neur by munshi premchand
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आकाश में चाँदी के पहाड़ भाग रहे थे, टकरा रहे थे, गले मिल रहे थे, जैसे सूर्य- मेघ संग्राम छिड़ा हुआ हो। कभी छाया हो जाती थी, कभी तेज धूप चमक उठती थी। बरसात के दिन थे, उमस हो रही थी। हवा बंद हो गई थी।

गाँव के बाहर कई मजदूर एक खेत की मेंड़ बाँध रहे थे। नंगे बदन, पसीने में तर, कछनी कसे हुए, सब-के-सब फावड़े से मिट्टी खोदकर मेंड़ पर रखते जाते थे। पानी में मिट्टी नरम हो गई थी।

गोबर ने अपनी कानी आँख मटका कर कहा- ‘अब तो हाथ नहीं चलता भाई! गोला भी छूट गया होगा, चबेना कर लें।’

नेउर ने हँसकर कहा- ‘यह मेंड़ तो पूरी कर लो, फिर चबेना कर लेना। मैं तो तुमसे पहले आया।’

दोनों ने सिर पर झौवा उठाते हुए कहा- ‘तुमने अपनी जवानी में जितना घी खाया होगा नेउर दादा, उतना तो अब हमें पानी भी नहीं मिलता।’

नेउर छोटे डीलडौल का, गठीला, काला, फुर्तीला आदमी था। उम्र पचास से ऊपर थी, मगर अच्छे-अच्छे नौजवान उसके बराबर मेहनत न कर सकते थे। अभी दो-तीन साल पहले तक कुश्ती लड़ता था। जब से गाय मर गई, कुश्ती लड़ना छोड़ दिया था।

गोबर- ‘तुमसे तंबाकू पिये बिना कैसे रहा जाता है नेउर दादा? यहाँ तो चाहे रोटी न मिले; लेकिन तंबाकू के बिना नहीं रहा जाता।’

नेउर अपने काम में मग्न था। नवयुवकों की बातों में उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी। दीना ने उसे बातों में लगाने की कोशिश करते हुए कहा- ‘तो यहाँ से जाकर रोटी बनाओगे दादा? बुधिया कुछ नहीं करती? हमसे तो दादा ऐसी मेहरिया से एक दिन न पटे।’

नेउर के पिचके, खिचड़ी मूंछों से ढके मुख पर हास्य की स्मित रेखा चमक उठी, जिसने उसकी कुरूपता को भी सुंदर बना दिया। बोला- ‘जवानी तो उसी के साथ कटी है बेटा, अब उससे कोई काम नहीं होता, तो क्या करूँ।’

गोबर- ‘तुमने उसे सिर चढ़ा रखा है, नहीं तो काम क्यों न करती! मजे से खाट पर बैठी चिलम पीती रहती है और सारे गाँव से लड़ा करती है। तुम बूढ़े हो गए लेकिन वह तो अब भी जवान बनी है।’

दीना- ‘जवान औरत उसकी क्या बराबरी करेगी। सिंदूर, टीका, काजल मेंहदी में तो उसका मन बसता है। बिना किनारदार रंगीन धोती के उसे कभी देखा ही नहीं, उस पर गहनों से भी जी नहीं भरता। तुम गऊ हो, इससे निबाह हो जाता है, नहीं तो अब तक गली-गली ठोकरें खाती होती।’

गोबर- ‘मुझे तो उसके बनाव-शृंगार पर गुस्सा आता है। काम कुछ न करेगी पर खाने-पहनने को अच्छा ही चाहिए।’

नेउर- ‘तुम क्या जानो बेटा, जब वह आई थी, तो मेरे घर में सात हल की खेती होती थी। रानी बनी बैठी रहती थी। जमाना बदल गया, तो क्या हुआ, उसका मन तो वही है।’ घड़ी-भर चूल्हे के सामने बैठ जाती है, तो आंखें लाल हो जाती हैं और सिर थाम कर पड़ जाती है। मुझसे तो यह नहीं देखा जाता। इसी दिन के लिए तो आदमी शादी-ब्याह करता है, और नहीं तो इस गृहस्थी के जंजाल में क्या रखा है। यहाँ से जाकर रोटी बनाऊंगा, पानी लाऊंगा, तब दो कौर खाएगी, वहीं तो मुझे क्या था, तुम्हारी तरह चार फंकी मारकर एक लोटा पानी पी लेता। जब से बिटिया मरी तब से तो वह और भी सुस्त हो गई। यह बड़ा भारी धक्का लगा। माँ की ममता हम-तुम क्या समझेंगे बेटा! पहले तो कभी-कभी डाँट भी देता था। अब किस मुँह से डाटूं?

दीना- ‘तुम कल पेड़ पर काहे को चढ़े थे, अभी गुलर कौन पकी है?’

नेउर- ‘उस बकरी के लिए थोड़ी पत्ती तोड़ रहा था। बिटिया को दूध पिलाने को बकरी ली थी। अब बुढ़िया हो गई है लेकिन थोड़ा दूध दे देती है। उसी का दूध और रोटी तो बुधिया का आधार है।’

घर पहुँचकर नेउर ने लोटा और डोर उठाया और नहाने चला, कि स्त्री ने खाट पर लेटे-लेटे कहा- ‘इतनी देर क्यों कर दिया करते हो? आदमी काम के पीछे प्राण थोड़े ही देता है? जब मजदूरी सबके बराबर मिलती है, तो क्यों काम के पीछे मरते हो?’

नेउर का अन्त-करण एक माधुर्य से सराबोर हो गया। उसके आत्मसमर्पण से भरे हुए प्रेम में ‘मैं’ की गंध भी तो नहीं थी। कितना स्नेह है! और किसे उसके आराम की, उसने मरने-जीने की चिन्ता है? फिर यह क्यों न अपनी बुधिया के लिए मरे? बोला- ‘तू उस जन्म में कोई देवी रही होगी बुधिया, सच।’

‘अच्छा रहने दो यह चापलूसी। हमारे आगे अब कौन बैठा हुआ है, जिसके लिए इतना हाय-हाय करते हो?’

नेउर गज-भर की छाती किए स्नान करने चला गया। लौटकर उसने मोटी- मोटी रोटियाँ बनाईं। आलू चूल्हे में डाल दिए थे। उनका भुरता बनाया फिर बुधिया और वह दोनों साथ बैठे।

बुधिया- ‘मेरी जात से तुम्हें कोई सुख न मिला। पड़े-पड़े खाती हूँ और तुम्हें तंग करती हूँ। इससे तो कही अच्छा था कि भगवान मुझे उठा लेते।’

‘भगवान आएँगे तो मैं कहूँगा, पहले मुझे ले चलो। तब इस सूनी झोंपड़ी में कौन रहेगा?’

‘तुम न रहोगे, तो मेरी क्या दशा होगी? यह सोचकर मेरी आँखों में अँधेरा आ जाता है। मैंने कोई बड़ा पुण्य किया था कि तुम्हें पाया। किसी और के साथ मेरा भला क्या निबाह होता?’

ऐसे मीठे संतोष के लिए नेउर क्या नहीं कर डालना चाहता था। आलसिन, लोभिन, स्वार्विन बुधिया अपनी जीभ पर केवल मिठास रखकर नेउर को नचाती रहती थी, जैसे कोई शिकारी कँटिए में चारा लगाकर मछली को खिलाता है।

पहले कौन मरे, इस विषय पर आज यह पहली ही बार बातचीत न हुई थी। इसके पहले भी कितनी ही बार यह प्रश्न उठा था और यों ही छोड़ दिया गया था लेकिन न जाने क्यों नेउर ने अपनी डिग्री कर ली थी और उसे निश्चय था कि पहले मैं जाऊंगा उसके पीछे भी बुधिया जब तक रहे, आराम से रहे, किसी के सामने हाथ न फैलाए, इसीलिए वह काम करता रहता था, जिससे हाथ में चार पैसे जमा हो जाएं। कठिन-से-कठिन काम, जिसे कोई न कर सके, नेउर करता। दिन-भर फावड़े-कुचाल का काम करने के बाद रात को ऊख के दिनों में किसी की ऊख पेरता, या खेती की रखवाली करता लेकिन दिन निकलते जाते थे और जो कुछ कमाता था, वह भी निकलता जाता था। बुधिया के बगैर यह जीवन नहीं, इसकी कल्पना ही न कर सकता था।

लेकिन आज की बातों ने नेउर को सशंक कर दिया। जल में एक बूँद रंग की भांति यह शंका उनके मन में समाकर अतिरंजित होने लगी।