अधिकतर भावी माताएं अपने चालीस सप्ताह के प्रसव काल में कई तरह के परीक्षणों से गुजरती हैं-इनमें वे माताएं भी शामिल हैं जिनके बच्चे आयु, अच्छे पोषण व प्रसव पूर्व बढ़िया देखभाल के कारण स्वस्थ जन्म लेते हैं। इन स्क्रीनिंग टेस्ट से मां या शिशु को कोई नुकसान नहीं होता बल्कि उनके स्वास्थ्य की पुष्टि हो जाती है। हालांकि सीवीएस व एमनियो जैसे विस्तृत अल्ट्रासाउंड की जरूरत सभी को नहीं पड़ती। जिन माता-पिता के टेस्ट की रिपोर्ट नकारात्मक आती है वे आगे वाले एडवांस टेस्ट भी करवाते रहते हैं कि शायद कहीं से स्वस्थ शिशु के जन्म लेने का आश्वासन मिल सके। ऐसे टेस्टों के लिए निम्नलिखित महिलाओं को उपयुक्त प्रत्याशी माना जा सकता है :-

- 35 वर्ष से ऊपर की महिलाएं :- हालांकि माताएं प्रारंभिक स्क्रीनिंग जांच से ही संतुष्ट होकर अपने डॉक्टर की राय से आगे वाले टेस्ट को नकार सकती हैं।
- अपने डॉक्टर से पूछकर राय ली जा सकती है कि किसी मामले में प्रसव-पूर्व की सारी जानकारी आवश्यक है या नहीं!
- परिवार में जेनेटिक रोग का इतिहास या रोग का पता लगना।
- किसी भी तरह के संक्रमण का पता चलना, जो कि बच्चे के जन्म से जुड़ा हो (रुबेला/टॉक्सोप्लाज़मोसिस)
- पहले गर्भपात होना या जन्मजात विकारों वाले शिशु का जन्म
- प्रसव पूर्व स्क्रीनिंग जांच में पॉजिटिव रिजल्ट आना।ऐसी जांच क्यों करवाई जाए, जिससे शिशु को खतरा हो सकता है। दरअसल इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अगर शिशु को कोई रोग है तो उसका इलाज हो सके और कुछ नहीं है तो उसके मम्मी-पापा चिंता छोड़कर, गर्भावस्था का पूरा आनंद ले सकें।
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