Bhagwan Vishnu Katha:दक्ष प्रजापति की दो सुंदर कथाएं थीं – दिति और अदिति । उन्होंने उनका विवाह कश्यप ऋषि के साथ कर दिया । विवाह के उपरांत अदिति ने इन्द्र को जन्म दिया । इन्द्र को देखकर दिति के हृदय में भी उसी के समान पुत्र प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हो गई ।
वह कश्यप ऋषि से बोली- “हे मुनिवर ! आप मुझे भी इन्द्र के समान एक पराक्रमी धर्मात्मा एवं शक्तिशाली पुत्र प्रदान करने की कृपा करें ।”
मुनिवर कश्यप बोले – “हे प्रिय ! धैर्य रखो । जैसा मैं कहता हूँ वैसा ही करो, फिर तुम्हें इन्द्र के समान पराक्रमी पुत्र अवश्य प्राप्त होगा ।” कश्यप ऋषि ने उसे एक व्रत करने की सलाह दी । दिति ने उस उत्तम व्रत का विधिपूर्वक पालन करना आरम्भ कर दिया । व्रत के नियमित पालन से दिति के गर्भ से दिव्य प्रकाश निकलने लगा । उसे देखकर अदिति अत्यंत चिंतित हो गई । उसके मन में यह विचार उठने लगा कि यदि दिति भी इन्द्र के समान महान पुत्र की जननी हो गई तो उसका पुत्र अवश्य ही निस्तेज हो जाएगा ।
इस बात से चिंतित अदिति ने इन्द्र से कहा – “पुत्र! दिति के गर्भ से तुम्हारा अत्यंत प्रतापी शत्रु उत्पन्न हो रहा है । तुम्हें अभी से अपनी सुरक्षा का उपाय आरम्भ कर देना चाहिए । इसके लिए तुम साम, दाम, दण्ड, भेद – किसी भी नीति का प्रयोग करके दिति के गर्भ का अंत कर दो ।”
अदिति की बात सुनकर इन्द्र अपनी विमाता दिति के पास गए । उन्होंने दिति को प्रणाम किया और मीठी-मीठी बातें बनाते हुए बोले – “माता! व्रत के कारण आपका शरीर क्षीण हो गया है । आप बहुत दुर्बल हो गई हैं । इसलिए मैं आपकी सेवा करने यहाँ आया हूँ ।” यह कहकर इन्द्र दिति के चरण दबाने लगे ।
प्रकृति की लीलावश दिति को नींद ने आ घेरा । तब देवराज इन्द्र अत्यंत छोटा रूप धारण कर दिति के मुख से होते हुए उसके उदर में पहुँच गए । वहाँ उन्होंने वज्र के प्रहार से गर्भस्थ शिशु के 49 टुकड़े कर दिए । आघात से दिति की नींद टूटी तो उसे इन्द्र के इस कार्य का पता चला ।
तब उसने क्रोधित होते हुए अदिति और इन्द्र को शाप दिया – “इन्द्र ! जैसे तूने छल से मेरे गर्भ के टुकड़े-टुकड़े किए हैं, उसी प्रकार तेरा भी नाश हो जाए, तू त्रिलोकी के राज्य से वंचित हो जाए । अदिति के गर्भ से उत्पन्न बालक बार-बार मृत्यु के ग्रास बन जाएँ । पुत्र-शोक से शोकाकुल होकर उसे कारावास में रहना पड़े ।”
जब दिति शाप दे रही थी, उसके वचन कश्यप जी के कानों में पड़े । वे दिति को शांत करते हुए बोले – “कल्याणी ! क्रोध मत करो । मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न पुत्रों को देवता होने का सुअवसर प्राप्त होगा । वे इन्द्र के मित्र होंगे । तुमने अदिति को जो शाप दिया है वह अट्ठाईसवें द्वापर में फलित होगा । अदिति मानव योनि में उत्पन्न होकर इसका फल भोगेगी । ब्रह्माजी ने किसी बात पर क्रोधित होकर मुझे भी शाप दिया है । दोनों शाप एक साथ चलेंगे । इसके लिए अदिति का मनुष्य बनना अवश्यम्भावी है ।”
इसी शाप के कारण अदिति देवकी के रूप में और दिति रोहिणी के रूप में मनुष्य योनि में उत्पन्न हुईं । महर्षि कश्यप वसुदेव के रूप में उत्पन्न हुए । इसी शाप के कारण देवकी के छः बच्चों को पैदा होते ही मृत्यु का मुख देखना पड़ा था ।
ये कथा ‘पुराणों की कथाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कथाएं पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Purano Ki Kathayen(पुराणों की कथाएं)
