Story in Hindi: “डियर लेडीज, इस बार हम लोगों का टॉपिक है “पहला प्यार!”
अब हर किसी की जिंदगी में ऐसा तो होता ही है…पहला प्यार…, चाहे उसका प्यार हमें मिले या फिर वह हमारे दिल में एक कसक बनकर रह जाए!
“हम सब वुमनिया” फेसबुक पेज की एडमिन महोदया पुष्पा जी लगभग हँसते हुए बोली।
उन्होंने आगे कहा… तो आप सभी यंग लेडीज सभी से रिक्वेस्ट है कि आप इस सब्जेक्ट पर अपनी कविता लिखकर भेजिए। एक हफ्ते का समय है… आज सोमवार है अगले सोमवार तक इस टॉपिक पर कम से कम 10 –25 लाइन की कविता मिल जानी चाहिए।
वैलेंटाइन डे भी आने वाला है.. तो तीन सर्वश्रेष्ठ रचनाओं को पुरस्कृत भी किया जाएगा।
यह एडमिन ग्रुप ने निर्णय लिया है…!
आप सबकी रचनाओं का इंतजार रहेगा।”पुष्पा मुस्कुराते हुए बोली।
जैसे ही उसने फोन रखा
“वाह ..वेरी गुड !!,
“ग्रेट …!”
और कई तरह की इमोजी से”हम सब वुमनिया”का व्हाट्सएप ग्रुप भरने लगा था।
उसके साथ ही निहारिका के दिल में एक टीस सी उठने लगी थी…” पहला प्यार!”
उसके हाथ थरथराने लगे थे और आँखों के कोर झिलमिला गए थे।
कुछ समय से निहारिका एक फेसबुक पेज से जुड़ी हुई थी।
उनलोगों ने अपना एक साहित्यिक व्हाट्सएप ग्रुप बना लिया था।
टीम की एडमिन पुष्पा ने फिर से अपना मैसेज व्हाट्सएप छोड़ा
“इस ग्रुप में हम 15 लोग हैं।15 कविताएं आ जानी चाहिए। किसी की भी छूटनी नहीं चाहिए। अगर हम सब का कोई पास्ट है …पहला प्यार… तो यहां पर शेयर जरूर करें और नहीं है तो आप कल्पनिकता का भी सहारा ले सकती है।”
निहारिका का दिल धड़क उठा। मोबाइल किनारे रखने के बाद वह अतीत में खोने लगी।
ऐसा लगा जैसे यह तो कल की बातें ही थी।
अपनी कंप्यूटर की पढ़ाई के बाद जब वह इंटर्नशिप के लिए एक अखबार के ऑफिस में गई थी।
वहां इंटरव्यू लेने वाले कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को सामने देखकर निहारिका का दिल एक बारगी से धड़क चुका था।
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“ हेलो सर….!!! गु…ड …मॉर्निंग….!!!” वह लड़खड़ाते हुए बोली।
उसकी लड़खड़ाती आवाज सुनकर वह शख्स मुस्कुरा दिया।
“लगता नहीं है कि तुम एक कंप्यूटर आर्टिस्ट हो।इस तरह से क्यों घबरा रही हो?”
“स…र….वो…!,निहारिका अब भी थरथरा रही थी।
‘अभिनव शर्मा!’यही था वह व्यक्ति जो निहारिका का इंटरव्यू ले रहा था।
“रिलैक्स मिस निहारिका, अभिनव ने कहा।
मैं भी अभी हाल में इस अखबार को ज्वाइन किया है।इस तरह से डर कर आप करोगे क्या?बी ब्रेव एंड स्मार्ट!”
अभिनव ने निहारिका को मोरली सपोर्ट करता।उसके साथ साथ रहता।
धीरे धीरे उसने उसे सारे कामों में पारंगत कर दिया।
अभिनव की ही ट्रेनिंग थी कि निहारिका को इंटर्नशिप के बाद उसी अखबार में नौकरी भी मिल गई।
अभिनव की उम्र ज्यादा नहीं थी।उसने अपने बूते पर यह पद बहुत ही जल्दी हासिल कर लिया था।
वह अखबार का कॉपी एडिटर था।
अभिनव के केबिन में घुसते निकलते, उसके साथ कंप्यूटर पर काम करते हुए न जाने कब निहारिका उसे अपना दिल दे बैठी।
वह अभिनव की आँखों में अपनी आँखें डालती और अपनी जगह ढूढ़ा करती थी।
उसे यह लगता कि अभिनव जो मदद कर रहा है हो सकता है कि वह भी उससे प्यार करता हो…!
निहारिका को वहां काम करते हुए कई महीने बीत गए थे।अभिनव ने अपनी तरफ से उसे न तो प्रपोज किया और न ही काम के अलावा अन्य कोई और बात।
निहारिका उस दिन का इंतजार कर रही थी कि अभिनव एक दिन उसे अपने दिल का हाल जरूर बताएगा और वह भी उसके धड़कते हुए दिल में अपना नाम ढूढ़ेगी।
वैलेंटाइन डे आनेवाला था।
उस दिन अभिनव ने आते ही निहारिका को अपने केबिन में बुलाया।
“निहारिका प्लीज कम इन माय केबिन।”
“यस सर!”निहारिका फुल कर कुप्पा हो गई।उसे लगा अभिनव उसे वैलेंटाइन डे विश करने के लिए बुला रहा है।
“मे आई कम इन….!”उसकी बात पूरी होने से पहले ही अभिनव ने उसे अंदर बुलाते हुए कहा
“यस यस निहारिका…प्लीज कम इन.. आओ… ये लो…इसे पकड़ो और हाँ…स्पेशली तुम्हें बुला रहा हूँ।
अभिनव ने अपनी शादी का कार्ड उसे पकड़ाते हुए कहा,
….बस आना ही है मेरी शादी में….।इसलिए कार्ड तुम्हें दे रहा हूँ कि तुम अपने परिवार वालों को भी बुला लो।”अभिनव बोलते हुए हँसता जा रहा था।
अपने कांपते हुए हाथों से निहारिका ने वह कार्ड खोला
“अभिनव संग काजल”उसका मुंह चिढ़ा रही थी।
“स…र यह आपकी शादी का कार्ड है…!!”निहारिका के हाथों से कार्ड नीचे गिर गया।
अपनी आँखों में आए आँसुओं को निहारिका ने बहुत ही मुश्किल से अपने दुपट्टे के कोर से पोछा और कार्ड उठाकर बोली
“हाँ श्योर सर…मैं आज ही अपने पैरेंट्स को बता दूंगी।”
“बस तुम्हें आना ही है… !,कितना पापड़ बेला हूं मैं अपने पैरेंट्स को मनाने में, यह तुम्हें बता नहीं सकता…ये जातपांत.. बहुत ही हेक्टिक है यार आज के जमाने में….।
जितनी मेहनत मैंने अपने कैरियर बनाने में नहीं किया था उतना मम्मी पापा को मनाने में करना पड़ा…।
काजल को एक्सेप्ट करने में उनलोगों को पूरे पाँच साल लग गए…!!
…हा..हा..हा…निहारिका….,तुम्हें नहीं पता ना पहले प्यार को पा लेने का अहसास क्या होता है…!,
ओह…!,अभिनव बोलते हुए वर्तमान में आया।
“आय एम सॉरी निहारिका, मैं तो भूल गया था कि मैं ऑफिस में हूँ…वैसे तुम मुझे बिल्कुल अपनी सी लगती हो.. एक प्यारी सी गुड़िया जैसी…!मैंने काजल से भी तुम्हारे बारे में बताया है…।वह तुमसे मिलकर बहुत खुश होगी।”
“यस सर मुझे भी…!”निहारिका जबर्दस्ती मुस्कुराने की कोशिश की।
“तुम्हें नहीं पता ना पहले प्यार को पा लेने का अहसास क्या होता है…!”अभिनव की कही हुई ये बात पिघले हुए शीशे की तरह उसके कानों में उतर रही थी।
एक थके और हारे हुए जुआरी की तरह वह अभिनव के केबिन से बाहर निकल आई।
उसका दिल आज फूटफूट कर रो रहा था।वह अपनी बात किसे बताए आखिर…किसके कंधे पर सिर रखकर रोए…!!
आज पूरा ऑफिस जैसे घूम रहा था।उसे लग रहा था कि सबलोग उसका मजाक बना रहे हैं।
उसदिन वह जल्दी ही छुट्टी लेकर पीजी लौट आई।
बहुत ही टूटे हुए मन के साथ उसने अभिनव की शादी को अटेंड किया था लेकिन उसके तुरंत बाद उसने ऑफिस से रिजाइन देकर अपने घर लौट आई।
परिवार में सबने उसके इस फैसले को गलत ठहराया…लेकिन निहारिका का मन चीख रहा था…वह यह कहना चाहती थी कि उसका पहला प्यार अधूरा रह गया है… उसका दिल टूट गया है….!
मगर वह कुछ बोल नहीं पाई।
कुछ दिनों बाद बुझे मन से उसने अपने पैरेंट्स की मरजी से शादी किया और अपने जीवन की एक नई शुरुआत भी की।
समय बहुत ही बलवान होता है।सबकुछ बिसरा देता है लेकिन निहारिका अपने प्यार को नहीं भूल पाई।
आज पुष्पा जी का विषय शीर्षक देखकर उसका अंतर्मन फिर से जख्मी हो गया।
तभी फोन के रिंगटोन से निहारिका वापस चेतना जगत में वापस आई।
फोन ग्रुप एडमिन पुष्पा जी का ही था।
“हैलो निहारिका जी!”
“जी पुष्पा जी!”
“मैम सबके कमेंट्स आए मगर आपके नहीं आए…खैर कोई बात नहीं…,वह हँसी।
आप हमारे ग्रुप से अपनी इतनी व्यस्तता के बावजूद जुड़ी हुई हैं यही हमारे लिए बहुत बड़ी बात है।
मैम आपकी रचना का इंतजार रहेगा…!”
“जी जरूर…!”
“मैम जरूरी नहीं कि सच्ची बात ही लिखी जाए आप काल्पनिक रचना भी भेज सकती हैं।”
“जी…!”निहारिका संकुचित हो उठी। जब भी अभिनव का नाम आता वह एक कटी पतंग सी बन जाती है।
कहाँ वह इतनी स्ट्रॉंग, एक अच्छी पत्रिका के ग्राफिक विभाग को संभाल रही है और…!इतनी कमजोर…!!!
“सबकुछ मुकम्मल नहीं इस दुनिया में…!,टीस और आँसुओं की अपनी जगह है…!”निहारिका ने ठंडा पानी पिया और फिर लिखने बैठ गई।
“नहीं बन सकी मैं तुम्हारी साँस
क्योंकि…
मैं तुम्हारा ख्वाब न थी…!
मिट गया नाम तुम्हारा…
क्योंकि…
वह रेत था जिनमें मैंने लिखा था…!
तुम तक पहुंच न पाए पैगाम मेरे
क्योंकि….
उनमें स्याही नहीं मेरे आँसू थे….!
तुम्हें दिखा नहीं जज्बात मेरे…
क्योंकि…!!”
निहारिका की उंगलियां थम गईं।वह खुद से बुदबुदाई…
“क्योंकि मैं कमजोर थी अभिनव…!मेरे दिल की धड़कनें, और मेरे साँसें सब मिलकर आज भी कहते हैं…
लव यू…हमेशा…!!”
