर पर एक दिन काट देता है।”

“हे भगवान!”

“आज मैं तेरे पास एक खास काम के लिए आई हूं-विवेक तुझसे एकांत में मिलना चाहता है।”

“नहीं।”

“केवल एक बार तू उससे मिल ले…मैंने उसे समझा दिया है कि जो भेद हम चारों को मालूम है वह किसी और को नहीं मालूम…इसलिए दूसरे लोगों के सामने तुझसे दूर ही रहेगा….मगर वह तुझसे अकेले में मिलने के लिए बेचैन है।”

“देवयानी…तू ही बता, मैं कैसे उससे आंखें मिला सकूंगी‒महेश के और मेरे बीच जो कुछ हुआ उसमें हमारी मर्जी भी शामिल थी…मैंने भी विवेक के विश्वास को ठेस पहुंचाई है।”

“तुझे इस बात का पछतावा है न?”

“पछतावा तो है, मगर मैं महेश के सामने मजबूर थी।”

“अगर पछतावा है तो उसके पश्चाताप का एक ही हल है।”

“गर्भपात-?”

“हा! तेरा शरीर विवेक की अमानत है…तेरे पछतावे का सही प्रायश्चित केवल यही है कि तू महेश के गर्भ से छुटकारा पा ले।”

“नहीं देवयानी…यह मुझसे नहीं हो सकेगा।”

“क्यों नहीं हो सकेगा?”

“अगर तू मेरी जगह होती और तुझे महेश की हार्दिक विनती के सामने सिर झुकाना पड़ता तो तू क्या करती…मैंने महेश की जिस इच्छापूर्ति के लिए विवेक के विश्वास को ठेस पहुंचाई है…उसी को मार डालूं जो वास्तव में कत्ल है…हत्या है तो मैं विवेक के साथ महेश की भी गुनहगार हो जाती हूं…जीवन अलजबरे का वह फार्मूला नहीं कि दो ‘माइनस’ मिलने से एक ‘प्लस’ बन जाता है…महेश ने मुझसे अपनी खुशी के लिए शादी नहीं की, अपने दोस्त की इच्छा का पालन किया है…मेरा गर्भ महेश के पिता का सपना है…वह गर्भ मेरी खुशी से हुआ है…अब इसे गिरा कर महेश की खुशी का भी गला घोंट दूं।”

“फिर तुझे मेरी एक बात माननी होगी।”

“क्या?”

“केवल एक बार तू विवेक के लिए देवयानी बन जा।”

“देवयानी-!” अंजला कांप कर एक कदम पीछे हट गई।

“अगर ऐसा हो जाए तो महेश की मौत के बाद तू विवेक से कह सकती है कि तेरी कोख में विवेक का ही गर्भ है।”

“नहीं….नहीं…यह नहीं हो सकता।”

“अंजला! तुझे इन दोनों में से एक काम करना ही है‒या तो तू महेश का गर्भ गिरा दे या विवेक को एक बार अपना शरीर सौंप दे।”

नहीं देवयानी मेरी अंर्तात्मा यह स्वीकार नहीं करती…वैसे भी अगर मैंने विवेक की ओर एक कदम भी बढ़ाया तो विवेक मुझसे घृणा करने लगेगा…क्या तू भूल गई कि तूने अपनी बर्थडे पार्टी पर उसे ऐसा मौका दिलवाया था, अगर उसकी जगह कोई दूसरा होता तो तेरी मदहोशी का लाभ उठाने से बिल्कुल नहीं चूकता, मगर विवेक तो मुझसे उलटा नफरत करने लगा था।”

“तू एक बार एकांत में विवेक से मिल तो ले…प्लीज अंजला! इसे मेरी रिक्वेस्ट समझ ले।”

“ठीक है…मैं साहस बटोरने की कोशिश करूंगी‒मगर कब? कहां?”

“जब तुझे लगे कि महेश को कोई ऐसा संदेह न होगा।”

“महेश की ओर से मेरे ऊपर कोई पाबंदी नहीं है…वैसे भी वह आज सुबह की फ्लाइट से डैडी के साथ दिल्ली चले गए हैं…अमरीका से कैन्सर का कोई बहुत बड़ा स्पेशलिस्ट पन्द्रह दिन के लिए दिल्ली में आया हुआ है-डैडी की आस बंध गई है, शायद उसके हाथों महेश का ऑपरेशन सफल हो जाए।”

“कब तक लौटेंगे?”

“आठ-दस दिन तो लग ही जाएंगे…जाने कौन-सी डेट मिले।”

“बस तो मैं जल्दी ही तुम दोनों की मुलाकात अरेंज करके तुम्हें फोन कर दूंगी।”

“ठीक है।”

“मगर अंजला मेरे परामर्श पर जरूर विचार करना, अगर किसी बहुत भले काम के लिए जान-बूझकर किया गया कोई ‘पाप’ हो भी जाए तो भगवान उसे पाप नहीं मानता।”

इतना कहकर देवयानी चली गई…अंजला खड़ी हुई सोचती रह गई। उसकी आंखों से गहरा असमंजस झलक रहा था।

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