Pregnancy and Post Pregnancy Diet: गर्भवती महिला पौष्टिक भोजन नहीं लेगी तो वह एनिमिक हो सकती है, तकलीफदेह प्रेगनेंसी, सीजेरियन डिलीवरी, ब्रेस्ट में दूध की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
हर स्त्री के लिए मां बनना जीवन का बेहद सुखद अनुभव होता है। पल-पल गर्भ में पलते शिशु और मां के बीच सामीह्रश्वय बढ़ता जाता है। साथ ही कई तरह की हिदायतें भी अनुभवी मांओं और डाक्टर द्वारा दी जाती हैं। जैसे ऐसे उठना, ऐसे बैठना, धीरे-धीरे चलो, ये करो वो मत करो आदि। इन तमाम हिदायतों के साथ-साथ क्या खाना है, क्या नहीं और कितना खाना है, इसका डाइट प्लान डाइटीशियनों द्वारा बनाया जाता है, ताकि शुरुआती समय में गर्भवती स्त्री अक्सर होने वाली आम समस्याओं जैसे मॉर्निंग सिकनेस, बार-बार उल्टी होना, थकान महसूस करना, कुछ खास खाने की जबरदस्त क्रेविंग तो किसी खाद्य-पदार्थ की खुशबू से भी असहजता महसूस करना। ऐसे में डाइटीशियन श्रेया कत्याल बता रही हैं कि डिलीवरी से पहले और बाद में गर्भवती महिला का खानपान कैसा होना चाहिए।
बैलेंस्ड डाइट
डाइटीशियन श्रेया कहती हैं कि हर प्रेगनेंट महिला के लिए जरूरी है कि वह सही बैलेंस्ड डाइट ले। अगर गर्भवती महिला पौष्टिक भोजन नहीं लेगी तो वह एनिमिक हो सकती है, कोई भी इन्फेक्शन जल्दी लग सकता है, तकलीफदेह प्रेगनेंसी, सीजेरियन डिलीवरी, ब्रेस्ट में दूध की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
गर्भावस्था में सही पोषण जरूरी
एक गर्भवती महिला को न सिर्फ गर्भ में पल रहे शिशु, बल्कि गर्भाशय को भी पोषित करना जरूरी होता है। भ्रूण की तरह गर्भाशय को भी पोषण की आवश्यकता होती है। जरूरी व ध्यान देने योग्य बात है कि शुरुआती 20 हफ्तों तक जितना भी खाना एक गर्भवती स्त्री खाती है उसका 70′ मां को और 30′ बच्चे को लगता है। इसी कारण गर्भवती स्त्री का वजन शुरुआती समय में तेजी से बढ़ता है। आखिर के पांच से नौ महीने तक 70 से 80′ तक भोजन जो गर्भवती स्त्री द्वारा खाया जाता है, वह बच्चे को लगता है और 20 से 30′ तक गर्भवती स्त्री को। इसी तरह एक स्वस्थ गर्भवती स्त्री का वजन पहले तीन महीनों में 1-2 किलो तक बढ़ता है, फिर हर हफ्ते आधा किलो तक वजन बढ़ता है।
नौ महीने तक की आहार योजना
गर्भावस्था का समय जैसे-जैसेे बढ़ता है, वैसे-वैसे डाइट प्रोग्राम में भी बदलाव लाना जरूरी होता है। क्योंकि हर समय जरूरतें अलग-अलग होती है। यहां नौ महीने को तीन भागों में बांट कर आहार योजना की चर्चा की जा सकती है-
प्रथम तीन माह- शुरुआती गर्भावस्था के समय माॄनग सिकनेस, चक्कर आना, उल्टी होना आदि आम शिकायतें रहती ही हैं। ऐसे में गर्भवती को खाने-पीने की इच्छा नहीं होती है। डाइटीशियन कहती हैं कि इच्छा न होने पर भी पौष्टिक आहार लेना जरूरी है। कभी-कभी खाली पेट तो कभी किसी-विटामिन की कमी से भी उल्टियां होती हैं। शुरू के तीन महीनों में अधिक कैलोरी लेने की जरूरत नहीं होती, पर पौष्टिक खाना जरूरी है अत: भोजन में प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट, फैट और ओमेगा थ्री फैटी एसिड्स का सही संतुलन जरूरी है। यदि उल्टी ज्यादा आ रही है तो थोड़े-थोड़े समय पर कुछ न कुछ खाते रहना चाहिए। उल्टी से घबरा कर खाना पीना न छोड़ें।
द्वितीय तिमाही- दूसरी तिमाही में गर्भवती महिला की पोषण की जरूरतों में बढ़ोतरी होने लगती है। इसलिए अतिरिक्त विटामिन, मिनरल आदि लेने जरूरी हो जाते हैं। इसका मुख्य कारण है कि गर्भवती के गर्भाशय व स्तन का आकार बढ़ने लगता है। बीजांडाशय भी बढ़ने लगता है। रक्त की जरूरत बढ़ जाती है अत: इन सबके लिए एक्स्ट्रा प्रोटीन लेना जरूरी हो जाता है।
तृतीय तिमाही- आखिर के तीन महीनों में शिशु का वजन तेजी से बढ़ने लगता है। मस्तिष्क का विकास आखिरी दो महीनों में बहुत तेजी से होता है। शिशु के लिवर के लिए अतिरिक्त आयरन की जरूरत होती है। ‘नो रिस्क प्रेगनेंसी डाइट’ के अनुसार समुचित मात्रा में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट आदि लेना चाहिए।
भोजन संबंधी जरूरी हिदायते
जब भी खाना खायें उसमें 15 से 20′ तक प्रोटीन होनी चाहिए। इसके मुख्य स्रोत होते हैं दूध, दूध से बनी चीजें, दालें, अनाज, मांस, मछली आदि। यह टिश्यू निर्माण, शिशु विकास के लिए जरूरी है।
1. कार्बोहाइड्रेट की मात्रा भोजन में 50 से 60′ तक होनी चाहिए। चॉकलेट, पेस्ट्री आदि न लें, क्योंकि इनसे वजन बढ़ता है और डाइबिटीज होने का खतरा भी। ब्राउन राईस, गेहूं की रोटी, शकरकंदी आदि लें।
2. भोजन में फैट की मात्रा 20 से 30′ होनी चाहिए। घी का सेवन अच्छा रहता है, यह बच्चे की ग्रोथ में सहायक होता है। सूखे मेवे, अंडा, तेल, मक्खन, क्रीमयुक्त दूध भी लें। यह ऊर्जा उत्पादन, विटामिन अवशोषण में मदद करता है।
3. ओमेगा थ्री फैटी एसिड भी शिशु के विकास के लिए जरूरी है। जो महिलाएं मांसाहारी नहीं हैं, वह प्रतिदिन एक टेबलस्पून अलसी के बीज जरूर लें। अखरोट लें।
4. अंतिम तीन महीनों में एहतियात के तौर पर आयरन लेना चाहिए ताकि वजन नियंत्रण में रहे व प्रसव के दौरान कठिनाइयों से बचा जा सके।
5.कैल्शियम दूध और दूध से बनी चीजों, अंडा, मांस, मछली शलजम के पत्तों में मिलता है। भोजन में पर्याह्रश्वत कैल्शियम होने पर फॉस्फोरस की आवश्यकता भी पूरी हो जाती है।
डिलीवरी के बाद कैसा हो भोजन
कहते हैं कि शिशु को जन्म देना मां के लिए पुर्नजन्म के समान होता है, पर डिलीवरी के बाद महिलाएं अपनी पुरानी शारीरिक अवस्था में आने के लिए तुरंत जिम आदि का सहारा ले लेती है। डाइटीशियन श्रेया कहती हैं कि ऐसा बिलकुल सही नहीं है। ठीक से खाना नहीं खाएंगी तो ताकत कहां से आएगी, उसका असर ‘मिल्क प्रोडक्शन’ पर पड़ेगा। अत: 1800 से 2000 कैलोरी डाइट तो ब्रेस्टफीडिंग महिला को
अवश्य लेना चाहिए। डाइट यानि भोजन ऐसा हो जो हल्का व सुपाच्य हो। गरिष्ठ व तला भुना भोजन खाने से उसका असर बच्चे पर पड़ता है क्योंकि वह सिर्फ और सिर्फ मां के दूध पर
निर्भर रहता है। चार-पांच महीने जिम आदि
न जाएं। फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा बताई गई एक्सरसाइज करें, स्वस्थ व खुश रहने का
प्रयास करें।
