भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
“माँ मुझे सुमित की दादी बिस्तर पर क्यों नहीं बैठने देती? मैं भी तो सुमित के साथ पलंग पर बैठ कर टी. वी. देखना चाहता हूँ।” दीप ने बहुत मासूमियत से अपनी माँ गंगा से पूछा।
“बेटा मैं उनके घर काम करती हूँ न इसलिए हम उनके साथ बैठ कर उनकी बराबरी नहीं कर सकते।” गंगा ने दीप से कह तो दिया, पर बालमन मानने को तैयार नहीं था इसलिए उसने पुनः पूछा-
“बराबरी क्यों नहीं कर सकते माँ। मैं तो सुमित भैया से थोड़ा ही छोटा हूँ। अगले साल तो मैं और बड़ा हो जाऊँगा।” फिर कुछ देर और सोचने के बाद बोला,” हाँ एक बात हो सकती है कि मेरे पैर गंदे रहते हैं न इसलिए दादी माँ को अच्छा नहीं लगता होगा।” सुमित का मासूमियत भरे प्रश्नों ने गंगा को निरुत्तर कर दिया। बचपन कितना सरल होता है। वह अमीरी-गरीबी और मालिक-नौकर के बीच की दीवार को नहीं समझता।
दीप जो करीब तीन साल का था, उसे यही लगा कि अगर उसके पैर साफ हुए तो दादी उसे बिस्तर पर बैठने से नहीं रोकेगी। दूसरे दिन उसने अच्छे से पैर धोए और जूते, जो कि थोड़े फट चुके थे उसे पैरों में डाला। वह बडी खशी-खशी माँ के साथ समित के घर चल पडा।
गंगा की एक और बारह साल की बेटी शिखा थी, जो बहुत समझदार और पढ़ाई में हमेशा अव्वल आती थी। दीप के पैदा होने के लगभग एक साल बाद ही उसका पिता घर छोड़कर चला गया था। गंगा किसी तरह दूसरों के घर काम करके अपनी गहस्थी की गाडी चला रही थी।
सुमित के घर पहुँच कर दीप ने देखा कि वह ‘स्टडी टेबल’ पर अपनी पढ़ाई कर रहा था। दीप उसे देखते ही बोल उठा, “दीप भैया, मुझे भी कॉपी पेन दो न, मैं भी आपके साथ पढूँगा।” इसके पहले की सुमित कुछ बोलता सामने बैठी दादी चिल्लाते हुए बोली, “दीप! जाओ जाकर कोने में चुपचाप बैठ जाओ। जब देखो सुमित के पीछे पड़ा रहता है।”
यह सुनकर सुमित की माँ ममता रसोई से कमरे में आई। वह नहीं चाहती थी कि दादी की बातों का सुमित पर कोई गलत असर पड़े। वह दीप को कॉपी पेन्सिल पकड़ाते हुए बोली, देखो बेटा, मैं इस पर एक से पाँच तक गिनती लिखती हूँ; तुम उसे देखकर वैसे ही लिखने की कोशिश करना। अगर ये सब लिखना नहीं चाहते तो कुछ चित्र बनाकर दिखाओ।”
“हाँ, हाँ तुम उसको और सिर पर बिठा लो। वैसे भी इस नौकरानी के बच्चे को कॉपी, पेन देने की जरूरत भी क्या है?” ममता की सास गुस्से से बोली। कोई बात नहीं माँ, आखिर वह भी तो बच्चा ही है।” ममता धीरे से बोली।
दीप जो दोनों की बातें ध्यान से सुन रहा था दादी से बोला, “दादी माँ, मेरी दीदी शिखा कहती है कि एक दिन मैं पढ़-लिख कर बहुत बड़ा आदमी बनूँगा। तब तो आप मुझ पर गुस्सा नहीं करोगी न।”
“जा-जा पहले बड़ा आदमी तो बन जा। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी।” दादी हाथ नचाते हुए बोली।
“दादी माँ आप भी हद करती हो।” यह कहकर सुमित अपने कमरे की तरफ बढ़ा। उसने दीप को भी अपने साथ आने का इशारा किया। जैसे ही दीप ने सुमित की तरफ कदम बढ़ाए, दादी पीछे से चिल्लाती हुई बोली, “दीप तुम यहीं बैठो। कोई जरूरत नहीं है सुमित के पीछे भागने की।”
“लेकिन दादी आज तो मैं अपने पैर बहुत अच्छी तरह साफ करके आया हूँ। बिस्तर बिलकुल भी गन्दा नहीं करूँगा,” दीप ने कहा। “सत्यानाश हो तेरा। क्या पैर साफ होने से तू उसके बराबर हो जायेगा? ओ गंगा! इधर आ,” दादी ने गंगा को जोर से आवाज लगाई।
“क्या बात है माँ जी?” गंगा हाँफती हुई दादी के पास पहुंची।
“कान खोल कर सुन ले गंगा, अगर यहाँ काम करना है तो कल से दीप को अपने साथ नहीं लाओगी,” गंगा ने चुपचाप सुना और फिर जाकर अपने काम में लग गई लेकिन मन के अन्दर हाहाकार मचा हुआ था।
माँ को ऐसा सुनते देख दीप को बिलकुल अच्छा नहीं लगा। माँ के वहाँ से हटते ही वह दादी से बोला, “दादी माँ, आप इतना गुस्सा क्यों करती हो? ममता आंटी तो कितनी प्यारी हैं, सबसे मीठा बोलती हैं। मैं अपनी शिखा दीदी से कहँगा कि वे मझे अपने साथ स्कल लेकर जाया करें। यहाँ तो न आप मुझे पढ़ने देती हो और न ही खेलने,” दीप ने मायूसी से कहा। “अच्छा बहुत बोल लिया अब चुप कर” -दादी बोली।
वापस घर जाते समय गंगा के मन में कई तरह के विचार उठ रहे थे। इससे पहले वाला घर भी दीप की वजह से छूट गया था। अब दीप को घर में अकेला भी तो नहीं छोड़ सकती थी। वह अपने ख्यालों में खोई हुई थी तभी दीप ने पुकारा- माँ, माँ! कल से मैं भी शिखा दीदी संग स्कूल जाऊँगा। सुमित भैया की दादी ने आज आपको भी डाँटा, मुझे अच्छा नहीं लगा।”
“कोई बात नहीं बेटा, बड़े लोगों की डांट का बुरा नहीं मानते। मैं तुम्हें अगले साल स्कूल मे डाल दूंगी।” गंगा उसे समझाते हुए बोली। जब वे घर मे पहुँचे तो शिखा स्कूल से आ चुकी थी। उन दोनों को देखते ही शिखा बोली, “क्या बात है आप लोग परेशान नजर आ रहे हैं।”
मैं बताता हूँ- दीदी, माँ कहती है कि हम लोग गरीब हैं न इसलिए मैं इस साल स्कल नहीं जा पाऊंगा।”
“बेटा मैंने ऐसा तो नहीं कहा,” गंगा बोली।
“नहीं भैया, ऐसी बात नहीं है। पहली बात तो यह है कि हम गरीब नहीं हैं। हमारे पास छोटा-सा प्यारा घर है, खाने को भी मिल जाता है और पहनने के लिए भी दो-चार जोड़ी कपड़े हैं फिर बताओ हम गरीब कैसे हुए? गरीब तो वो लोग हैं जो सड़कों पर भीख माँगते फिरते हैं,” शिखा ने समझाया।
“दीदी, फिर मैं स्कूल क्यों नही जा सकता? मैं भी पढ़-लिख कर सुमित भैया जैसा बनना चाहता हूँ,” दीप ने जिद की।
“मेरे भाई, तुम पढ़-लिख कर बहुत बड़े आदमी बनोगे। कल से तुम भी मेरे साथ स्कूल चलोगे।” यह सुनकर दीप खुशी से बोला- सच दीदी।
“हाँ मेरे भैया,” फिर माँ से बोली- मैं एक बड़ी खुशखबरी देना तो भूल ही गई। मुझे अव्वल आने के कारण अब हर महीने स्कॉलरशिप मिला करेगी और मैंने प्रिंसिपल से दीप के लिए स्कूल में दाखिले की बात भी कर ली है। कल माँ दीप को लेकर तुम्हें भी मेरे साथ चलना होगा। अब तुम निश्चिंत होकर सुमित के घर काम पर जा सकोगी।” शिखा की बात सुनकर गंगा की आँखों मे खुशी के आँसू आ गए। उसने सोचा- वह बेकार ही चिन्ता में घुली जा रही थी। जिस घर मे दीप के साथ शिखा भी मौजूद हो, वहाँ भला अन्धकार कैसे रह सकता है? उसने आगे बढ़ कर दोनों बच्चों को गले से लगा लिया और आने वाले सुनहरे कल के सपनों मे खो गई
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
