Balance between work fatigue, household responsibilities, and emotions
Balance between work fatigue, household responsibilities, and emotions

दिनभर की भागदौड़ में अक्सर हम खुद को पीछे छोड़ देते हैं, जिससे मन और रिश्ते दोनों प्रभावित
होते हैं। ऐसे में जरूरी है कि हम अपनी जिम्मेदारियों के साथ-साथ अपनी भावनाओं को भी समझें
और उन्हें जगह दें, ताकि जीवन में शांति, संतोष और रिश्तों में मधुरता बनी रहे।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अगर किसी चीज पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है, तो वह है- हमारे रिश्ते। सुबह से लेकर रात तक काम की जिम्मेदारियां, घर की चिंता और लगातार बनी रहने वाली थकान हमें इतना व्यस्त कर देती है कि हम अनजाने में अपनों को समय देना भूल जाते हैं। हम खुद को यह कहकर समझा लेते हैं कि जो मेहनत हम कर रहे हैं, वह उन्हीं के लिए है, इसलिए शायद हमारी गैरमौजूदगी को समझ लिया जाएगा। लेकिन रिश्ते सिर्फ जिम्मेदारियां निभाने से नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव से जिंदा रहते हैं। एक ही छत के नीचे रहना, साथ बैठना या रोज मिलना ही काफी नहीं होता। रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है कि हम सच में एक-दूसरे को महसूस करें, सुनें और समझें। जब भावनात्मक जुड़ाव कम होने लगता है, तो दूरियां भी धीरे-धीरे बढ़ने लगती हैं।

अक्सर हम कहते हैं, मेरे पास समय नहीं है। लेकिन सच यह है कि समय सबके पास बराबर होता है, कमी होती है तो मानसिक और भावनात्मक ऊर्जा की। काम का दबाव, परफॉरमेंस की चिंता, आर्थिक असुरक्षा और भविष्य को लेकर तनाव, ये सब हमारी ऊर्जा को धीरे-धीरे खत्म कर
देते हैं। नतीजा यह होता है कि घर आकर हम सिर्फ शारीरिक रूप से मौजूद रहते हैं, भावनात्मक रूप से नहीं। रिश्तों को संतुलित रखने के लिए समझना जरूरी है कि थकान सिर्फ शरीर की नहीं, मन की भी होती है।

रिश्ते रातों-रात नहीं बिगड़ते। वे खामोशी के साथ धीरे-धीरे कमजोर होते हैं। जरूरत भर की बातचीत, साथ रहते हुए अकेलापन महसूस होना, छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन और एक-दूसरे की तकलीफों को नजरअंदाज करना। जब काम और थकान हमारी प्राथमिकता बन जाते हैं, तो
रिश्ते अपने आप पीछे छूटने लगते हैं।

कई लोग मान लेते हैं कि करियर और रिश्तों में से किसी एक को चुनना पड़ेगा। यही सबसे बड़ी गलतफहमी है। काम जरूरी है क्योंकि वह सुरक्षा देता है और रिश्ते जरूरी हैं क्योंकि वे सुकून देते हैं।
संतुलन का अर्थ यह नहीं कि दोनों को बराबर समय दिया जाए, बल्कि यह है कि जिस पल जिस चीज की जरूरत हो, उस पल पूरी तरह वहीं मौजूद रहा जाए।

रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए रोज घंटों का समय निकालना जरूरी नहीं। कई बार दस मिनट की सच्ची बातचीत, घंटों की चुप्पी से ज्यादा असरदार होती है। मोबाइल से दूर होकर बात करना, सामने वाले की बात बीच में न काटना और समाधान देने के बजाय समझने के लिए सुनना, यही
छोटे-छोटे पल रिश्तों में गहराई लाते हैं।

अक्सर हम अपना सारा गुस्सा उन्हीं पर निकाल देते हैं जो हमारे सबसे करीब होते हैं। यह सोचकर कि ये तो अपना है, समझ जाएगा। लेकिन बार-बार ऐसा करना रिश्तों में असुरक्षा और दूरी पैदा करता है। थकान को पहचानना और उसे सही तरीके से संभालना रिश्तों को सुरक्षित रखने के लिए
जरूरी है।

जब घर सिर्फ जिम्मेदारियों की जगह बन जाता है, तो रिश्ते बोझ लगने लगते हैं। कामों को मिल-बांटकर करना, परफेक्ट होने की जिद छोड़ना और हर बात पर नियंत्रण न रखना, घर को सुकून की जगह बनाता है। जहां अपनापन होता है, वहां बाहर की थकान भी कम महसूस होती है।

अक्सर रिश्ते इसलिए नहीं टूटते कि प्यार कम हो गया, बल्कि इसलिए टूटते हैं क्योंकि बातचीत बंद हो जाती है। खुलकर, ईमानदारी से और बिना आरोप लगाए बातें करना रिश्तों को समझने का सबसे आसान रास्ता है, लड़ने का नहीं।

जो व्यक्ति खुद ही थका, टूटा और खाली महसूस करता है, वह दूसरों को क्या दे पाएगा। पूरी नींद लेना, सीमाएं तय करना और जरूरत पड़ने पर ना कहना स्वार्थ नहीं, बल्कि रिश्तों में किया गया सबसे बेहतरीन निवेश है।

हर रिश्ते में उतार-चढ़ाव आते हैं। हर दिन समझदारी और धैर्य दिखाना आसान नहीं होता। रिश्ते परफेक्ट होने से नहीं, बल्कि ईमानदार कोशिशों से चलते हैं।

कई बार रिश्तों में तनाव की वजह थकान नहीं, बल्कि अनकही अपेक्षाएं होती हैं। जब हम बिना कहे समझे जाने की उम्मीद रखते हैं, तो निराशा जन्म लेती है। अपेक्षाओं को शब्द देना रिश्तों को हल्का
बनाता है।

एक छोटा-सा धन्यवाद या मुझे अच्छा लगा जैसे वाक्य रिश्तों में नई ऊर्जा भर देते हैं। सराहना यह एहसास दिलाती है कि सामने वाले की मौजूदगी मायने रखती है।

रिश्तों के लिए सही समय खुद नहीं आता, उसे बनाना पड़ता है। थोड़ी-सी सजगता, थोड़ा-सा प्रयास और थोड़ी-सी संवेदनशीलता रिश्तों को टूटने से बचा सकती है।

रिश्तों में सबसे जरूरी चीज शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक मौजूदगी होती है। कई बार हम सामने बैठे होते हैं, लेकिन हमारा मन कहीं और भटका रहता है। ऐसे में सामने
वाला खुद को अनदेखा महसूस करता है।

हम अक्सर अपनी थकान को छुपाने की कोशिश करते हैं, यह सोचकर कि शिकायत करना कमजोरी है। लेकिन जब थकान साझा नहीं की जाती, तो वह चिड़चिड़ेपन और दूरी का रूप ले लेती है।

रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए बड़े-बड़े प्रयासों की जरूरत नहीं होती। साथ में चाय पीना, दिन का हाल पूछना, सोने से पहले दो मिनट की बातचीत। ये छोटे रिवाज रिश्तों को स्थिरता देते हैं।

Listening is also a responsibility
Listening is also a responsibility

अक्सर हम सुनते कम हैं और जवाब देने की तैयारी ज्यादा करते हैं। सही मायनों में सुनना, बिना टोके, बिना जज किए रिश्तों के लिए बेहद जरूरी है। जब कोई महसूस करता है कि उसकी बात ध्यान
से सुनी जा रही है, तो उसका मन खुलता है और रिश्ते गहरे होते हैं। सुनना, प्यार जताने का सबसे शांत लेकिन असरदार तरीका है।

Laughter moments are essential
Laughter moments are essential

जिंदगी की गंभीरता के बीच हंसी कहीं खो जाती है। जबकि साथ हंसना रिश्तों को हल्का और मजबूत बनाता है। हंसी याद दिलाती है कि रिश्ता सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, खुशी भी है।

उत्तराखंड से ताल्लुक रखने वाली तरूणा ने 2020 में यूट्यूब चैनल के ज़रिए अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद इंडिया टीवी के लिए आर्टिकल्स लिखे और नीलेश मिश्रा की वेबसाइट पर कहानियाँ प्रकाशित हुईं। वर्तमान में देश की अग्रणी महिला पत्रिका...