Vardaan
Vardaan

Hindi Katha: हैहय वंश में कार्तवीर्य नाम के एक प्रसिद्ध राजा हुए। सदा धर्म में तत्पर रहने वाले उस राजा की एक हज़ार भुजाएँ थीं, इस कारण उसका एक अन्य नाम सहस्रार्जुन भी था। भगवती जगदम्बा उस राजा की इष्ट- देवी थीं। सहस्रार्जुन का अधिकतर समय दान-धर्म में बीतता था। उन्होंने अनेक यज्ञ करके अपनी प्रचुर धन-सम्पदा भृगु वंशी ब्राह्मणों को दान कर दी थी। इस प्रकार भृगु वंशी ब्राह्मण अत्यंत धनी हो गए थे। सहस्रार्जुन ने अनेक वर्षों तक पृथ्वी पर राज्य किया और अंत में वे मोक्ष को प्राप्त हुए।

उनकी मृत्यु के पश्चात् धीरे – धीरे हैहय वंशी क्षत्रियों की वैभवता समाप्त हो गई और वे निर्धन हो गए। एक समय की बात है, हैहयवंशी क्षत्रियों को धन की विशेष आवश्यकता पड़ी। सहायता माँगने के उद्देश्य से वे भृगुवंशी ब्राह्मणों के पास गए और नम्रतापूर्वक उनसे धन प्रदान करने की याचना की। किंतु उन लोभी ब्राह्मणों की बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी । उन्होंने कहा – ” भिक्षा पर जीवन व्यतीत करने वाले हम तपस्वियों के पास धन कहाँ ? ” और सहायता करने से साफ मना कर दिया। हैहय वंशी क्षत्रिय निराश होकर लौट गए। इधर ब्राह्मणों ने हैहयवंशी क्षत्रियों के भय से अपना धन भूमि में दबा दिया। किंतु गुप्तचरों के माध्यम से उन्हें ब्राह्मणों की इस कुटिलता का पता चल गया।

सच्चाई का पता लगाने के लिए वे भृगुवंशी ब्राह्मणों के आश्रम में पहुँचे और आश्रम की भूमि खोदने लगे। शीघ्र ही उनके सामने धन का एक विशाल ढेर लग गया। यह देखकर हैहय वंशी क्षत्रिय क्रोधित हो गए और उन्होंने उन ब्राह्मणों पर आक्रमण कर दिया। ब्राह्मण अपने प्राण लिए पर्वत की कंदराओं में छिप गए। हैहय वंशी क्षत्रिय वहाँ भी पहुँच गए और भृगु कुल का संहार करते हुए वे इस भूमण्डल पर घूमने लगे। जहाँ कहीं भी भृगु वंशज मिलते, उन्हें तीखे बाणों से मारकर मृत्यु के मुँह में पहुँचा देना अब उनका मुख्य कार्य बन गया था।

इस प्रकार हैहय वंशी क्षत्रिय अनेक वर्षों तक ब्राह्मणों का संहार करते रहे। उन्होंने भृगु वंश के प्राय: सम्पूर्ण ब्राह्मणों का संहार कर दिया। अब वे भृगु वंश की स्त्रियों को अपार पीड़ा पहुँचाने लगे। उनके भय से वे स्त्रियाँ अपना घर-परिवार छोड़कर हिमालय पर्वत पर चली गईं। उन्होंने गंगा नदी के तट पर भगवती जगदम्बा की एक प्रतिमा बनाई और निराहार रहकर उसके सामने उपासना करने लगीं। उन्हें भगवती की उपासना करते हुए अनेक दिन बीत गए।

भृगु वंश की स्त्रियों की उपासना से प्रसन्न होकर भगवती माता उनके स्वप्न में आईं और बोलीं- “हे पुत्रियो ! चिंता त्याग दो। तुम्हारी रक्षा के लिए तुममें से ही एक स्त्री से एक वीर, पराक्रमी और बलशाली पुत्र उत्पन्न होगा । मेरा अंशभूत वह बालक तुम्हारा कार्य सम्पन्न करेगा । ” इस प्रकार उन दुःखी स्त्रियों को सांत्वना देकर जगदम्बिका माता अन्तर्धान हो गईं। माता जगदम्बिका के वर से उन स्त्रियों का भय कम हो गया।

उनमें से केवल एक स्त्री गर्भवती थी।

हैहय वंशी क्षत्रियों को जब यह पता चला कि भृगु वंश की स्त्रियाँ हिमालय पर्वत पर निवास कर रही हैं तो वे वहाँ पहुँचकर उनका वध करने लगे। यह देखकर गर्भवती स्त्री भयभीत हो गईं और रोने लगीं। गर्भस्थ बालक ने जब सुना कि ‘माता रो रही है। उसकी अवस्था बड़ी ही दयनीय है। कोई भी उसका रक्षक नहीं है । ‘ तब वह बालक अपनी माँ की जाँघ चीरकर बाहर निकल आया। वह बालक ऐसा प्रतीत होता था, मानो साक्षात् सूर्यदेव हो । बालक की ओर देखते ही सब क्षत्रिय तत्क्षण दृष्टिहीन हो गए।

उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि वे सब उस बालक को देखते ही दृष्टिहीन हो गए। अवश्य ही वह बालक उस ब्राह्मणी के सतीत्व का तेज है। यह सोचकर वे दृष्टिहीन हैहय वंशी क्षत्रिय उस पतिव्रता ब्राह्मणी के चरणों में गिर गए और उससे विनती करते हुए बोले – ” हे माता ! पापी बुद्धि हो जाने के कारण हम क्षत्रियों से इतना बड़ा अपराध हो गया है। इसी के कारण हम सब दृष्टिहीन हो गए हैं। हे देवी ! अब हम तुम्हारी शरण में हैं। तुम महान तपोबल से सम्पन्न हो । अतः हमें पुनः दृष्टि प्रदान करने की कृपा करो। हम आपको वचन देते हैं कि अब कभी किसी प्राणी को नहीं सताएँगे। अज्ञानवश हम से जो अपराध हो गया है, उसे क्षमा कर दो। “

उनकी विनती सुनकर ब्राह्मणी के आश्चर्य की सीमा न रही। हाथ जोड़े सामने खड़े उन दृष्टिहीन क्षत्रियों को आश्वासन देकर क्षमाशीला ब्राह्मणी ने कहा क्षत्रियो ! मेरी जाँघ से उत्पन्न इस बालक ने तुम्हारे नेत्रों की ज्योति छीन ली है। तुम लोग सौ वर्षों से निरपराध भृगुवंशियों को मारते आ रहे हो । उन सबके तेज के रूप में सौ वर्षों से यह बालक मेरी कोख में पलता रहा था। आज भगवती की कृपा से यहाँ प्रकट हुआ है। अपने अपराधों की क्षमा तुम इस दिव्य बालक से ही माँगो |

वह बालक वहाँ एक श्रेष्ठ मुनि के रूप में विराजमान था । हैहयवंशी क्षत्रियों ने उसके चरणों में मस्तक झुका दिए और क्षमा माँगते हुए विनीत स्वर में बोले ” हे दिव्य तेजधारी मुनिकुमार ! यद्यपि हमारा अपराध क्षमा योग्य नहीं है, तथापि आप अत्यंत दयालु और परम तपस्वी हैं। कृपया हमें क्षमा करें।

तब वह दिव्य बालक बोला – ” हे क्षत्रियो ! प्रायश्चित्त से समस्त पाप धुल जाते हैं। क्रोध में आकर तुमने सैकड़ों निरपराध लोगों की हत्या की है। अब तुम क्रोध को त्यागकर अपना ध्यान भगवती जगदम्बा की आराधना में लगाओ। माँ जगदम्बा परम दयालु और भक्त-वत्सला हैं। केवल वे ही तुम्हारे अपराधों को क्षमा करके तुम्हें पापमुक्त कर सकती हैं। “

फिर उस तेजस्वी बालक ने क्षत्रियों की नेत्रज्योति लौट दी। वे भगवती जगदम्बा की उपासना करने लगे। इधर ब्राह्मणी भी उस दिव्य बालक को लेकर अपने घर लौट आई और उसका पालन-पोषण करने लगी । इस प्रकार देवी की कृपा से उत्पन्न उस दिव्य बालक ने भृगु – वंश को आगे बढ़ाया।