बुद्धू दीदी
एक समय माधवी को घूमना, सहेलियों के साथ मस्ती करना बहुत पसंद था, जब मन चाहता वो गाने लगा कर डांस करना शुरू कर देती।
Hindi Sad Story: नीले रंग के खूबसूरत बैग को माधवी पिछले 2 मिनट से टकटकी लगाए देखे जा रही थी। अचानक सिम्मी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और बोली, आज का पूरा दिन इसी शोरूम में बिता देंगी मैडम आप। माधवी और सिम्मी पक्की सहेलियां थीं। वैसे तो माधवी को अपने ऊपर पैसे खर्च करना बिलकुल पसंद नहीं था, लेकिन पिछले कई दिनों से सिम्मी, माँ, मौसी और उनकी दोनों बेटियां टीशा और हर्षिता उसे हर बात पर टोकने लगे थे। कभी तो अपने लिए कुछ ले लिया कर, अपने कमाए हुए पैसे अपने ऊपर खर्च करने में तुझे क्या दिक्कत है।
घर की परिस्तिथियों ने उसे समय से पहले ही काफी समझदार बना दिया था। एक समय माधवी को घूमना, सहेलियों के साथ मस्ती करना बहुत पसंद था, जब मन चाहता वो गाने लगा कर डांस करना शुरू कर देती। माधवी और उसकी मौसी के बीच सगी माँ-बेटी जैसा लगाव था, इसलिए शायद माधवी भी अपनी मौसी की बेटियों के साथ माँ जैसा ही व्यवहार करती थी।
एक रोज़ माधवी के पिताजी की तबियत अचानक ख़राब हुई और वो हमेशा के लिए उसे छोड़ कर चले गए। पिता का साया सर से हटते ही माधवी ने अपने आप को पूरी तरह से बदल दिया।
आँखों के आंसू तो उसने माँ की खातिर अपने अंदर ही जैसे जज़्ब कर लिए थे। इसी बीच एक दिन उसके भाई के बेटे के स्कूल से फ़ोन आया, उसकी तबियत काफी बिगड़ गयी थी।

भाभी और भाई हर्षित को हॉस्पिटल ले कर पहुंचे ही थे, इतने में माधवी भी ऑफिस से सीधे हॉस्पिटल चली आई। हर्षित और उसकी छोटी बहन सान्वी में उसकी जान बसती थी। हर्षित की रिपोर्ट देखकर डॉक्टर ने बताया उसका लिवर 80 प्रतिशत ख़राब हो चुका है, अब सिर्फ लिवर ट्रांसप्लांट ही एक ऑप्शन है , पर इसके लिए डोनर चाहिए होगा।
टेस्ट करवाने पर पता चला माधवी और उसके भाई-भाभी तीनों ही परफेक्ट डोनर हैं। लेकिन माधवी ने भाई-भाभी से आगे बढ़कर डोनर बनने का फैसला लिया।
आज उस ऑपरेशन को 10 साल हो चुके थे, माधवी ने अपना जीवन दांव पर लगा कर हर्षित को नया जीवन दिया था, इसके बावज़ूद, अपने ही घर में उसकी कोई कद्र नहीं थी।
माधवी ने आजीवन शादी न करने का फैसला लिया था, वजह बस हर्षित की सेहत थी। उसे डर था, उसकी शादी के बाद अगर हर्षित को कोई परेशानी हुई तो उसके भाई-भाभी और माँ के कन्धों पर सारा बोझ आ जाएगा। उसने सोचा मैं ठीक-ठाक कमा लेती हूँ, यहीं रहूंगी तो अपने परिवार के लिए हर दुःख मुसीबत में खड़ी रहूंगी।

आज हाल ये था, माधवी के ऑफिस से आने के बाद माधवी को कोई एक गिलास पानी देने के लिए भी तैयार नहीं था। माँ के अलावा उसे कोई कुछ नहीं समझता था। ऑपरेशन के बाद से माधवी का शरीर पूरी तरह से ख़राब हो चुका था, कई बीमारियों ने उसे घेर लिया था। अपना कमाया हुआ एक-एक रुपया माधवी बिजली के बिल, हर्षित और सान्वी की फीस, कपड़े, बच्चों की बीमा पॉलिसी , राशन, सब्जी-फल में खर्च कर देती थी।
भाई-भाभी कोई जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं थे। ना जाने तनख्वाह के पैसे भाई कहाँ खर्च करता था। माधवी बस उनके लिए कमाई का ज़रिया बन कर रह गयी थी। बच्चों को भी बुआ से कोई ख़ास लगाव नहीं था।
यही बातें माधवी को दिन रात परेशान किए रहतीं थीं। आज अपने जन्मदिन के दिन माधवी ने माँ और भाई-भाभी को बुलाकर कहा, आज से मैं घर में सिर्फ दस हज़ार रूपये दिया करुँगी, , बाकी पैसों का हिसाब देना मैं ठीक नहीं समझती हूँ। इतना कह कर माधवी अपनी बचपन की दोस्त सिम्मी के साथ मार्किट चली गयी और सालों बाद अपने लिए दिल खोल कर खर्चा किया।
जो नीले रंग का बैग माधवी हाथ में लिए खड़ी थीं, ना जाने उसके हाथ से वो बैग लेकर सिम्मी ने कब उसकी बिलिंग करा दी, और दोनों बर्फ का गोला खाने चल पड़े। माधवी ने अपने फ़ोन से नए बैग की फोटो खींची फिर उसे टीशा और हर्षिता को भेज कर लिखा – कैसा लगा मेरा नया बैग??

टीशा और हर्षिता यकीन नहीं कर पा रहे थे उनकी बुद्धू दीदी अब थोड़ी समझदार हो गयी है और इतने सालों बाद उन्होंने दूसरों की जगह अपने लिए जीना शुरू कर दिया है।
