Summary: ठंड में लौट आई अधूरी कहानी
सर्द रात की ठिठुरन में दो पुराने प्रेमी आमने-सामने आते हैं, जहाँ ठंड से ज़्यादा उनकी अधूरी चाहत सिहरन पैदा करती है। कंबल के भीतर सिमटी नज़दीकी, उन्हें फिर याद दिला देती है कि कुछ एहसास कभी ठंडे नहीं पड़ते।
Romantic Story in Hindi: जनवरी की रात थी। हवा इतनी ठंडी कि खिड़कियों के शीशे धुंध से भर गए थे। हीटर चल रहा था, फिर भी कमरे में एक अजीब-सी ठिठुरन थी या शायद वो ठिठुरन बाहर की नहीं थी। रुमनी कंबल ओढ़े सोफ़े पर बैठी थी। उँगलियाँ मग को थामे हुए थीं, लेकिन चाय कब की ठंडी हो चुकी थी। उसकी नज़र बार-बार दरवाज़े पर जा टिकती। घड़ी की टिक-टिक हर सेकंड को भारी बना रही थी।
दरवाज़ा खुलने की हल्की-सी आवाज़ हुई। वो आ गया था।
शिवम ने जैकेट उतारते हुए उसे देखा। वही पुरानी नज़र…धीमी, गहरी, जैसे वक़्त ने उसे ज़्यादा शांत और ज़्यादा ख़तरनाक बना दिया हो। सात महीने बाद पहली मुलाक़ात थी और दोनों जानते थे… यह मुलाक़ात आसान नहीं होगी।
“अब भी ठंड जल्दी लग जाती है?”
उसने सामान्य-सा पूछा, लेकिन आवाज़ में कुछ ऐसा था, जिसने रुमनी की गर्दन के पीछे रोंगटे खड़े कर दिए।
“ठंड से ज़्यादा… ख़ालीपन से,” उसने जवाब दिया।
शिवम पास आया। कमरे में उसकी गर्मी महसूस होने लगी। उसने हीटर बंद कर दिया।
“ठंड असली होनी चाहिए,” उसने कहा, “तभी गर्मी का मतलब समझ आता है।”
रुमनी हँसना चाहती थी, लेकिन हँसी गले में अटक गई। शिवम उसके सामने बैठ गया…बहुत पास। इतना कि उसके घुटने रुमनी के घुटनों से छू गए। वो हल्का-सा स्पर्श, जैसे किसी ने बर्फ़ पर उँगली रख दी हो।
“हाथ ठंडे हैं,” उसने कहा।
रुमनी ने जवाब नहीं दिया। शिवम ने उसकी उँगलियाँ अपने हाथों में ले लीं। उसकी हथेलियाँ गर्म थीं…इतनी कि ठंड चुभने लगी। वो उसकी उँगलियों को रगड़ता रहा, जैसे सिर्फ़ हाथ नहीं, उसकी बेचैनी भी पिघलाना चाहता हो।
कमरे में कोई संगीत नहीं था, फिर भी दिल की धड़कनें साफ़ सुनाई दे रही थीं।
“याद है,” शिवम ने धीमे से कहा, “तुम कहती थीं सर्दियाँ झूठी होती हैं… असली ठंड इंसान के अंदर होती है।”
रुमनी की पलकों ने काँपते हुए आँखें ढँक लीं। “और तुम कहते थे…अगर कोई पास हो, तो ठंड भी बहाना बन जाती है।”
शिवम थोड़ा और पास आया। उसकी साँस रुमनी के गाल को छूने लगी। कोई चुंबन नहीं…बस साँसों की गर्मी। लेकिन वही काफ़ी थी। उसकी रीढ़ में एक लहर दौड़ गई।
“अगर मैं कहूँ,” शिवम ने फुसफुसाया…“कि मैं आज भी तुम्हें ऐसे ही गर्म करना चाहता हूँ…”
रुमनी ने आँखें खोलीं। उसकी नज़र में डर नहीं था…सिर्फ़ इंतज़ार।
“तो मैं कहूँगी… आज ठंड बहुत ज़्यादा है।”
शिवम ने उसे अपनी ओर खींच लिया। कोई झटकेदार हरकत नहीं…बस इतना कि दोनों एक ही कंबल में आ जाएँ। उसकी बाँहें रुमनी के चारों ओर थीं और ठंड धीरे-धीरे हार मान रही थी।
उसका माथा रुमनी की गर्दन से लगा। साँसें गहरी थीं। शरीर पास थे, लेकिन पल अभी भी ठहरा हुआ था वो पल, जहाँ एक कदम सब कुछ बदल देता है। खिड़की के बाहर कोहरा और गाढ़ा हो रहा था। अंदर, दो जिस्म एक-दूसरे की गर्मी सीख रहे थे।
और रुमनी जानती थी..सर्द रातों में जो पासियाँ जलती हैं, वो दिन की धूप से कहीं ज़्यादा गहरी सिहरन देती हैं।
