लॉन में बैठी अम्मा मटर की फलियां छीलती जा रही थी। बेटा-बहू काम पर गए थे। नन्हा मोनू सामने साइकिल चला रहा था। तभी मोनू की साइकिल से लग कुछ दाने जमीन पर बिखर गए, अम्मा ने उठाने को कहा, ‘क्या दादी दो चार दाने ही तो गिरे हैं, दूसरी छील लो न कहकर मोनू साइकिल ले निकल गया। अम्मा को बाऊजी याद आ गए। एक भी दाना गिरने से जब तक खुद उठा न लेते चैन न लेते।
अम्मा का भरा-पूरा परिवार था, सास-ससुर छह भाई बहन, कितना प्यार था आपस में, उनकी आंखें नम हो आईं। अब कहां ऐसे परिवार दिखाई पड़ते हैं। तब के समय परिवारों में त्योहार व शादी के हफ्तों पहले से रौनक छा जाती थी, नमकीन मिठाई से कनस्तर भरे जाते, गोटे जरी टांकने के काम भी घर में सब मिल करते… अब कहां वह बात, शादी रात में ही निपट जाती है, सुबह यहां कुछ हुआ भी था पता ही नहीं चलता। आजकल सबके एक या दो बच्चे होते हैं भरे-पूरे परिवार का मतलब ही नहीं रहा, इस भाग-दौड़ के जीवन में सभी समय से पहले ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाकर उसमें खुशियां पाना चाहते हैं जो कि अम्मा की समझ से परे था, तभी मोनू ने कहा, ‘दादी पार्क नहीं चलेंगे हम? अम्मा वर्तमान में लौटी…
शाम होने वाली थी। अम्मा मोनू को पार्क में ले आई। जहां ज्यादातर बच्चे अपने दादी, नानी या आया के साथ आते थे। दिन भर अम्मा अकेले घर में बोर हो जाती थी। शाम को पार्क में अपनी हमउम्र के साथ बोल-बतिया कर समय काट देती।
एक दिन दोपहर में मीरा जो दिन भर घर के काम करती, उनके पास बैठी और बोली, ‘अम्मा मुझे लिखना-पढऩा सिखा दोगी? आज डाकघर गई तो नये डाकबाबू ने हस्ताक्षर करने को कहा तो मैं धीरे से बोली, ‘अभी तक बाबू मैं अंगूठा ही लगाती थी तब नये बाबू बोले, ‘कुछ पढऩा-लिखना सीख लो, कम से कम अपना नाम लिखना तो जानो। तब से मुझे लग रहा है कि मैं भी लिखना सीखूंगी, अम्मा काम के बाद दिनभर आपके पास खाली बैठी रहती हूं आप हमें सिखाओगी न? पचास साल की मीरा बच्चे की तरह चहक कर बोली।
अम्मा को मीरा का उत्साह देख अच्छा लगा। उनकी दोपहर भी अच्छे से कट जाएगी। ऐसा सोचा अम्मा ने। अपने समय की बी.ए., बीएड पास थी। कई बार स्कूलों से ऑफर भी आए पर बच्चों व पति में व्यस्त कभी इन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया। उन्हें इसका अफसोस भी नहीं क्योंकि उनके बच्चे आज उच्च शिक्षा प्राप्त कर अच्छे पदों पर प्रतिष्ठित हैं।
‘अम्मा आगे क्या लिखना है? मीरा ने पूछा तो अम्मा ने चश्मा साफ करते हुए कहा, ‘अरे वाह! कुछ दिनों में ही होशियार हो निकली। कहकर अम्मा ने उसकी पीठ थपथपाई।
अब रोज दोपहर अम्मा का वक्त मीरा के साथ अच्छा गुजर जाता।
दो माह बाद मीरा जब डाकखाने से वापिस आई तो अम्मा के पैर छू बोली, ‘आज जब मैं पैसा जमा करने गई तो डाकबाबू ने मुझे स्याही का पैड दिया अंगूठा लगाने को, पर मैंने अपने साथ ले गई कलम निकाल कर बड़े गर्व से हस्ताक्षर किये। डाक बाबू भी मुस्करा दिये।
आज अम्मा को मीरा की आंखों में चमक व आवाज आत्मविश्वास से भरी लगी। अब उन्हें लगा कि इस उम्र में भी वो कुछ करने लायक हैं और भी कितनी मीरा होंगी, जिन्हें उनकी जरूरत होगी। अम्मा को अपने खाली वक्त का सदुपयोग मिल गया।
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