Overview:
दुनियाभर के अधिकांश बच्चों को अब स्क्रीन देखने की लत लग चुकी है। यह चिंताजनक इसलिए है, क्योंकि इससे बच्चों की आंखें खराब होने का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है।
Screen Time Effects: पांच साल का रायन मोबाइल या टीवी देखे बिना खाना नहीं खाता। यही हाल 4 साल की मेहर का है। उसके हाथ में दिनभर स्मार्टफोन रहता है। यह आदत सिर्फ रायन या मेहर की ही नहीं है। दुनियाभर के अधिकांश बच्चों को अब स्क्रीन देखने की लत लग चुकी है। यह चिंताजनक इसलिए है, क्योंकि इससे बच्चों की आंखें खराब होने का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। पिछले दिनों हुए एक शोध ने पेरेंट्स को बताया है कि उन्हें अपने बच्चे को कितने देर स्क्रीन दिखानी चाहिए।
डरा देंगे ये आंकड़े

स्क्रीन टाइम बढ़ने से कम उम्र में ही बच्चे अंधे हो सकते हैं। ब्रिटिश जर्नल ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार बच्चों में निकट दृष्टि दोष यानी मायोपिया के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। साल 1990 से 2023 के बीच दुनियाभर के बच्चों में मायोपिया तीन गुना तक बढ़ गया है। दुनियाभर में 36 प्रतिशत टीनएजर्स मायोपिया से पीड़ित हैं। यह सिर्फ जीन्स के कारण नहीं है, इसके पीछे बड़ा कारण बच्चों का बढ़ा हुआ स्क्रीन टाइम है।
बिगड़ रही है पुतलियों की शेप
अध्ययन के अनुसार स्क्रीन टाइम बढ़ने से बच्चों की आंखों की पुतलियां नया आकार ले रही हैं। वह लंबी होने लगी हैं। जब बच्चे नेचुरल लाइट के संपर्क में ज्यादा रहते हैं तो उनकी आईबॉल स्थिर रहने में मदद मिलती है। इस रोशनी से डोपामाइन का स्त्राव ट्रिगर होता है, जिससे मायोपिया का खतरा कम होता है।
इस गलती से 21 % बढ़ता है जोखिम
जामा नेटवर्क ओपन की ओर से प्रकाशित ग्राउंडब्रेकिंग शोध में बच्चों में मायोपिया को लेकर नए खुलासे हुए हैं। सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने 335,000 से ज्यादा प्रतिभागियों पर शोध किया। इन सभी की उम्र औसतन 9.3 साल थी। शोध में 45 अध्ययनों के डेटा का विश्लेषण किया गया। शोध के अनुसार जो बच्चे दिन में एक घंटे से ज्यादा स्क्रीन देखते हैं उनमें मायोपिया विकसित होने का जोखिम 21 % तक बढ़ जाता है। ऐसे में बच्चों का स्क्रीन टाइम एक घंटे से कम का होना चाहिए।
हो सकती हैं कई परेशानियां
अगर कोई बच्चा दिनभर में एक घंटे से ज्यादा स्क्रीन देख रहा है तो उसे मायोपिया के साथ ही कई अन्य परेशानियां भी हो सकती हैं। उनका रेटिना अलग हो सकता है। ग्लूकोमा और मैक्यूलर डिजनरेशन हो सकता है, जो अंधेपन का कारण बन सकते हैं। लगातार स्क्रीन देखने से बच्चों की आईबॉल यानी रेटिना का हिस्सा लंबा होने लगता है। रेटिना ही छवियों को मस्तिष्क तक भेजता है। रेटिना काफी नाजुक, पतला और संवेदनशील होता है। ज्यादा मोबाइल देखने से इसे नुकसान होता है।
पेरेंट्स को जरूर उठाने चाहिए ये कदम
बच्चों को स्क्रीन से दूर रखना पेरेंट्स की जिम्मेदारी है। बच्चों को फोन न देना इसका विकल्प है। लेकिन सिर्फ ये ही काफी नहीं है। आपको बच्चों को घर से ज्यादा से ज्यादा बाहर ले जाना होगा। ब्रिटिश जर्नल ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी में प्रकाशित शोध के अनुसार बच्चे जितना ज्यादा समय बाहर बिताते हैं, उनमें मायोपिया का खतरा उतना ही कम होता है। पेरेंट्स को बच्चों को आउटडोर एक्टिविटी में डालना चाहिए। स्क्रीन टाइम सीमित करें। अगर आप एक घंटे स्क्रीन टाइम तय कर रहे हैं तो 20-20-20 नियम बनाएं। जिसके स्क्रीन के हर 20 मिनट के समय में उन्हें कम से कम 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर किसी चीज को देखने के लिए कहें।
कई देशों ने उठाए ये कदम
एक समय था जब ताइवान में बच्चों में मायोपिया के मामले 50 प्रतिशत का बढ़ गए थे। जिसके बाद इस देश ने बड़ा कदम उठाया। यहां स्कूलों में आउटडोर एक्टिविटी का समय अनिवार्य रूप से 80 मिनट किया गया है। जिसके बाद मायोपिया के मामले आधे रह गए। वहीं चीन में सेंट्रल साउथ यूनिवर्सिटी के शोध से पता चला है कि नेचर थीम पर सजी क्लासेज में पढ़ने से बच्चों में मायोपिया कम होता है। जिसके बाद क्लासेज का डेकोर बदला गया और मायोपिया के मामलों में कमी आई।
