yahaan sab khairiyat hai
yahaan sab khairiyat hai

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

मैं एक लड़की… उन हजारों-करोड़ों लड़कियों की नुमाइन्दगी करती लड़की जो एक रात के बाद औरत बन जाया करती हैं। और उसके साथ ही जिन्दगी जैसे करवट बदल लिए करती हो

एक नया जन्म…औरत के रूप में।

वह लड़की फिर मानों कहीं खो जाती है। और उस लड़की के वजूद को तलाश करती औरत की जिन्दगी कब शून्य पर आ पहुंचती है, उसे एहसास तक नहीं होता।

जिन्दगी की दास्तान को पन्नों पर दर्ज करने का शौक बचपन से है। सबको यह पराना शौक चाहे लगे. लेकिन मझे तो जैसे डायरी लिखने का जुनून था। अब उन्हीं पन्नों को पलटती हूँ तो कभी लड़की बनी अतीत की परतों में खो जाती हूँ, तो कभी औरत के रूप में वापिस लौट कर हकीकत से उलझ पड़ती हूँ।

चाहे बचपन लाड़-प्यार में बीता हो, लेकिन जन्म के समय वह बात नहीं थी। मां-पिता जी की आंखों के भाव तो पढ़ ही लिए थे मैंने। नवजात शिशु की खुलती-बन्द होती आंखों को देख कर उनके मन में भी खयाल तो आया ही होगा- काश यह आंखें बन्द हों तो फिर ना ही खुलें….

डायरी में अतीत का पहला पन्ना…

मेरे घर में जैसे मातम छाया था। मां सुबक रही थी। पिता जी परेशान थे। मां के माफी मांगने पर पिता जी भड़क पड़े थे,

“पागल हो गयी हो? मैं और मर्दो की तरह नहीं हूँ। बेशक मुझे भी लड़के की ही चाहत थी। लेकिन लड़की पैदा हो गयी तो इसमें अकेले तुम्हारा दोष थोड़े ही है। बस, माता रानी की भेंट समझ कर स्वीकार कर लो। शायद यह अपने साथ हमारे लिए अच्छी किस्मत भी लाई हो। लड़की तो वैसे भी कंजक का रूप है।”

‘पहली औलाद लड़का हो जाता, तो अच्छा था न…।”

पर मेरी मां को गम था, मुँह से निकल ही गया।

“दिल छोटा मत करो। अगली बार लड़का ही होगा।”

पिता जी ने सांत्वना दी, पर मां आशंकित थी,

“अगर फिर से लड़की हुई तो?”

यह सुनते ही पिता जी के मन का ज्वार-भाटा बाहर आ गया था,

“दिमाग खराब है तेरा? एक तो वैसे भी लड़की जन कर दुनिया भर की मुसीबतें ला दी हैं तुमने। और फिर ऊपर से…फिर लड़की की बात जुबान से निकलती है। कहां गये तुहारे टोटके कि लड़का ही जनूंगी? मीठी चीजें खाकर मुहल्ले भर में जैसे भविष्यवाणी करवा डाली- लड़का जनेगी जानकी…। और नतीजा क्या निकला?”

पिता जी के व्यंग्य बाण मां को घायल करते रहे। और मां सुबकने के सिवाय क्या कर सकती थी?

मां की आंखों में आंसू देखकर मैं नन्हीं सी जान पहले तो सहम गयी। फिर मां की लाचारी पर ना जाने क्यूं हंसी आ गयी। मुस्कान में होंठों को फैलते देख मां ने मन की भड़ास निकालते हुए कहा था,

“जन्म लेते ही मर क्यूं ना गयी?”

मैं मासूम, फिर से हंस दी थी। शायद मां की नासमझी पर।

कि क्या जन्म लेना मेरे बस में था, जो मौत को गले लगा पाती?

अगले ही पल मां के हाथ मेरी तरफ बढ़े, तो डर गयी। कहीं मां ने जन्म देते ही जिन्दगी ले लेने का फैसला तो नहीं कर डाला था? पर मां ने छाती से लगा लिए। और मैं तो मां की छाती से जुदा ही नहीं होना चाहती थी।

और फिर….

अतीत का सुनहरी पन्ना…

वह पन्ना जो मेरे घर वालों की खुशी से ओत-प्रोत है। यह खुशी का मौका मेरे जन्म के दो साल बाद आया था। घर में खुशी का माहौल था, शोर-शराबा था। पिता जी के तो मानो खुशी के मारे जमीन पर पांव ही नहीं टिक रहे थे।

“तुमने मेरी इज्जत रख ली जानकी। जानती हो, मुहल्ले की औरतों में खुसर-फुसर है। कह रही हैं जानकी पूरे 9 महीने तो खट्टी चीजें खाती रही, चटखारे ले-लेकर और पैदा कर डाला लड़का। पहले मीठी चीजें खाई तो लड़की और अब की बार खट्टी खाकर लड़का? यहीं तो साबित करता है कि कलयुग चल रहा है।”

कहते हुए पिता जी खिलखिलाकर हंस दिये थे। उनके मुख पर मानो खुशी के भावों के साथ ही साथ एक अजीब-सा संतोष भी सिमट आया था। मां को गले लगाकर बोले,

“आज सही मायनों में, मैं बहुत खुश हूं।”

फिर अचानक मेरी तरफ देख कर पिता जी के चेहरे के भाव बदले थे। उनके चेहरे के भाव तो नहीं समझ पाई। लेकिन उनके कहे शब्द मेरे कानों में गूंज उठे थे,

“अरे प्राची, तू क्या मां के साथ चिपकी पड़ी हैं? अब यह जगह तेरे भाई की है। तू आज से दादी मां के साथ सोएगी।”

मां मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई,

“कोई बात नहीं। एक तरफ सो जाएगी। अभी बच्ची है बेचारी।

पर पिता जी को शायद यह मन्जूर नहीं था।

“नहीं इसे तुमसे अलग सोने की आदत डालनी होगी जानकी। गरमी का मौसम है…छोटे बच्चे को आराम चाहिये। यह अपनी दादी मां के साथ सो जाएगी। ठीक है ना प्राची?”

पिता जी का सवाल…।

वह जानते थे कि मैं कहां उत्तर दे पाती? अभी तो बोलना भी नहीं सीखा था मैंने।

छोटी थी तो लफ्जों के मायने नहीं मालूम थे। लेकिन चेहरे के भावों को पढ़कर अन्दाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि मेरी जगह इस घर में पहले-सी नहीं रही थी। मेरी जगह मेरा भाई काबिज हो चुका था।

छोटी उम्र में ही मुझे बड़ी समझ कर यह आशा की जाने लगी थी, कि मैं बच्चों-सी नादानियां छोड़ दूं। मां की गोद छूट गयी। दादी मां की बगल मेरा आशियाना बन गयी। दादी मां को शायद यह एहसास था कि मैं अभी बच्ची ही थी। पर दादी मां दुलार करते हुए आने वाली जिन्दगी में बतौर एक लड़की मेरे क्या फर्ज हैं और समाज द्वारा थोपी गयी क्या बन्दिशें हैं, उनका खुलासा करना कभी नहीं भूलतीं। दादी मां तो जैसे मेरी पहली टीचर हो….

डायरी का एक और पन्ना….

मुझे बचपन में खेलने-कूदने का बड़ा शौक था। लेकिन जब भी खेलने जाती तो अक्सर दादी मां की आवाज मानो मेरा पीछा-सा करती हो। वह जोर-जोर से चिल्लाती,

“प्राची-प्राची कहां हो?”

मैं खेल-कूद में मस्त दूर से ही जवाब देती,

“आई दादी मां…”

फिर डर के मारे खेल-कूद छोड़ दादी मां के पास दौड़ी आती और मेरे पहुंचते ही दादी मां सवाल दागती,

“अरे कहां थी तू? कब से बुला रही हूँ।

“बरामदे में खेल रही थी दादी मां….।”

इस पर दादी मां मेरे गाल सहला कर फिर से सबक देने से बाज नहीं आती।

“देख, तू अब बड़ी हो रही है। घर के काम-काज में मेरी और अपनी मां का हाथ बटाया कर। चल बैठ…दाल, चावल बीन दे…।’

नादान बच्ची, मैं जिद करती,

“पर दादी मां, मेरा खेलने का बहुत मन कर रहा है। पहले खेल लूं.. ..फिर…।”

इस पर दादी मां तो मानो प्रवचन देने लगतीं,

“लड़कियां कभी इन्कार नहीं करती। यही संस्कार हैं। इन बातों को दिमाग में अच्छी तरह बिठा लो, तभी इस दुनिया में जी पाएगी।”

मेरे मन में सवाल उलझन पैदा करता तो जुबान पर शब्द आ ही जाते,

“पर सूरज तो कभी बात मानता ही नहीं। उसे कोई कुछ नहीं कहता।”

इस पर दादी मां उदास हो कर कहती,

“उसे मर्द बनना है प्राची, और तुम्हें औरतं”

और फिर दादी मां खामोश-सी हो जाती। मानो अपने आप से कई सवाल-जवाब कर रही हों। मानो अपने आप से ही लड़ रही हों। जैसे कई खयाल उन्हें दीमक बन कर चाटने लगे हों। शायद कई एहसास उन्हें विचलित कर रहे हों।

विचलित तो मैं भी थी। दादी मां के बताये काम को पूरा करते ही फिर से बरामदे की तरफ दौड़ पड़ी थी। सूरज बाकी बच्चों के साथ खेल में मगन था। मैंने पकड़ कर पूछा था

“सूरज….सूरज बात तो सुनो…।”

इस पर सूरज तंग होते हुए बोला था,

“मुझे खेलने दो। तंग मत करो।”

पर मैंने उसे अपने बाहों में जकड़ लिए था। वह परेशान था। लेकिन मुझे तो अपने दिमाग में चल रही अशान्ति को शान्त तो करना ही था।

“सूरज मुझे एक बात का जवाब दो। औरत और मर्द में क्या फर्क है? है तो दोनों इनसान ही?”

इस पर सूरज जोर से हंस दिया था,

“अरे पागल बहुत फर्क है….।”

“पर क्या फर्क है?” मैं असमंजस में थी।

इस पर सरज मानो याद करता बोला था,

“जैसे लड़के बाल कटवाते हैं, लड़कियां लम्बे बाल रखती है।”

सूरज तो कह कर हंस दिया। लेकिन मैंने चिढ़ कर कहा था,

“अरे, मैं तो मर्द-औरत की बात कर रही हूं।”

सूरज फिर से कुछ सोच कर बोला था,

“मर्द कमा कर लाते हैं और औरतें घर का सारा काम करती हैं। मर्द घर का काम नहीं करते।”

“अच्छा? पर खाना तो वो भी खाते हैं ना? घर का बना खाना?” मुझे गुस्सा आ रहा था। लेकिन सूरज मुस्कुराया था।

“औरत का फर्ज है खाना बनाना और खिलाना।”

“और?”

मेरे इस सवाल पर सूरज बोला।

“और मर्द जो भी कहे, औरत को मानना पड़ता है। वह कुछ मांग तो नहीं सकती, पर किसी बात के लिए मना नहीं कर सकती। मना करे तो मर्द उसकी पिटाई भी कर देता है।”

‘पिटाई’ की बात पर मुझे थोड़ी हैरानगी हुई थी। पर जल्दी ही यह हैरानगी खत्म हुई। मेरा जिन्दगी की कड़वी हकीकतों से पाला पड़ने लगा था।

डायरी का एक और पन्ना….

उस रात पिता जी ने काफी पी रखी थी। वैसे भी पिया करते थे, और हम बच्चे सहम जाया करते थे। लेकिन उस रात तो मानो पिता जी ने हद ही कर दी थी। उनके कमरे से जोर-जोर से आवाजें आ रही थी। पिता जी नशे में चूर थे।

“तू मेरी औरत है। मुझे मना नहीं कर सकती।”

मां दबी आवाज में बोली थी,

“थोड़ा धीरे बोलो। गली-मुहल्ले वाले सुनेंगे तो क्या कहेंगे? प्राची की ही शर्म करो। वह अब बड़ी हो रही है।”

लेकिन पिता जी को शर्म कहां थी? भड़क पड़े,

“तू मुझे यह बता कि मना कैसे कर सकती है? ब्याह कर लाया हूँ तुम्हें।”

इस पर मां को गुस्सा आ गया।

“ब्याह कर लाए हो तो कौन-सा सुख दिया है? तिल-तिल कर जिन्दगी बसर कर रही हूँ। बेबस….लाचार जिन्दगी…।”

कहते हुए मां सुबक पड़ी। पर पिता जी तो नशे में थे। माँ की भावनाओं के साथ खेलना मानो उनका शौक बन गया था। मां को उसकी हद बताते गरजे,

“जुबान मत लड़ा। औरत है तो औरत की हद में रह।”

मां फफक पड़ी।

“मैं तो हद में रह कर ही बात कर रही हूं। मर्यादा तो आप तोड़ रहे हैं। बच्चे जवान हो रहे हैं, उनकी चिन्ता तो आपको है नहीं। नशा करना छोड़ दो…वरना घर बर्बाद हो जाएगा…बच्चे बर्बाद हो जाएंगे…।”

पर पिताजी ने तो धमका ही दिया,

“ज्यादा भाषण मत दे। ऐसा ही सलूक रहा तेरा तो सौत ले आऊंगा….।”

सौत का सुनते ही मां का पारा मानो सातवें आसमान पर चढ़ बैठा,

“तो ले आओ…। ले आओ…। देखती हूं कितना सुख देते हो उसको भी। मेरी जिन्दगी तो बर्बाद कर ही दी है। एक और की कर लेना।”

पिता जी को मां का पारा बर्दाश्त ना हुआ,

“जुबान को लगाम दे वरना, मेरा हाथ उठ जाएगा।”

पर मां भी चुप करने वाली नहीं थी।

“कौन-सा पहली बार उठेगा? सच बोलो तो औरत की जुबान बन्द करने का यही तो हथियार है मर्दो के पास…।”

और हथियार चल दिया।

औरत फिर से लाचार थी। बर्दाश्त करने को मजबूर। हाथ उठाने पर प्रतिरोध करने का भी हक जो नहीं था उसके पास। अच्छे संस्कारों में नहीं आता। संस्कारों के बोझ तले, औरत हर जुल्म बर्दाश्त करने को मजबूर।

मां और पिता जी के बीच छिड़ने वाले महाभारत ने घर का माहौल ही जैसे बिगाड़ कर रख दिया था। पिता जी चिढ़े-चिढ़े रहते और उनसे बात करने की हिम्मत ही ना होती। अक्सर दादी मां ही उन तक बात पहुंचाने का जरिया बनती। शायद इसलिए कि दादी मां कुछ हमदर्द भी थीं और पिता जी उनकी बात कम से कम सुन तो लेते थे।

डायरी का एक और पन्ना….

मैं स्कूल पास कर चुकी थी। आगे पढ़ने की ललक थी। दादी मां को सहारा बनाया, तो दादी मां ने बात करने का बीड़ा उठा लिए।

पिता जी अपने कमरे में रेडियो पर पुराने गीत सुन रहे थे। दादी मां ने रेडियो बन्द किया तो वह चौंके। मैं दरवाजे की ओट में छुप गयी। दादी मां बोली,

“सुन पहले पूरी बात सुन लेना…फिर बोलना। आजकल पढ़ाई-लिखाई बहुत जरूरी है। यह दकियानूसी बात है कि लड़की को तो पराये घर जाना है। ज्यादा पढ़ा-लिखा कर क्या फायदा? अब तो लड़की पराये घर भी तभी जा पाती है, जब पढ़ी-लिखी हो। समझ रहे हो ना मैं क्या कह रही हूँ।”

पिता जी अजीब से भाव बना कर बोले,

“हां मां…मैं समझ गया। आपको प्राची ने सिफारिश करने के लिए भेजा है।”

“जमाना बदल गया है राम प्र
साद। लड़के और लड़की में फर्क कहां रहा अब? अगर तुम्हारी यही सोच है कि सूरज पर पैसा खर्च करना फायदेमंद है, क्योंकि वह तुम्हारे पास रहेगा, तो प्राची पर पैसा खर्च करना भी फायदेमंद है। अच्छी पढ़ी-लिखी होगी तो रिश्ता अच्छा भी मिलेगा और रिश्ता मिलने में कोई परेशानी भी नहीं होगी।”

पिता जी शायद बात समझ रहे थे, लेकिन फिर भी झल्ला कर बोले,

“प्राची भी तुम्हें ही पैरवी करने भेजती है कि तेरी बात तो मोड़ नहीं पाऊंगा। ठीक है, कालेज में दाखिले का फार्म ले आने को कह देना प्राची को।”

दादी मां खुश होकर बोली,

“तू खुद ही प्राची को यह खुशखबरी क्यूं नहीं देता? उससे प्यार से बात करा कर। बेचारी और कितने ही साल रहेगी यहां? आखिर उसे पराये घर तो जाना ही है।”

“ज…जी…ठीक है।”

पिता जी के कहते ही दादी मां ने जोर से आवाज दी,

“प्राची…प्राची…।”

“जी दादी मां…।”

दादी मां ने पिता जी की तरफ देखकर जैसे उन्हें चेताया हो। पिता जी बोल उठे,

“हां… वोह…। प्राची, ठीक है। कालेज में एडमिशन ले लो। लेकिन एक बात याद रखना, पढ़ाई पर ही ध्यान देना है। तुम तो जानती ही हो कि मेरे पास इतने पैसे भी नहीं है। एक-दो साल में सूरज को इंजीनियरिंग के लिए भेजना है। उसके लिए तो ढेर सारा पैसा चाहिये। तुम पढ़ो….कोई बात नहीं, लेकिन ऊपरी खर्चों के लिए पैसे नहीं हैं मेरे पास।”

“थैक्यू पिता जी…!” कहकर मारे खुशी के मैं सरपट दौड़ी तो दादी मां ने हंसकर कहा था,

“अरे, खुशी में पागल मत हो। गिर पड़ेगी….?”

मैं खुश थी।

वाकई, मैं बहुत खुश थी। पढ़ने का तो मुझे बचपन से ही शौक था बारहवीं कलास में मेरे 80 प्रतिशत नम्बर थे। आराम से इंजीनियरिंग की सीट मिल जाती। लेकिन पिता जी ने तो अपनी गाढ़ी कमाई सूरज पर लगाने का मन बना रखा था।

दादी मां बात न करती तो पिता जी ने तो घर बिठाने का मन बना लिए। था। उनके मुताबिक कालेज में पढ़ाई के साथ-साथ और भी खर्चे होते हैं, जो वह मेरे लिए कर पाने में अपने आप को असमर्थ मानते। शायद उनका इशारा फैशन की तरफ था। लेकिन उस तरफ तो मेरा ध्यान ही कभी नहीं गया।

और फैशन ना करना ही जैसे मुझे औरों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना गया। कालेज में रोज ही कोई ना कोई दोस्ती करने की कोशिश करता।

पर, मैं तो पढ़ने गयी थी। सो पढ़ाई पर ही ध्यान लगा था। लेकिन कुछ बातों पर अपना जोर नहीं चलता। दिल फैसले लेता है।

डायरी का एक खूबसूरत पन्ना….

वह देखने में अच्छा था।

लेकिन मैं उस किस्म की लड़की थी ही नहीं। जब उसके बढ़ते कदमों को रोकते हुए मैंने कहा था,

“राज, मैं ऐसी-वैसी लड़की नहीं हूँ।”

इतना सुनते ही वह मेरी आंखों में झांकते हुए बोला था,

“मैं भी ऐसा-वैसा लड़का नहीं हूं। इसीलिए मेरी दिली ख्वाहिश है कि जो ऐसी-वैसी ना हो, उसी से मेरी दोस्ती हो जाए।”

“मैंने तुमसे बात क्या कर ली, तुम तो पीछे ही पड़ गये।”

मेरे बनावटी गुस्से को भांप कर वह बोला था,

“लेकिन तुम्हारी बातों से महसूस नहीं होता कि तुम गुस्से में बोल रही हो।”

“मुझे गुस्सा आता ही नहीं…।”

“तभी तो तुमसे दोस्ती करना चाहता हूं। तुम्हें आता नहीं और मुझे तो जाता ही नहीं।”

“अरे बाप रे, तब तो….।”

“तब तो मेरा गुस्सा भी शान्त हो जाया करेगा। और अपना ब्लड प्रेशर नॉर्मल। गुस्सा भी तो अपना हमशक्ल देखकर ही और भी रौद्र रूप इख्तियार कर लेता है।”

“क्या बात कर रहे हो…। मेरी तो कुछ समझ में नहीं आती।”

“एक ही बात समझो। मुझ से दोस्ती कर लो…।”

राज की बेबाक बातों पर मैं तुनक कर बोली थी,

“क्यों?”

“क्योंकि तुम मुझे अच्छी लगती हो।”

“अरे, लेकिन तुम भी तो मुझे अच्छे लगने चाहिये ना?”

“लेकिन राज कुछ ज्यादा ही रोमांटिक हो गया था।

“जब से तुम्हें देखा है मैं अपसेट हो गया हूँ। बैचेन रहता हूं। रात में नींद ही नहीं आती। उल्लुओं की तरह जागा रहता हूँ। फ्रस्ट्रेटिड हूँ…एकदम क्रेजी।”

“अच्छा जी!! अभी तो दोस्ती का फार्म भर रहे हो तो यह हाल है। कहीं फार्म ओ.के. हो गया तो?”

“तो मैं शान्त हो जाऊंगा…रिलैक्स…।”

“नहीं, तुम और भी विचलित हो जाओगे। सुनो, तुम रिलेक्स होना चाहते हो ना…?”

“जैसे हालातों से गुजर रहा हूँ तो हां…।”

“तब तो बेहतर यही है कि फार्म रिजैक्ट कर दिया जाए।”

इतना सुनते ही राज सकपका गया था।

“पागल हो? रोज इतनी पलानिंग करके आता हूँ कि तुम से यह कहूँगा. ..वह कहूँगा। लेकिन तुम तो एप्लाई ही नहीं करने दे रही। चलो यार, ऐसा करो… रिजैक्ट मत करो। एप्लाई करके रखता हूँ। फिर मौका लगे तो कंसीडर करना।”

“ओह…वेटिंग लिस्ट…?”

जाने क्यों? कहते ही मैं खिलखिलाकर हंस पड़ी थी।

रोज ही दोस्ती के लिए ‘हां’ सुनने को बेताब राज कितनी ही बातें करता। और मैं भी ना जाने किस मोहपाश में उसकी बातें सुनने खिंची चली आती।

लेकिन मैं अच्छे संस्कारों की दुहाई देकर ‘हां’ कह कर मुहर ना लगा पाई। और वह पागल इनसान…। यह ना समझ पाया कि अगर उसके पास बैठी रहती हूं, उसके बुलाने पर दौड़ी चली आती हूँ, उस से बातें करती हूँ …. तो इसका मतलब क्या है? ‘हां’ ही तो।

यूँ तो आंखों की जुबान पढ़ने के दावे करता फिरता था। तो फिर जुबान से ही सुनने को बेताब क्यों था? क्या इन आंखों में अपने लिए दोस्ती ना ढूंढ पाया? इन आंखों में, जिनमें दोस्ती के अलावा और भी बहुत कुछ था। मैं जुबान खोल ना पाई, वह समझ ना पाया और मां-पिता जी ने बिना मुझसे पूछे ही मेरे भविष्य का फैसला कर डाला।

राज को पता चला तो शोख, चंचल चेहरा मुरझा गया। बस उसके मुंह से यही निकल पाया था,

“The End…. फिल्म शुरू भी नहीं हुई और….।”

इतना कह कर राज ने कदम वापिस क्या मोड़े, मेरी तरफ कभी बढ़ा ही नहीं। उसके लिए तो चाहे फिल्म का The End… था, लेकिन मेरी जिन्दगी का तो Interval था। उसके बाद की कहानी बिलकुल अलग।

अलग पर,

अलग परिवार

एक नया जन्म।

ढोल….।

शहनाई…

और फिर सारा शोर-शराबा खत्म।

एक अलग घर….।

एक अजनबी-सा कमरा….

और एक खूबसूरत एहसास….

नयी जिन्दगी की शुरुआत….

सुहागरात…

सचिन बहुत उत्तेजित था। मेरे जिस्म के हर अंग को मानो टटोलता बोला था,

“प्राची…।”

“जी…” सकुचाते हुए मैं बोली थी।

“क्या जितनी तुम जिस्म से खुबसूरत हो, उतनी ही मन से भी हो?”

“जी?” मैं उसके सवाल पर चौंकी थी।

“तुम हां कह रही हो?” कहते हुऐ सचिन हंस दिया।

“इसका जवाब तो तुम्हें देना ही नहीं चाहिये। मन की खूबसूरती जानने में वक्त लगेगा। मुझे दोनों ही चीजें चाहिये…और सच बोलने वाली भी। तुम से एक सवाल पूछू?”

जी?” मैं परेशान थीं

“इतनी खूबसूरत हो…तो कभी किसी से…? मेरा मतलब कोई पुराना…? समझ रही हो ना, क्या पूछना चाहता हूँ मैं? क्योंकि, जो लड़की खूबसूरत हो, और जिन्दगी का इतना सफर तय किया है, तुमने…स्कूल, कॉलेज और अब नौकरी। कहीं, किसी पड़ाव पर कोई हसीन मुलाकात जो रिश्ते में बदली हो…या ना भी बदली हो। कुछ हुआ तो होगा…?”

मेरा सर चकरा गया था,

“कैसी बातें कर रहे हो आप?”

वह अजीब-सा हंसा,

“अरे ‘सच का सामना’ नहीं है यह। बस, दिल में एक सवाल उठा….जुबान पर आ गया। तुम जवाब नहीं देना चाहती तो ना दो। लेकिन मुझे इस्तेमाल की हुई चीजें पसन्द नहीं…स्कूटर तभी तो बेच डाला। मोटर साइकिल जो आ गया। उम्मीद तो खैर गाड़ी की थी…मतलब कार। लेकिन, तुम्हारे मां-बाप के पास इतना पैसा नहीं था। ना? वैसे भी लड़की को अच्छा-खासा पढ़ा-लिखा कर नौकरी लगवा दी….काफी है। रही बात कार की, तो बैंक से लोन लेकर ले लेंगे…तन्ख्वाह में से कार की किस्त कट जाया करेगी। अरे…आज तो हमारी सुहागरात है, और क्या पबनियों वाली बातें कर रहे हैं हम?”

मेरे चेहरे पर छाते जा रहे उदास भावों को पढ़ कर सचिन बोला था,

“लगती है, तुम्हारा मूड नहीं हैं….।”

“ज…जी?”

“अरे, तुम मूड होने की बात कर रही हो। बहुत तेज हो। मुझे पहले ही शक था…खूबसूरत लड़कियां तेज होती है। लगा तो बुरा….पर चलो, खूबसूरत लड़की पास हो तो….रुका भी नहीं जाता।”

कहते ही वह भूखे भेड़िये की तरह मेरे ऊपर टूट पड़ा था। मेरे सपने चकनाचूर हो रहे थे…और वो मेरे शरीर को रौंद रहा था।

कुछ इनसानों को समझने में चाहे पूरी उम्र लग जाए, पर कुछ एक तो पलों में ही अपना किरदार खोल कर रख देते हैं। इस जन्म के मेरे पति ने भी एक ही रात में अपने आप को नंगा कर दिया था।

मानसिक तौर पर भ्रष्ट, हर चीज को पैसों के तराजू में तौलने वाला, अपनी बीवी के जज्बातों से खेलने वाला, उसके जिस्म को रौंदने वाला.. शायद एक भेड़िया। और उनका भरपूर साथ देने वाले उसके परिवार के लोग…।

रेवा….

मेरी ननद…।

रसोई में काम में हाथ बंटाने लगी तो बोली,

“प्राची, तुम्हें बुरा तो नहीं लग रहा ना, कि शादी हुए अभी दो दिन भी नहीं बीते और तुम्हें रसोई में काम करना पड़ रहा है?”

मैं मुस्कराई थी,

“नहीं तो, भला बुरा क्यूं लगेगा?”

ननद हंसी,

“नई नवेली दुल्हन हो तो कुछ दिन रसोई से दूर रहने का तो मन करता ही होगा तुम्हारा। लेकिन क्या करूं। मां जी तो रसोई का काम संभालने से रही। मैं भी कब तक यहीं पड़ी रहूंगी? मेरे वापिस जाने से पहले चूल्हा-चौका संभाल लो तो मेरी भी परेशानी खत्म हो।”

मैं जवाब में सिर्फ मुस्करा भर दी। दीदी समझाते हुए बोली,

“प्राची एक बात का ध्यान रखना। हमारे घर में सारे ही खाने-पीने के शौकीन है। अच्छा बना कर खिलाओगी तो सिर आंखों पर बिठायेंगे। ननद हूँ तो यह मन्त्र तुम्हें देना अपना फर्ज समझती हूं।”

“जी…।” मैंने गर्दन हिलाई थी।

“और हां एक बात और…। यह तुम्हारा ससुराल है। सो हमेशा दबी जुबान से बात करना। ऐसी ही कुछ आदतें लड़की के संस्कारों का खुलासा करती हैं। तुम समझ रही हो ना, मैं क्या कह रही हूँ।”

“जी….जी दीदी।”

रेवा दीदी आगे बोली,

“पिता जी कुछ मूडी स्वभाव के हैं। बात की तो की, नहीं तो चुप। मां कुछ ज्यादा बोलती हैं, पर उसकी बातों में वजन होता है। और रही बात सचिन की, वह तो हमारे खानदान में सबसे जीनीयस है। जात-बिरादरी में बहुत इज्जत-मान हैं उसका। कितने ही रिश्ते आए, लेकिन तुमने पता नहीं क्या जादू कर डाला कि तुमसे ही शादी करने को लेकर उतावला होने लगा। वह तो तुम्हारे बस में ही हैं।” कह कर रेवा दीदी हंस दी थीं।

ननद होने का फर्ज रेवा दीदी ने खूब निभाया। जल्दी जाने की बात चाहे शादी के दूसरे दिन ही कर दी थी, लेकिन वापिस गयी पूरे एक महीने के बाद।

शायद मुझे इस घर के लायक बनाना चाहती थीं। तभी तो हर वक्त किसी टीचर की तरह नसीहतें देने से बाज नहीं आती। जिन्दगी का पाठ जैसे नये सिरे से सीखना हो।

हां, यह एहसास तो हो गया था कि औरत की जिन्दगी में अपना कुछ नहीं है। पहले मायके वाले उसे अपने काबू में रखते हैं फिर ससुराल पक्ष वाले जिन्दगी के रुख का फैसला लिए करते हैं।

ऐसे में अन्जान लोगों में अपना मायका याद आता है। मन करता है कि पंख लग जाएं तो अपनों के बीच चली जाऊ। उनकी याद भी तो सताने लगती है।

रात…. वासना का तूफान शान्त हुआ, मैंने अपने मन की बात सचिन के सामने रखी तो कुछ पल पहले थका-हरा होने का स्वांग कर रहा सचिन उठ बैठा था,

“क्या कह रही हो? तुम जाओगी तो यहां खाना कौन बनाएगा? मां से काम होता नहीं और अगर मुझे या पिता जी को ही खाना बनाना है या होटल का ही खाना है तो फिर शादी करने की क्या तुक थी? देखो प्राची, तुम अब शादी-शुदा हो। अपनी जिम्मेदारियां समझो।”

पुरुष प्रधान समाज….

मेरी हालत तो नौका में सवार उस इनसान की तरह थी, जिसकी पतवार किसी और के हाथ थी और वह ही मेरी जिन्दगी की दिशा तय करने वाला था वह कोई और नहीं, मेरा अपना होने का स्वांग भरने वाला भी था।

मर्दो का वर्चस्व….

वह ही औरतों की जिन्दगी को दिशा देते हैं। उनके भविष्य का फैसला करते हैं। और औरत वक्त के हाथों मजबूर कठपुतली बनी उसके इशारों पर नाचने को लाचार।

शादी के बाद, सिर्फ कुछ रस्में निभाने ही मायके जा पाई। दिल खोल कर मां और दादी मां से बात भी ना कर पायी कि वापिस लौटना पड़ा। मैं अपने नये घर को अपनाने की कोशिश करने लगी थी। अपनी सास-ससुर में मां-पिता जी को खोजने की कोशिश करने लगी थी।

पर सास अपने स्वभाव का परिचय देने लगी थीं।

“प्राची-ए प्राची, अरे साफ-सफाई करनी है तो मन लगा कर किया कर। वह देख दीवारों पर जाले लटक रहे हैं। और कुछ झुक भी लिए। कर, तभी तो बेड के नीचे से गन्दगी निकल पाएगी। अरे, जो बातें मां को समझानी चाहिये, मुझे समझानी पड़ रही है।”

ससुर बीच-बचाव करने की कोशिश करते,

“अरे क्यों ताने दे रही हो बेचारी को? अच्छा भला घर तो संभाल रखा है बहू ने।”

पर सास कहां बोलने देती,

“आप चुप रहते हो, तभी अच्छे लगते हो। औरतों की बातों में मत बोला करो। अपनी बेटी को ही लो- पूरा तैयार करके भेजा है ससुराल। वह तो उसकी खसम तक नहीं उठाते। बेटी को अच्छी बहू बनाने में उसकी मां का ही हाथ होता है। अफसोस तो इस बात का है कि वह काम भी मुझे ही करना पड़ रहा है।”

ससुर फिर से टोकते,

“अरे घर में शान्ति रखो शान्ति देवी। एक ही बहू है…।”

इस पर शान्ति देवी जी का गुस्सा तो सातवें आसमान पर जा चढ़ता।

“एक ही है, तभी तो मुश्किल है। कोई और लड़का भी होता तो उसकी बीवी पर ही आस रहती। ले दे के अब एक ही है, तो उसे ठीक तरह से समझाना तो है ना? इसे ही पूरा घर संभालना है। महारानी की तरह देर से उठेगी तो कब खत्म कर पाएगी काम-काज और कब जा पाएगी नौकरी? इसे यह तो समझाना ही है ना कि यह मायका नहीं… ससुराल है ससुराल…।”

ससुराल…ससुराल….ससुराल।

यह शब्द जब होश भी ना संभाला था, तभी से मेरे कानों में मानो शीश घोल रहा हो। मां, दादी मां, पिता जी का बार-बार कहना, “अपनी आदतें ऐसी बनाओ कि ससुराल से परेशानी ना हो।”

और इसलिए, हर पल ससुराल जाने से पहले ही उसकी तैयारी शुरू हो गयी। लेकिन जब ससुराल पहुंची तो यह ताना कि मायका समझ रखा है ससुराल को?

क्या औरत सिर्फ समझौते का नाम है?

सचिन से जिक्र क्या कर बैठी कि उसने तो भाषण ही पिला दिया,

“प्राची, वक्त से समझौता करना सीखो। हमने भी किया, तुम भी करो। जितना तुम्हारे परिवार के बारे में सुन रखा था, वैसा है नहीं। तुम्हें नौकरी करते चार साल हो चुके थे….और तुम्हारे पास फुटी कौड़ी तक न थी। जाहिर है….मां-बाप ने लिए, जो कि गलत है। अपनी बेटी की कमाई खाना तो पाप है।”

यह सुनते ही मुझ से नहीं रहा गया था, तो बोल पड़ी थी,

“उन्होंने नहीं खाए। मैंने अपनी पसन्द से दहेज…।”

लेकिन सचिन तो सुनने के लिए राजी ही ना था,

“दहेज देना तो मां-बाप का फर्ज है प्राची। मुझे पता है, तूने अपने भाई सूरज की पढ़ाई में मदद की है। बतौर तुम्हारे पति, मैं तुमसे पूछने का हक रखता हूं कि तुम्हारी कमाई कहां जाती है? चलो, अतीत में जो हो गया, सो हो गया। भविष्य में ऐसा ना हो, इसलिए तुम अपनी तन्खवाह मां को दे दिया करना…हर महीने…।”

“जी…?”

“चेहरे के भावों में बगावत नजर आ रही है।”

“जी…जी नहीं तो…।”

“यही तो संस्कार है। मैं भी अपनी सारी तनख्वाह मां को देता हूं। फिर मां से खर्चे के लिए पैसे ले लिए करता हूँ। बुजुर्गों की छत्र-छाया में ही सब कुछ चले तो बरकत भी है और घर में सुख-शान्ति भी रहती है।”

सुख शान्ति…?

हां, सुख शान्ति के लिए हर कुछ कुर्बान करने को तैयार हो गयी थी मैं। लेकिन ताने-महीनें तो जैसे जिन्दगी के ही अंश हो। कभी भी मन की भड़ास का सामना करना मानो फर्ज बन गया था मेरा। और फिर यह उम्मीद कि बहू तो गाय का ही रूप हो, सब कुछ बर्दाश्त करे और उफ तक ना करे।

हर बार मेरे मायके वालों को नीचा दिखाने की कोशिश। और अपनी बेटी से मेरी तुलना।

उधर मायके में मां-पिता जी और दादी मां मुझे लेकर परेशान थे। शादी के बाद जब कभी मायके गयी थी तो सचिन के साथ गयी और फिर उसी के साथ लौट भी आई।

मां और दादी मां के मन में मेरे ससुराल को लेकर लाखों सवाल थे, जो हर बार उनकी आंखों में ही रह जाते।

मैं भी ढेर सारी बातें करना चाहती थी।

मां और दादी मां के गले लगकर फिर से रोना चाहती थी। अपना जी हल्का कर लेना चाहती थी।

पर…।

और फिर एक दिन….

सूरज पता करने आ ही गया।

सास व्यंग्य में बोली थीं,

“अरे सूरज बैटा, बहुत जल्दी बहिन की याद आ गयी। आओ…आओ, बैठो। जी भर कर बातें करो। मैं चलती हूं…मेरे सामने खुलकर बात ही नहीं कर पाओगे।”

सास के बाहर जाते ही सूरज ने सवालिया नजरों से मुझे निहारा, फिर पूछ ही लिए।

“कैसी हो दीदी? मां-पिता जी और दादी मां बहुत परेशान है। शादी के बाद एक बार भी घर रहने नहीं आई। घर सूना-सूना लगता है। तुम भी तो फोन ही नहीं करती, ना ही फोन उठाती हो। हार कर मां ने तुम्हारा पता लेने भेजा है। क्या बोलूं मां को….? तुम खुश तो हो ना…?”

मुझे ऐसे लगा मानो यह सवाल मेरे लिए ना हो, बल्कि हर शादी-शुदा लड़की के लिए हो।

सूरज से नजरें छुपा कर मैं इतना ही कह सकी,

“कहना….,

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’