Hindi Kahaniya: मां-बाप बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए अपना सब कुछ दाव पर लगा देते हैं। पर वहीं जब बात मां-बाप की देखभाल की आती है तो वे संतान को भार सा लगने लगते हैं। ये कहानी भी रिश्तों के इसी ताने-बाने को बयां करती है।
निर्मल के सिर से पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। पिता के असमय गुजर जाने के बाद उसके परवरिश की पूरी जिम्मेदारी उसकी मां निरूपा जी के कंधों पर आ गई। दुख के इस भंवर में अचानक घिर आई उनकी जीवन नौका बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गई थी, परंतु निर्मल के उज्जवल भविष्य को देखते हुए अपनी इस टूटी हुई नौका को फिर से जोड़ने में वे पूरे प्राणपन से लग गईं।
वे खुद तो ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, लेकिन उन्हें शिक्षा का महत्व बखूबी पता था। निर्मल की प्राइमरी शिक्षा तो गांव के सरकारी पाठशाली में पूरी हो गई, लेकिन उसकी आगे की पढ़ाई एक गंभीर चुनौती बनकर खड़ी हो गई क्योंकि उच्च शिक्षा के लिए उनके गांव में क्या आसपास के गांव में भी कोई अच्छा स्कूल नहीं था। किंतु बेटे को अच्छी शिक्षा दिलाना उनका सपना था।
लेकिन सपना देखना एक बात है और उसे जमीन पर उतारना उससे बिल्कुल अलग। एक तो गांव का रूढ़िवादी माहौल ऊपर से विधवा बहू की सामाजिक हैसियत एक तिनके से ज्यादा कहां कुछ होती है? फिर भी एक दिन हिम्मत करके वे अपने ससुर से बोली, ‘पिताजी मैं निर्मल को पढ़ाने के लिए शहर जाना चाहती हूं।
ससुर के साथ-साथ घर के सभी सदस्य इस बात पर चौंक पड़े, ‘क्या?एक तो विधवा दूसरी जवान। क्या यह खतरों से खेलने के समान नहीं था? वे घर के सदस्यों की मनोभावना समझ गई। सबको आश्वस्त करते हुए वे बोलीं, ‘आप लोग निश्चिंत रहिए इस घर की इज्जत पर मैं कभी आंच नहीं आने दूंगी।यह बोलते हुए उनकी वाणी इतनी तेजोमय एवं आत्मविश्वास से परिपूर्ण थी कि घर के किसी सदस्य का साहस उन्हें रोक पाने का नहीं हुआ। उनके एक परिचित पास के शहर में एक प्रतिष्ठित स्कूल में वाचमैन थे। उन्होंने निरूपा जी को उसी स्कूल में आया की नौकरी दिलवा दिया। शहर तो वे आ गई थी और जिंदगी की गाड़ी खींचने के लिए एक नौकरी का जुगाड़ कर अपने सपने को पूरा करन की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ा लिया था। अब उनका अगला लक्ष्य किसी तरह उस स्कूल में निर्मल का दाखिला कराना था। अपने सदव्यवहार के कारण कुछ ही दिनों में वे सभी की प्रिय पात्र बन गई। एक दिन साहस कर उन्होंने प्रिंसिपल सहब से निवेदन किया, ‘सर! मेरे बच्चे को भी इस स्कूल में पढ़ने की अनुमति दे दीजिए। मैं आपकी हमेशा ऋणी रहंूगी।
प्रिंसिपल साहब, ‘ठीक है, यदि तुम्हारा बेटा प्रवेश परीक्षा में पास हो जाता है, तो मैं जरूर उसके लिए कुछ न कुछ करूंगा।
निर्मल बचपन से मेधावी तो था ही, उसने प्रवेश परीक्षा पास कर लिया और प्रिंसिपल साहब ने भी वादे के अनुसार स्कूल प्रबंधन से कहकर उसे स्कॉलरशिप दिलवा दिया।
इधर निरूपा जी निर्मल की पढ़ाई और परवरिश के लिए रात-दिन एक कर रही थीं। वह दिन के समय स्कूल में आया की नौकरी करती और रात में पड़ोस की दर्जी की दुकान से कपड़े लाकर उसे सिलने का काम करती ताकि कभी भी पैसों की कमी निर्मल की पढ़ाई के आड़े न आने पाए। निर्मल पढ़ाई में होशियार होने के साथ-साथ बहुत समझदार भी था। वह मां द्वारा उसके भविष्य के लिए किए जा रहे त्याग और तपस्या के मूल्य को भली-भांति समझता था। उसन खूब मन लगाकर पढ़ाई किया और प्रथम प्रयास में ही आईआईटी में प्रवेश प्राप्त कर लिया। इंजनिरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे गुड़गांव की एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में साफ्टवेयर डेवलपर की नौकरी मिल गई। कंपनी की तरफ से उसे एक पॉश सोसाइटी में फ्लैट भी मिल गया।
नौकरी पाने के बाद सबसे पहले वह अपनी मां के पास गया। वे अभी तक उसी स्कूल में आया की नौकरी कर रही थी। वह उनसे बोला, ‘मां, तुमने अपना धर्म निभा लिया, अब मेरी बारी है। तुम मेरे साथ गुड़गांव चलो।
उसकी मां ने उसे बहुत समझाया, ‘बेटा कहां यह छोटा सा शहर और गुड़गांव जैसा इतना बड़ा और आधुनिक शहर। मैं इतने बड़े शहर में कैसे रह पाऊंगी? मुझे तो बड़े लोगों के एक भी तौर-तरीके नहीं आते।
लेकिन निर्मल भी कहां हार मानने वाला था, यदि निरूपा जी दृढ़निश्चयी थी तो वह भी तो उन्हीं का बेटा था। उसने उनेसारे तर्क काट डाले। जब उन्होंने ज्यादा जिद किया तो वह बच्चों की तरह मुंह फुला कर बोला, ‘ठीक है, तो मैं भी वहां नहीं जाऊंगा। जहां तू रहेगी, मैं भी वहीं रहूंगा।
बेटे की जिद के आगे वे हार मान कर उसके साथ गुड़गांव चली आईं।
हर मां का सपना होता है कि जब उसका बेटा अपने पैरों पर खड़ा हो जाए तो उसके लिए एक अच्छी बहू ले आए। निरूपा जी की आंखों में भी अब बस यही सपना हर समय उमड़ता-घुमड़ता रहता था कि उनके घर में किस प्रकार जल्दी से बहू आ जाए, जिसके पायल की रुनझुन से घर में खुशियों की लहरियां बज उठे।
एक दिन सोसाइटी में रहने वाले बक्शी साहब और उनकी पत्नी ने अपनी शादी के पच्चीस वर्ष पूरे होने पर सोसायटी के लॉन में सिल्वर जुबली पार्टी का भव्य आयोजन किया था। निर्मल भी इस पार्टी में आमंत्रित था। वह मां को भी उस कार्यक्रम में ले गया। शुभकामनायें देने के दौरान बक्शी साहब की पत्नी ने उन लोगों का परिचय अपनी बेटी निकिता से कराया। निकिता को देखकर रात-दिन बहू लाने का सपना देख रही निरुपा जी के दिल में बेटे के लिए बहू ले आने का अरमान फिर से जाग उठा।
पार्टी से घर लौटते ही वे निर्मल से बोली, ‘बेटा, मुझे तो निकिता अपनी बहू के रूप में पसंद आ गई है। यदि तुझे कोई आपत्ति न हो तो मैं उससे तेरे रिश्ते की बात चलाऊं।
निर्मल जानता था कि बक्शी साहब काफी पैसे वाले हैं और निकिता उनकी इकलौती बेटी है, उसके मन में यह प्रश्न उठ रहा था कि आधुनिक माहौल में पली-बढ़ी अमीर घर की लड़की निकिता परिवार और रिश्तों को समझ पाएगी या नहीं, उसे सोच में डूबा हुआ देख निरूपा जी बोलीं, ‘क्या हुआ? फिर कोई बहाना?
निर्मल, ‘नहीं, मां! ऐसी कोई बात नहीं। बस थोड़ी सी यह चिंता है कि निकिता अमीर और मार्डन सोसाइटी में पली-बढ़ी है, परिवार और रिश्तों के प्रति उसके विचार कैसे हैं, मुझे नहीं पता। फिर भी तुम्हारा हर निर्णय मुझे मंजूर होगा।
निरूपा जी बोली, ‘तुम इसकी चिंता मत करो, समय और आपसी सामंजस्य निपरीत परिस्थितियों को भी आसान बना देता है।
बहू लाने की खुशी में ईश्वर पर अटूट आस्था रखने वाली निरूपा जी ने ज्यादा पूछताछ करना उचित नहीं समझा और एक दिन मौका देखकर बक्शी साहब और उनकी पत्नी के सामने उन्होंने निकिता और निर्मल के रिश्ते की बात रख दिया। वे लोग भी सहर्ष तैयार हो गए, क्योंकि इतनी अच्छी नौकरी करने वाले लड़के का प्रस्ताव उनके घर खुद चलकर जो आया था।
निकिता बहू बनकर उनके घर में आ गई। शुरुआत में तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा। परंतु निर्मल कोजि बात का डर था, वही हुआ। निकिता मार्डन सोसाइटी की आजाद ख्यालों वाली लड़की थी। उसे निरूपा जी का घर में रहना यों लगता जैसे कोई दिन-रात उसी पहरेदारी कर रहा हो। जबकि निरूपा जी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे उसकी स्वतंत्रता बाधित हो। चाहे वह ड्रेस की बात हो या किटी पार्टी की या कोई और, उन्होंने निकिता को कभी भी किसी चीज के लिए नहीं टोका। लेकिन निकिता को उनकी घर में उपस्थिति ही जब बेड़ी के समान लगती थी तो अच्छी चीज भी भला उसे क्यों ठीक लगती?
विवाह के कुछ महीनों के बाद ही उसने निर्मल के सामने उसकी मां के साथ न रहने की अपनी इच्छा प्रकट कर दिया। जब निर्मल ने उससे कहा, ‘तुम तो यह बात शादी तय होने से पहले से जानती थी कि मेरी मां मेरे साथ ही रहती हैं, तो तुमने विवाह के लिए हामी क्यों भरी?
इस पर निकिता ने जवाब दिया, ‘अव्वल तो तुम्हारी मां मेरे घर रिश्ता लेकर आई थी, हमलोग तुम्हारे घर नहीं गए थे रिश्ता मांगने और मुझे यह नहीं पता था कि वे सदा तुम्हारे साथ रहेंगी।
निर्मल इस उत्तर से अवाक् रह गया परंतु वह बहुत सुलझा हुआ इंसान था। उसने सोचा कि लड़ाई-झगड़े से बेहतर है, इस मसले को प्यार से सुलझा लिया जाए। वह बोला, ‘मैं अपने मां-बाप की इकलौती संतान हूं। मेरे पिता के गुजर जाने के बाद मेरी मां ने बहुत मेहनत और संघर्ष कर मेरी परवरिश किया है। आज सफलता के जिस मुकाम पर मैं हूं वह उनके त्याग और तप का ही परिणाम है।
लेकिन निकिता पर तो न्यूक्लियर फैमिली का भूत सवार था, जिसमें सास जैसी जीव का कोई स्थान था ही नहीं। जब वह सोसाइटी में अपनी अन्य सहेलियों को बिंदास जिंदगी जीते देखते तो उसकी स्वतंत्र रहने की भावना पुन: उफान लेने लगती।
इधर निर्भल भी महसूस कर रहा था कि निकिता जानबूझकर गाहे-बगाहे मां को अपमानित करने की हर संभव कोशिश कर रही है। उसने निकिता को कई बार प्यार से समझाने की कोशिश की कि मां-बाप बच्चों के लिए छतरी के समान होते हैं, जो धूप और बारिश खुद झेलकर अपने बच्चों को सुरक्षित रखते हैं। लेकिन जब निकिता ने अपने दिल और दिमाग के सारे दरवाजे और खिड़कियां इस ओर से बंद कर लिया था तो उसे समझाने का कोई लाभ ही नहीं था।
एक दिन निकिता की सहेलियां दोपहर में उसके घर पर किटी पार्टी के लिए इकट्ठा थी। घर में तेज आवाज में वेस्टर्न म्यूजिक चल रहा था। निरूपा जी उस समय दोपहर में भगवान को भोग लगाकर पूजा कर रही थी। उन्होंने पूजा के दौरान जैसे ही शंख बजाया, तो शंख की आवाज सुनकर उसकी एक सहेली बोली, ‘निकिता, म्यूजिक बंद कर दो। तुम्हारी सास पूजा कर रही हैं, उन्हें डिस्टर्ब होगा और तू पहले बताती कि इस समय तेरे घर में पूजा होती है तो हम कहीं और इक_ïे हो जाते।
उस सहेली ने यह बात वैसे तो सामान्य ढंग से कहा था, परंतु यह बात निकिता को चुभ गई। उसने बुझे मन से म्यूजिक बंद कर दिया। पार्टी भी थोड़ी देर में समाप्त हो गई।
सहेलियों के जाते ही निकिता निरूपा जी पर बिफर पड़ी। वह बोली, ‘आप तो चाहती ही हैं कि मेरी कोई फ्रेंड घर पर न आए। जैसे ही वे आईं, आप पूजा का कार्यक्रम लेकर बैठ गई। आपके पूजा-पाठ में कोई व्यवधान न पड़े, इस चक्कर में मुझे उनका उपदेश सुनना पड़ गया। सारी पार्टी का मजा खराब हो गया।
अवाग निरूपा जी निर्वाक सब कुछ चुपचाप सुनती रही। निकिता पैर पटकते हुए वहां से चली गईं।
उस दिन जब निर्मल ऑफिस से घर आया तो निकिता चादर से मुंह ढ़ाके बिस्तर पर औंधे लेटी थी। वह समझ गया कि आज घर में कोई न कोई अप्रिय घटना अवश्य घटी है, फिर भी उसने बड़े प्यार से उससे पूछा, ‘निकिता क्या हुआ?
निकिता ने छूटते ही जवाब दिया, ‘निर्मल! तुम्हें आज मां और मुझ में से किसी एक को चुनना ही होगा। अब मैं तुम्हारी मां के साथ नहीं रह सकती। मेरी अपनी भी कोई जिंदगी है या नहीं? तुम्हारी देहाती मां के कारण मेरी फ्रेंड्स मेरा मजाक उड़ाती हैं।
निर्मल निर्वाक सब कुछ चुपचाप सुनता रहा। उस दिन उसने खाना भी नहीं खाया। उसकी मां सब कुछ देख समझ रही थी। बेटे-बहू को भूखा सोते देख कर उनसे रहा नहीं गया, वे उनके कमरे में गई। निकिता ने उनको देखते ही अपना मुंह दूसरी ओर कर लिया।
निरूपा जी निर्मल से बोली, ‘बेटा तुम लोग खाना खा लो। मुझे पता है कि मेरी वजह से तुम लोगों को कठिनाई हो रही है। तुम मुझे मेरे पुराने शहर पहुंचा दो। मुझे विश्वास है कि उस स्कूल में मुझे दुबारा नौकरी जरूर मिल जाएगी। इस तरह मेरा समय भी कट जाएगा और तुम लोगों को भी मेरी वजह से दिक्कत नहीं होगी और मैं यह बात गुस्से या दुख में नहीं बोल रही हूं, क्योंकि तुम लोगों की खुशी में ही मेरी खुशी है।
निर्मल उस रात एक पल के लिए भी सो नहीं पया। उसे लगा कि अब पानी सिर से ऊपर निकल गया है। निकिता अब किसी भी सूरत में मां के साथ नहीं रहने वाली है। रोज-रोज की चिक-चिक और उसके हाथों हो रहे मां के अपमान से अच्छा है कि मां के लिए एक अलग व्यवस्था कर दी जाए।
ऑफिस पहुंचकर उसने सबसे पहले इंटरनेट पर अपने शहर के तमाम वृद्धाश्रमों की वेबसाईट खंगाल डाला शहर के अनेकों वृद्धाश्रम में से उसने ज्यादा स्टार रेटिंग वाले वृद्धाश्रम में मां के लिए एक प्रीमियम कमरे का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन तत्काल कर दिया। मां के लिए वृद्धाश्रम बुक कर वह अपने आपको बहुत हल्का महसूस कर रहा था। उसे इस बात की खुशी हो रही थी कि घर में न सही लेकिन उसकी मां इसी शहर में तो रहेंगी। वह जब चाहे उनसे मिल सकेगा और इस तरह निकिता की आए दिन की शिकायतों से उसे मुक्ति भी मिल जाएगी।
उस दिन 22 जुलाई की तारीख थी और पूरा देश इसरो द्वारा चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग के लिए सांस थामे बेकरार था। उसके ऑफिस के भी सभी लोग हॉल में एकत्रित होकर टीवी पर लाइव लॉन्चिंग देख रहे थे। टीवी एंकर बता रही थी कि चंद्रयान-2 अपने साथ लैडर विक्रम एवं रोवर प्रज्ञान को लेकर चंद्रमा पर जा रहा है और इस मिशन की सफलता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि लैंडर विक्रम किस प्रकार चांद पर रोवर प्रज्ञान को लेकर सॉफ्ट लैंडिंग करेगा। वह बता रही थी कि सॉफ्ट लैंडिंग एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है और इस दौरान लैंडर विक्रम एक मां की तरह रोवर प्रज्ञान को अपने सीने से चिपकाए बहुत सावधानी से धीरे-धीरे चांद की पथरीली सतह पर उतरेगा। लैंडिंग के कुछ घंटे बाद रोवर प्रज्ञान लैंडर के शरीर से निकलकर चांद की सतह पर उतरेगा, तब तक वह एक शिशु की भांति लैंडर विक्रम की गोद में सुरक्षित समाया रहेगा। यदि सॉफ्ट लैंडिंग की इस प्रक्रिया में जरा सी भी चूक हुई तो रोवर प्रज्ञान अपना मिशन पूरा नहीं कर पाएगा।
एंकर की सॉफ्ट लैंडिंग की बात सुनकर निर्मल के अंतस में सहसा जैसे एक बिजली सी कौंध गई। वह अंदर से हिल गया। उसे लगा कि हर बच्चा जब इस संसार में आता है तो उसके माता-पिता अपना सब कुछ उसकी जिंदगी को बनाने में उस पर न्यौछावर कर देते हैं। जिंदगी की उबड़-खाबड़ सतह पर उसके कदम जमाने में उसकी सहायता करते हैं। अपने पूरी ऊर्जा उसकी जिंदगी को सजाने संवारने में लगा देते हैं ताकि संसार की भावी चुनौतियों का सामने करते हुए विपरीत परिस्थितियों की दु:सह लहरों से टकराकर वे कांच की तरह टूट कर बिखर न जाए। यह सॉफ्ट लैंडिंग नहीं तो और क्या है?

उसकी स्मृतियों में सहसा बचपन की फोटो तैर गई, जिसमें उसकी मां, उसके नन्हें-नन्हें पैरों को अनपे पैरों पर रखकर उसका हाथ पकड़े हुए उसे चलना सिखा रही थी। वह फोटो उसे इतनी अच्छी लगती थी कि वह सदा उसे अपनी पर्सनल फाइल में सुरक्षित रखता था। उसे लगा यही तो वह सॉफ्ट लैंडिंग है जो चंद्रयान-2 का लैंडर विक्रम अनपे अंतस में समाये हुए रोवर प्रज्ञान के लिए करने जा रहा है और यही कार्य तो उसकी मां ने भी उसके लिए किया था। उसे बचपन की एक-एक चीज याद आने लगी कि किस प्रकार छोटी सी आमदनी में उसकी मां ने अकेले दम पर बेशुमार कठिनाइयों के बीच चेहरे पर बिना कोई शिकन लाए उसकी परवरिश किया था। उसकी छोटी से छोटी जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी बड़ी से बड़ी जरूरत की थोड़ी सी भी परवाह कभी नहीं किया। उस परवरिश के बदले वह उन्हें वृद्धाश्रम का एक प्रीमियम कमरा देकर अपनी पीठ थपथपा रहा है। क्या इसी दिन के लिए उसकी मां ने उसे बड़ा आदमी बनाने का सपना देखा था?
चंद्रयान-2 की सफल लॉन्चिंग संपन्न हो चुकी थी। सभी लोग तालियां बजाकर देश की इस सुनहरी उपलब्धि के लिए एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे। तालियों की गड़गड़ाहट ने निर्मल को जैसे नींद से जगा दिया। उसे अच्छी तरह समझ में आ गया था कि अब उसे क्या करना है? उसने तत्काल कंप्यूटर ऑन कर उस वृद्धाश्रम के वेबसाइट को दुबारा खोला और अभी कुछ देर पहले मां के लिए किए गए रजिस्ट्रेशन को कैंसिल कर दिया। पता नहीं कितने दिनों के उहापोह के बाद उसने अपने दिल की बात सुनकर एक निर्णय लिया था, जिस पर उसे खुद गर्व हो रहा था। उसे बहुत हल्का अनुभव हो रहा था।
ऑफिस का बचा हुआ काम तेजी से समेट कर वह घर के लिए निकल पड़ा। उसे समय से पहले घर आया देखकर निकिता बहुत खुश हुई क्योंकि उसे विश्वास था कि आज निर्मल उसे वह समाचार अवश्य देगा जिसकी उसे पिछले काफी समय से प्रतीक्षा थी। इस बात से मन ही मन खुश होते हुए दरवाजा खोलते हुए उससे बोली, ‘आओ निर्मल! आज मैं आपके लिए आपकी मनपसंद मसाले वाली चाय और पनीर के पकौड़े बनाती हूं।
निर्मल, ‘बहुत अच्छा निकिता, पर चाय तीन कप बनाना।
निकिता, ‘तीन कप! पर चाय पीने वाले तो हम दो लोग ही हैं, क्या कोई और भी आने वाला है?
‘नहीं और कोई आने वाला तो नहीं है, परंतु इस घर में मुझे, तुम्हें और मां को मिलाकर तो तीन लोग है न इसलिए तीन लोगों के लिए तीन कप चाय बनाओ। आज से हम तीनों शाम की चाय साथ-साथ पिएंगे। निर्मल शांत परंतु दृढ़ स्वर में ऐसे बोला जैसे कुछ हुआ ही न हो।
निकिता, ‘आज से साथ-साथ चाय पिएंगे! तुम्हारे कहने का क्या मतलब है, निर्मल?
निर्मल, ‘मेरे कहने का मतलब वही है जो तुम समझ रही हो, फिर भी मैं बता देता हूं, आज से इस घर में यहां से किसी के जाने की बात नहीं होगी। इस घर में मैं, मां और तुम साथ-साथ रहेंगे।
‘यह तुम क्या बोल रहे हो निर्मल! निकिता।
निर्मल, ‘जो तुम सुन रही हो, मैं वही बोल रहा हूं। न मां अब कहीं जाएंगी और न तुम। यह घर जितना तुम्हारा है उतना ही मां का भी है। सब इसी घर में साथ-साथ रहेंगे।निर्मल के व्यवहार में आए इस अकस्मात परंतु दृढ़ परिवर्तन ने निकिता के हठ को उसी तरह उड़ा दिया, जैसे सूर्य की किरणें अपनी उष्मा से गड्ढों में जमे बारिश के गंदले पानी को भाप की भांति उड़ा देती है। निकिता ने भी दीवार पर अभी-अभी निर्मल द्वारा लिखी गई इबारत को न केवल समय गंवाए पढ़ लिया बल्कि उसमें अंतॢनहित भावना को समझ भी लिया।
वह चाय बनाकर ड्राइंग रूम में ले आई। पहली बार इस घर के तीनों सदस्य साथ-साथ चाय पी रहे थे, किंतु खामोशी की चादर अभी भी फैली थी।
बेटे के मन में अपने लिए आदर और प्रेम देखकर खुशी से अंदर तक भीबी हुई निरूपा जी की आंखें खुशी से भर आईं, परंतु उन्हें घर में पसरा हुआ अनचाहा मौन नश्तर की तरह चुभ रहा था। उन्होंने निकिता की ओर देखा वह चाय का प्याला पकड़े हुए सिर झुका कर बैठी थी, वे उठ कर उसके पास गईं और उसे सीने से चिपकाते हुए बोलीं, ‘बेटा, घर की लक्ष्मी कभी भी उदास अच्छी नहीं लगती।
उनका ममता भरा स्पर्श पाकर निकिता उनसे चिपक कर फूट-फूट कर रो पड़ी। वह बोली, ‘मां! मुझे माफ कर दीजिए, मैंने आपका इतना अनादर किया, लेकिन आपने कभी भी कोई शिकायत नहीं किया और आज इतना कुछ होने के बावजूद भी आप मुझे गले लगा रही हैं।
निरूपा जी, ‘अरे! मां भी भला कभी बेटी से नाराज होती है। इतना कहते हुए निरूपा जी की आंखों में लंबे समय से अपनी बहू के लिए संचित प्रेम अश्रु बनकर निकल पड़ा। निर्मल आंसुओं ने दिल से दिल तक भावनाओं का एक मजबूत पुल बना दिया था। निर्मल के इस छोटे परंतु दृढ़ निर्णय से बिना किसी लड़ाई-झगड़े के तीनों की जिंदगी की सॉफ्ट लैंडिंग रिश्तों की सरजमीं पर बहुत खूबसूरत ढंग से हो गई थी।
