hindi kavita
hindi kavita

Hindi Poem: पौधों में पानी देतीं
कभी फुलों को सहलाती
घर आंगन सुसज्जित करतीं
दिपक की लौ जलाती
कभी फ्रिज
तो कभी
कूलर के पास होतीं
आखिर ढूढंती क्या रहतीं
घर तेरा अधिकार तेरा
फिर उपेक्षित क्यों रहतीं

बातें बड़ा अनोखा सा
कौन सा रहस्य आखिर था
घर आंगन
खुद पे खड़े- खड़ें
बड़े दिनों बाद खिलखिलाएं थे
घर के आंगन में खडी़
निर्दोष सीढ़ी तब बोलीं
जमीन और छत को हूँ जोड़ती
फिर भी बहन
घर में उपक्षित रहतीं
है अपेक्षा सभी को मुझसे
मेरी अपेक्षा टूटती रहतीं
बहन हम एक से
सीढ़ी हूँ आंगन छत को जोड़ती
अस्तित्व तेरा घर को जोड़े
सभी ने देखा साज -सज्जा
किसी ने देखीं फुलवारी
परन्तु!!
कहां किसी ने कहा- सुना
क्या❓❓❓
नारीत्व
कभी थकती नहीं।