काँटा या गुलाब-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Kanta ya Gulaab

Kahani in Hindi: “जाते समय,पूर्वी को गले लगाने का प्रयास किया अनुपमा ने ,पर उसने कोई रुचि नहीं दिखाई …
अपनी रुलाई को गले में भी रोक चुपचाप कोने में बैठ गयी ,और पति को उसे विदा करते देखती रही,क्योंकि पूर्वी के अनुसार अनुपमा ने उससे माँ जैसा कोई बर्ताव नहीं किया था…
अशोक उसे ट्रेन में बैठाकर पत्नी के पास आ चुके थे,उसने भरी आँखों से पूछा “क्या इतनी बुरी माँ हूँ मैं?”
“सब्र रखो “अशोक ने उसे सान्त्वना देते हुए कहा,”दरअसल आज की पीढ़ी से हम कदमताल करने में पीछे हो रहे हैं बुनियादी बातें उसे देर में समझ आती   ज़रूर हैं।
दोनोँ बुझे मन से घर लौट आये ,पूर्वी हॉस्टल पहुँच चुकी थी ,उसने  जहाँ माँ को मैसेज कर इत्तिला कर दी ,वहीँ पिता से देर तक बात की…
अनुपमा को कुछ चुभा मन में फिर उसने मौन ओढ़ लिया , कि किसी से तो बात कर रही है घर में..
कुछ अंतराल के बाद पूर्वी के  मैसेज की लम्बाई अनायास बढ़ने लगी थी और उसका हाँ हूँ के अतिरिक्त कोई और उत्तर न होता।
एक दिन उसके नाम रजिस्टर्ड चिट्ठी आई …उसने डाकिये से चौंकते हुए कहा ,आज के  ईमेल के युग में मुझे कौन चिट्ठी भेज रहा है….
उसने मुस्कुरा कर कहा भाग्यवान हो आप मैडम लिफ़ाफ़ा खोलते ही उसमेँ चिरपरिचित लिखावट मिली तो उसके आँसू छलक उठे प्यारी माँ हो सके तो अपनी इस असभ्य बेटी को माफ़ कर देना,अपने बर्ताव के लिये शर्मिन्दा हूँ तो बात करने का साहस नही हुआ..
  मुझे लगता था कि मैं हॉस्टल नहीं अपनी आज़ादी की ओर बढ़ रही हूँ ,आपकी फ़िक्र रोकटोक मुझे चिढ़ाती थी।

Also read: सर्वश्रेष्ठ -गृहलक्ष्मी की कहानियां


अनजाने में मैं आपको प्रतिद्वंद्वी मान बैठी ख़ुद  की,यहाँ आने पर एहसास हुआ कि आपने तो मुझे सदाबहार परवरिश दी है।
आपकी जिन बातों से मैं चिढ़ जाती थी,वो ही  बातें अब मेरे मार्गदर्शक का काम करती हैं,मेरा हर काम परफैक्ट जो  होता है।
आप चुप रहकर भी मेरे साथ-साथ ही बनी हुई हो जॉइन करने के बाद …
पता है   वोमेन हॉस्टल में मेरी मुलाकात किससे हुई?
पारुल दी से … हमारी कैंटीन की ओनर आप, एकबारगी उन्हें देखोगी तो बिल्कुल भी पहचान नहीं पाओगी , उन्ही ने मुझे पहचाना हम   रूममेट भी  हैं  जॉब के बाद साथ ही रहते हैं।वो बहुत बदल चुकी हैं..
पर अब वो अपने घरवालों से मतलब नहीं रखतीं,उन्हें पता भी नहीं दिया..
जीजू से डाइवोर्स लेने के बाद ,उन्हें अच्छी रकम मिली थी।उनके घरवालों ने उनसे वह भी हड़पना चाही,एक दिन वो सबको बिना कुछ बताये यहाँ चली आईं।
 अब सबकुछ  ख़ुद करती है,और बात-बात पर आपको याद करके कहती हैं कि पूर्वी मेरी सबसे बड़ी  दुश्मन मेरी माँ  है…तुम्हारी नहीं , मौसीजी ठीक कहतीं थी  उन्होंने  तुम्हें इस लायक बना दिया है कि तुम हर परिस्थिति में जी सको।और मुझे देखो बच्चा तो वही सीखता है जो उसे सिखाया जाय…
मेरी आदतों से मेरा निबाह न ससुराल में हो सका न मायके में,मुआवज़े के पैसों से आत्मनिर्भरता तो नहीं खरीद सकती थी,अन्त में मुझे सब सीखना ही पड़ा।
 अनुपमा के आगे उसकी  पड़ोसन और सहेली  रश्मि की बेटी पारुल  की तस्वीर नाच गयी ।
रश्मि ने मध्यमवर्गीय होने पर भी पारुल की परवरिश किसी शाही राजकुमारी की तरह ही  जो की थी।
पारुल को एक  ग्लास पानी भी ख़ुद से लेना पसन्द न था।
कभी कभी वो कहती भी रश्मि दी ,”अपना पेट भरना तो जानवर ,पक्षी भी सिखाते हैं अपने बच्चों को आप को नहीं लगता आप गलत हो…
इसकी शादी तय हो गयी है भगवान न करे कल को कोई परेशानी हुई तो …
“तो तुझपर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा …अनु! तू अपने परिवार से मतलब रख ,मैं तेरी तरह अपनी पारुल को  तलती  भूनती नहीं हूँ…”रश्मि ने बुरी तरह  चिढ़कर कहा …
हम समय के साथ अकेले भी पड़ते हैं,बच्चों को इतना ज़रूर सिखाना चाहिये ,कि अपना गुजारा कर सकें
ज़्यादा सुविधाओं के देने वाले माँ बाप ममतामय नही दुश्मन होते हैं सन्तान के…
सच कहूँ तो तुझे जलन है मेरी परवरिश से,मेरी बेटी के लिये इतना बुरा कह गयी तू अनु …आजके बाद मेरा तेरा कोई सम्बन्ध नहीं रहेगा ..
अपमानित होकर अनु रश्मि के घर से तो लौट आई पर कहीँ न कहीं रश्मि की सोच पूर्वी के मन में जड़ें जमाकर बैठ गयी..
रश्मि की यह बातें किशोरावस्था से गुजर रही पूर्वी के मन में  भी अच्छे से बैठ गईं ,उसे रश्मि में अच्छी और अनुपमा में बुरी माँ दिखाई देने लगी।उसने अनुपमा को   तीखी बहस के साथ-साथ   हारी-बीमारी में भी अपने असहयोग से  परेशान करने में कोई कसर न छोड़ी ,  रश्मि अदृश्य रूप से उसके घर में आ डटी. थी…
उसकी आँखें पत्र में नीचे  लिखी पंक्ति पर ठहर गयीं,माँ जिसे मैं आपकी सख़्ती समझती थी
,दरअसल वो आप का प्यार था आप मुझे मेरे हाथों  जीवन से लड़ने के औज़ार सौपना रहीं थी,और मेरी आँखों पर रश्मि मौसी की सोच का पर्दा था,गयी तो आप से पीछा छुड़ाकर थी,पर आप की आवाज़ ख़ामोशी से मेरा हिस्सा बन गयी,और मैं दूर जाकर धीरे धीरे  वो बन गयी जो आप चाहती थी,क्योंकि यह मैं भी जानती थी कि यहाँ मुझे सँभालने के लिये आप जो नहीं हो…
आपकी पूर्वी तड़ाक की आवाज़ के साथ पत्र में दबी भावनाओं की गर्मी से बरसों पुरानी बर्फ़ दरक गयी और उसका पानी न जब अश्क़ बनकर उसकी आँखों से बह निकला….
न जाने कितने दिनों बाद खुलकर रोने से मन हल्का हो चुका था,और फ़ोन की घण्टी पर ध्यान गया तो बहुत सारी मिस्ड कॉल थीं पूर्वी की…
पता था मुझे रो रही होगी आप,उसने शिकायती लहज़े में कहा…
न .. नहीं तो वो बात बदलते हुए बोली मैं और पारुल दी चार दिन की छुट्टी में आपके पास आ रहे हैं ।
“हाँ  “उसने कहा पूर्वी और पारुल के आने पर जो परिवर्तन ,अनुपमा को दिखाई दिया मानो विश्वास नहीं हो रहा था कि उसकी बेटी लौट आयी है …पारुल उससे बेल की तरह लिपटकर बोली “मौसी आप काँटा नहीं गुलाब हो , महक पूर्वी से आ रही है।काश !ये मम्मी समझ पातीं…”
बेटियों की माँ की बड़ी जिम्मेदारी होती है,उसे उत्तराधिकार में  अगली पीढ़ी को  योग्यता  जो सौंपनी  होती है..