Hindi Poem: स्त्री जीवन हमेशा किताब सा रहा
ज़िल्द पर शीर्षक था
त्याग और समर्पण का
पहले पन्ने पर कर्तव्यों की सूची आई
प्रस्तावना प्राचीन थी
कर्तव्य और बीमारियों पर प्रश्नचिन्ह रहे
रेखांकित किये गये सदा अवगुण
चरित्र महत्वपूर्ण पन्ना था
माफ़ करते जाना अहम विषय
प्रेम देना अनिवार्य था
और मिलना परीक्षक की मर्जी, भावनाओं को कभी
पढ़ा ही नहीं गया
प्रश्न पूछने की अनुमति उन्हें न थी
परिशिष्ट में सदियों पुराने प्रश्नपत्र थे
जो किसी से सुलझे ही नहीं
वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में बस
मानवी का विकल्प अनुपस्थित रहा
ज़रूरत पर धूल झाड़ी गयी
घर में रहकर उपेक्षित हुई
स्त्री दरवेश सी रही
जिसके खाली कासे में
प्रेम के सिक्के न थे
पर दुआएँ बहुत थी
इसीलिये वो रब के सबसे करीब रही
उसके हिस्से का प्रेम
मोरपंख सा दबा रहा कुछ सफों में
हाँ वो और दुआ एक दूसरे के
पर्याय जो हैं
पर उसके हिस्से के पन्ने कोरे ही रहे
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