Overview:‘डाइनिंग विद द कपूर्स’ में सामने आई वह कहानी, जहाँ विरासत और बदलता वक्त एक साथ जुड़ते हैं
रीमा जैन के खुलासे से यह साफ हो जाता है कि देवनार कॉटेज को बेचने का फैसला आसान नहीं था। यह भावनाओं, यादों और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाने का परिणाम था। कपूर परिवार ने यह समझा कि इमारतें समय के साथ बदल जाती हैं, लेकिन रिश्ते, यादें और विरासत दिलों में हमेशा जिंदा रहती हैं।
Raj Kapoor Devanar Cottage: हिंदी सिनेमा के शोमैन कहे जाने वाले राज कपूर सिर्फ एक अभिनेता या निर्देशक नहीं थे, बल्कि एक पूरे युग की पहचान थे। उनका मुंबई स्थित देवनार कॉटेज कपूर परिवार के लिए केवल एक घर नहीं, बल्कि यादों, रिश्तों और सिनेमा के सुनहरे दौर का प्रतीक रहा है। हाल ही में ‘डाइनिंग विद द कपूर्स’ कार्यक्रम में राज कपूर की बेटी रीमा जैन ने पहली बार खुलकर बताया कि आखिर कपूर परिवार को यह ऐतिहासिक घर गोदरेज प्रॉपर्टीज को बेचने का फैसला क्यों लेना पड़ा। उनकी बातों में भावनाओं की सच्चाई और समय की मजबूरी दोनों साफ झलकती हैं।
सिर्फ एक मकान नहीं, एक दौर की निशानी
देवनार कॉटेज वह जगह थी जहाँ कपूर परिवार की कई पीढ़ियों ने साथ समय बिताया। यहीं हँसी-ठिठोली हुई, पारिवारिक चर्चाएँ चलीं और फिल्मों से जुड़े बड़े फैसले लिए गए। राज कपूर के लिए यह घर उनकी रचनात्मकता और पारिवारिक जीवन का केंद्र था। रीमा जैन के अनुसार, इस घर की हर दीवार में कोई न कोई कहानी छुपी थी, जो परिवार के हर सदस्य के दिल से जुड़ी हुई थी।
बदलता वक्त और बदलती ज़रूरतें
शो में राज कपूर की बेटी रीमा जैन ने देवनार कॉटेज को बेचने के पीछे का कारण बताया। उन्होंने बताया कि उनकी मां कृष्णा कपूर ने अपने बच्चों को सलाह दी थी कि जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुँचने से बचाने के लिए वे अपने जीवनकाल में ही इस विशाल संपत्ति को बेच दें। रीमा जैन ने बताया कि समय के साथ परिवार बड़ा होता गया और जीवनशैली भी बदलती चली गई। देवनार कॉटेज, जो कभी सभी के लिए पर्याप्त था, धीरे-धीरे व्यावहारिक रूप से कठिन होने लगा। मेंटेनेंस, जगह की सीमाएँ और आधुनिक जरूरतों के सामने पुरानी संरचना टिक नहीं पा रही थी। यह फैसला भावनात्मक रूप से कठिन था, लेकिन व्यवहारिक नजरिए से जरूरी बन गया।
भावनाओं और जिम्मेदारियों के बीच लिया गया फैसला
रीमा जैन ने साफ कहा कि यह निर्णय किसी जल्दबाजी में नहीं लिया गया। परिवार के हर सदस्य ने लंबे समय तक इस पर विचार किया। एक ओर पिता की यादें थीं, दूसरी ओर आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी। आखिरकार यह समझा गया कि यादें दिलों में सुरक्षित रहती हैं, किसी इमारत तक सीमित नहीं होतीं।
कपूर परिवार की एकजुट सोच
इस फैसले में कपूर परिवार की एकजुटता भी देखने को मिली। रीमा जैन के अनुसार, सभी ने मिलकर यह तय किया कि भविष्य को देखते हुए क्या सही होगा। किसी एक व्यक्ति का फैसला नहीं था, बल्कि सामूहिक सहमति से लिया गया कदम था। यही कपूर परिवार की खासियत रही है कि बड़े फैसले हमेशा आपसी समझ से लिए गए।
देवनार कॉटेज से जुड़ी आखिरी यादें
घर बिकने से पहले परिवार ने वहां बिताए पलों को सहेजने की कोशिश की। पुरानी तस्वीरें, यादगार चीजें और भावनात्मक जुड़ाव – सबको संभालकर रखा गया। रीमा जैन ने बताया कि घर भले ही बिक गया हो, लेकिन उससे जुड़ी भावनाएँ आज भी उतनी ही जीवित हैं।
विरासत इमारतों से नहीं, संस्कारों से बनती है
रीमा जैन ने बातचीत में यह भी कहा कि राज कपूर की असली विरासत उनकी सोच, उनका सिनेमा और उनके संस्कार हैं, न कि कोई मकान। देवनार कॉटेज बेचना इस विरासत को खत्म करना नहीं, बल्कि समय के साथ आगे बढ़ने का एक तरीका था। कपूर परिवार आज भी उन्हीं मूल्यों को आगे बढ़ा रहा है, जो राज कपूर ने उन्हें सिखाए थे।
