Indian Parliament building with budget briefcase, money, coins, and financial symbols in the foreground.
Indian Parliament building with budget briefcase, money, coins, and financial symbols in the foreground.

Summary: Union Budget 2026: आसान भाषा में समझें हर जरूरी बजट टर्म्स और कॉन्सेप्ट्स

यूनियन बजट 2026 पेश होने वाला है, जिसमें टैक्स, महंगाई, बचत और सरकारी खर्च जैसी चीज़ें आम लोगों की ज़िंदगी पर असर डालती हैं। बजट से जुड़े जरूरी टर्म्स और कांसेप्ट्स को समझकर आप अपने फाइनेंशियल फैसले बेहतर तरीके से ले सकते हैं।

Union Budget 2026: हर साल यूनियन बजट से पहले देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े कई शब्द अचानक चर्चा में आ जाते हैं। नौकरीपेशा लोगों, कारोबारियों, किसानों, युवाओं और महिलाओं सभी की ज़िंदगी पर बजट का असर अलग-अलग तरीके से पड़ता है। टैक्स, महंगाई, बचत और खर्च से जुड़े फैसले न सिर्फ प्रोफेशनल लाइफ, बल्कि घर की फाइनेंशियल प्लानिंग को भी प्रभावित करते हैं। ऐसे में यूनियन बजट 2026 को सही तरीके से समझने के लिए बजट से जुड़े ज़रूरी टर्म्स को आसान भाषा में जानना बेहद ज़रूरी हो जाता है।

यूनियन बजट केंद्र सरकार का सालाना आर्थिक दस्तावेज़ होता है, जिसमें सरकार अगले एक साल की आमदनी और खर्च का पूरा खाका पेश करती है। भारत में बजट वित्त वर्ष के आधार पर बनाया जाता है, जो 1 अप्रैल से शुरू होकर 31 मार्च तक चलता है। इसलिए यूनियन बजट 2026 असल में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पेश किया जाएगा।

Budget 2026 workspace with calculator, charts, coins, rupee bag, and briefcase
Union budget 2026 will be presented on 1 Feb, 2026

हर साल भारत के वित्त मंत्री 1 फरवरी को संसद में यूनियन बजट पेश करते हैं। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए यूनियन बजट 2026 रविवार, 1 फरवरी 2026, सुबह 11 बजे संसद में पेश किया जाएगा। यह इतिहास में पहली बार होगा जब यूनियन बजट किसी रविवार को पेश किया जाएगा।

सरकार की कुल कमाई को राजस्व (Revenue) कहा जाता है। इसमें इनकम टैक्स, जीएसटी, कस्टम ड्यूटी और सरकारी कंपनियों से होने वाली आय शामिल होती है। दूसरी ओर, सरकार द्वारा किए जाने वाले कुल खर्च को व्यय (Expenditure) कहा जाता है। इसमें सैलरी, पेंशन, सब्सिडी, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास कार्यों पर होने वाला खर्च आता है। आसान शब्दों में कहें तो राजस्व सरकार की कमाई है और व्यय सरकार का खर्च।

सरकार का हर खर्च एक जैसा नहीं होता। जो खर्च रोज़मर्रा की ज़रूरतों पर किया जाता है, उसे राजस्व व्यय (Revenue Expenditure) कहा जाता है। इसमें कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन और ब्याज भुगतान जैसे खर्च शामिल होते हैं, जिनसे भविष्य के लिए कोई नई संपत्ति नहीं बनती।

इसके विपरीत, जो खर्च भविष्य को ध्यान में रखकर किया जाता है, वह पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) कहलाता है। सड़कें, रेलवे, मेट्रो, एयरपोर्ट, स्कूल और अस्पताल जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट इसी श्रेणी में आते हैं। इस तरह के निवेश से रोज़गार के अवसर बढ़ते हैं और लंबे समय में अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।

जब सरकार की रोज़मर्रा की कमाई, उसके रोज़मर्रा के खर्च से कम पड़ जाती है, तो इसे राजस्व घाटा (Revenue Deficit) कहा जाता है। इसका मतलब है कि सरकार अपने नियमित खर्च भी उधार लेकर चला रही है।

वहीं राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) सरकार की कुल आमदनी और कुल खर्च के बीच का अंतर होता है। उदाहरण के तौर पर, अगर सरकार को 100 रुपये खर्च करने हैं और उसकी कमाई सिर्फ 85 रुपये की है, तो 15 रुपये का राजकोषीय घाटा होगा। इसी घाटे को पूरा करने के लिए सरकार कर्ज़ लेती है।

सरकार की आय का सबसे बड़ा ज़रिया टैक्स होता है। जो टैक्स नागरिक सीधे सरकार को देते हैं, उसे प्रत्यक्ष कर (Direct Tax) कहा जाता है। इनकम टैक्स और कॉर्पोरेट टैक्स इसके प्रमुख उदाहरण हैं। यह टैक्स व्यक्ति की आय पर निर्भर करता है।

Stacks of coins labeled ‘TAX’ beside a small potted plant, symbolizing tax growth and savings.
Learn concept of ‘tax’ to understand budget

वहीं जो टैक्स सामान या सेवाएं खरीदते समय चुकाया जाता है, उसे अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax) कहा जाता है। जीएसटी (Goods and Services Tax) इसका सबसे आम उदाहरण है, जो कीमत में जुड़ा होता है। आज जब बड़ी संख्या में लोग, खासकर महिलाएं, नौकरी और फ्रीलांसिंग से कमाई कर रही हैं, तो टैक्स से जुड़े बदलाव उनकी सेविंग और फाइनेंशियल प्लानिंग को भी सीधे प्रभावित करते हैं।

इनकम टैक्स सिस्टम में आय के अनुसार अलग-अलग दरें तय होती हैं, जिन्हें टैक्स स्लैब (Tax Slab) कहा जाता है। बजट के दौरान टैक्स स्लैब में बदलाव की घोषणा सबसे ज़्यादा चर्चा में रहती है।

वहीं स्टैंडर्ड डिडक्शन (Standard Deduction) सैलरी पाने वाले लोगों को मिलने वाली एक तय छूट होती है, जिससे उनकी टैक्सेबल इनकम कम हो जाती है और टैक्स का बोझ कुछ हद तक घटता है।

जब सरकार किसी ज़रूरी चीज़ की कीमत कम रखने के लिए उसका कुछ खर्च खुद उठाती है, तो उसे सब्सिडी (Subsidy) कहा जाता है। गैस सिलेंडर, खाद, बिजली और कुछ खाद्य पदार्थों पर मिलने वाली राहत इसके आम उदाहरण हैं। सब्सिडी से जुड़े फैसले घरेलू बजट, खेती और छोटे व्यवसायों को प्रभावित करते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी सक्रिय भूमिका निभाती हैं।

जब सरकार अपनी किसी सरकारी कंपनी के कुछ शेयर बेचती है, तो इसे विनिवेश (Disinvestment) कहा जाता है। इससे सरकार को अतिरिक्त संसाधन जुटाने में मदद मिलती है और कंपनियों की कार्यक्षमता बढ़ाने की कोशिश की जाती है।

अगर किसी सरकारी कंपनी का पूरा या बड़ा नियंत्रण निजी हाथों में चला जाता है, तो उसे निजीकरण (Privatization) कहा जाता है। इन फैसलों का असर नौकरी, कामकाज के माहौल और निवेश से जुड़े अवसरों पर पड़ सकता है।

रोज़मर्रा की चीज़ों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी को महंगाई (Inflation) कहा जाता है। इसका असर हर परिवार पर पड़ता है, खासतौर पर घर के खर्च और बजट मैनेजमेंट पर।

वहीं जीडीपी (GDP – Gross Domestic Product) यह बताती है कि देश में एक साल के भीतर कितनी आर्थिक गतिविधि हुई। जीडीपी के आंकड़े देश की आर्थिक सेहत और विकास की दिशा को समझने में मदद करते हैं।

यूनियन बजट से एक दिन पहले सरकार आर्थिक सर्वेक्षण पेश करती है। इसमें देश की अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति, चुनौतियां और आगे की दिशा का आकलन किया जाता है। बजट की कई घोषणाओं की नींव इसी सर्वेक्षण पर रखी जाती है।

Desk with charts, calculator, rupee bag, coins, and Indian flag representing Economic Survey.
economic survey

यूनियन बजट सिर्फ आंकड़ों का दस्तावेज़ नहीं है। इसका सीधा असर आम नागरिक की सैलरी, टैक्स, महंगाई और बचत पर पड़ता है। जब बजट से जुड़े ज़रूरी टर्म्स समझ में आते हैं, तो घोषणाओं को सही संदर्भ में देख पाना आसान हो जाता है। यूनियन बजट 2026 से पहले इन शब्दों की समझ हर वर्ग नौकरीपेशा, कारोबारी, युवा और महिलाएं को बजट के फैसलों का असर बेहतर तरीके से समझने में मदद करेगी।

सोनल शर्मा एक अनुभवी कंटेंट राइटर और पत्रकार हैं, जिन्हें डिजिटल मीडिया, प्रिंट और पीआर में 20 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने दैनिक भास्कर, पत्रिका, नईदुनिया-जागरण, टाइम्स ऑफ इंडिया और द हितवाद जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम किया...