Summary: मां की समझ और भरोसे ने बेटे को बनाया आत्मनिर्भर और संवेदनशील
निकिता ने बेटे आरव की परवरिश में डर नहीं, समझ और भरोसे को प्राथमिकता दी। इस प्रक्रिया ने आरव को आत्मनिर्भर, संवेदनशील और जिम्मेदार बनाया।
Short Story in Hindi: सुबह की धूप हल्के से पर्दों के आर-पार कमरे में उतर रही थी। निकिता ने चाय का प्याला हाथ में लिया और अपने बेटे आरव को देखा, जो टेबल पर झुका हुआ कुछ लिख रहा था। उसकी आँखों में वही एकाग्रता थी जो कभी तीन साल की उम्र में खिलौनों को जोड़ते समय हुआ करती थी। उस पल निकिता के मन में यादों का सिलसिला खुल गया, उन सालों का सफ़र, जब उसने अपने बच्चे को सिर्फ बड़ा नहीं किया, बल्कि उसकी दुनिया को समझना सीखा।
आरव जब तीन साल का था, तो उसकी हर बात में ‘क्यों’ छिपा रहता था। “मम्मी, बादल क्यों रोते हैं?”, “सूरज रोज़ ऑफिस क्यों जाता है?”, निकिता के आसपास के लोग उसकी सवालों की झड़ी से परेशान हो जाते थे, पर निकिता मुस्कुरा देती थी। वो जानती थी कि ये जिद नहीं, जिज्ञासा है। हर सवाल का जवाब वो एक कहानी में बदल देती ,“सूरज ऑफिस नहीं जाता बेटा, वो सबको रोशनी देने आता है, ताकि दिन शुरू हो सके।” धीरे-धीरे आरव ने जवाब याद करना नहीं, सोचने की कला सीख ली। उसकी दुनिया में तर्क नहीं, कल्पनाएँ बसने लगीं।
एक दिन जब आरव पाँच साल का था, तो उसने पड़ोसी के बगीचे से फूल तोड़ लिए। हाथ में गुलदस्ता लेकर आया और बोला, “मम्मी, ये आपके लिए।” निकिता ने मुस्कुराकर फूल लिए, लेकिन उसे पार्क में वापस ले गई। पौधे की टूटी शाखा दिखाकर उसने कहा, “देखो बेटा, जैसे ये पौधा अपना फूल खोकर अधूरा हो गया, वैसे ही अगर तुम्हारी ड्रॉइंग की किताब में कोई पेज फाड़ दे तो कैसा लगेगा?” आरव चुप हो गया। अगले दिन वो खुद एक छोटा गमला लेकर आया और बोला, “अब मैं नया फूल लगाऊँगा।” उस दिन निकिता ने जाना कि बच्चों को डर से नहीं, एहसास से सिखाया जा सकता है।
समय बीतता गया। जब आरव नौ साल का हुआ, तो स्कूल में मैथ्स उसकी कमजोरी बन गई। हर बार कम नंबर आने पर वो उदास हो जाता, और एक दिन उसने कहा, “मम्मी, मैं मूर्ख हूँ।” निकिता ने उसकी आँखों में देखा और धीरे से बोली, “नहीं बेटा, तुम बस अलग तरीके से सोचते हो।” उसने सवालों को खेल बना दिया ,“अगर तुम्हारे पास पाँच चॉकलेट हैं और तीन दोस्त हैं, तो क्या करोगे?” आरव ने कहा, “सबको दूँगा, फिर सब खुश रहेंगे।” निकिता मुस्कुराई, क्योंकि उसने समझ लिया कि गणित के सही जवाब से ज़्यादा, इंसानियत के सही मायने उस बच्चे ने समझ लिए हैं।
फिर आया वो दौर जब आरव बारह साल का हुआ। शरीर बढ़ रहा था, मन बदल रहा था, और अब कमरे का दरवाज़ा अक्सर बंद रहने लगा था। हेडफ़ोन कानों में होते, बातें कम और चुप्पियाँ ज़्यादा। शुरू में निकिता को लगा कि उसका बेटा उससे दूर हो रहा है, लेकिन फिर उसने खुद से कहा, “शायद अब मुझे बोलने से ज़्यादा सुनना चाहिए।” वो हर शाम उसकी कमरे के बाहर बैठती, कभी किताब पढ़ती, कभी बस वहीं रहती। कुछ दिनों बाद आरव खुद दरवाज़ा खोलकर बाहर आया, बोला, “मम्मी, आज क्रिकेट में मैं आउट हो गया।” उस एक वाक्य ने निकिता के मन में उम्मीद जगा दी। धीरे-धीरे बातचीत बढ़ने लगी। उसने जाना कि किशोर बच्चों के दिल में दरवाज़े बंद नहीं होते, बस उन्हें खुलने का समय चाहिए।
जब आरव चौदह साल का हुआ, तो उसका आत्मविश्वास और स्वतंत्रता दोनों बढ़ गए। अब वो दोस्तों के साथ देर तक बाहर रहता, गेम्स खेलता, कभी-कभी झल्ला भी जाता। बहुत-सी मांएं शायद रोक देतीं, डांटतीं, पर निकिता ने एक अलग रास्ता चुना, भरोसे का। एक शाम बस इतना कहा, “मुझे तुम पर भरोसा है, बस ध्यान रखना कि हर फैसला तुम्हारे नाम को रोशन करे।” वो एक वाक्य आरव के दिल में उतर गया। उसके बाद उसने खुद तय किया कि फोन कब रखना है, कब पढ़ना है। अब उसे मां के डर से नहीं, मां के विश्वास से जिम्मेदारी का अहसास होने लगा था।
आज जब आरव अपनी कॉपी पर झुका हुआ है, तो निकिता उसे देखते हुए सोचती है ,“मैंने इसे सिखाया नहीं, समझा है। इसे बड़ा किया नहीं, इसके साथ खुद भी बढ़ी हूँ।” उसकी आंखों में सुकून है ,क्योंकि उसने जाना कि बच्चों को पालना एक प्रक्रिया नहीं, एक यात्रा है। एक ऐसी यात्रा जहाँ हर गलती एक सीख बनती है, हर सवाल एक नई खिड़की खोलता है, और हर उम्र में रिश्ता नया अर्थ लेता है।
निकिता की कहानी हर उस मां की कहानी है, जो मानती है कि बच्चे को सही बनाना नहीं, उसे खुद बनने देना ही सबसे बड़ी परवरिश है। क्योंकि आखिर में, मां होने का मतलब है ,बच्चे की दुनिया को उसकी आँखों से देखना और उसके मन की भाषा में बोलना।
शाम का वक्त था। खिड़की के बाहर आसमान हल्का नारंगी हो चला था और कमरे में आरव की पढ़ाई की हल्की सरसराहट गूंज रही थी। निकिता चुपचाप उसके पास बैठी थी, कुछ बोले बिना। अब आरव चौदह का नहीं, सत्रह साल का हो गया था ,लंबा, गंभीर और अपनी दुनिया में मग्न। किताबों और नोट्स के बीच अब उसके अपने सपने थे, अपनी सोच, अपने फैसले।
निकिता उसे देखती रही। कभी उसके सिर पर हाथ फेरने का मन हुआ, लेकिन उसने खुद को रोका। वो जानती थी कि अब उसका बेटा बड़ा हो चुका है ,और उसे उड़ने देना ही उसका सबसे बड़ा सबक है। कुछ देर बाद आरव ने सिर उठाकर कहा, “मम्मी, कॉलेज में ड्रामा क्लब जॉइन करना है… ठीक है ना?”
निकिता मुस्कुरा दी। उसे कुछ नहीं कहना था, बस उस मुस्कान में ही मंज़ूरी थी। आरव फिर झुक गया अपनी किताबों में, और निकिता ने चुपचाप खिड़की से आसमान की ओर देखा। उसे लगा, जैसे हवा में उसका बचपन उड़ रहा है, लेकिन इस बार डर नहीं था, सिर्फ सुकून था।
उसने मन ही मन कहा, “अब मेरा बच्चा नहीं, मेरा गर्व उड़ना सीख गया है।”
