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गप्पा गोसाइन-21 श्रेष्ठ लोक कथाएं मध्यप्रदेश: Lok Kathayen
Gappa Gosine

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Lok Kathayen: बहुत पुरानी बात है। मध्य प्रदेश में अमरकंटक पर्वत है जहाँ से नर्मदा, सोन तथा जुहिला तीन नदियाँ तीन अलग-अलग दिशाओं में बहती हैं। इसी पर्वत के समीप पेंड्रारोड के जंगल में एक गोंड़ रहता था। उसकी एक किशोरी बेटी थी जिसका नाम मिटकोबाई था। जवान होती बेटी को देख उसका घर बसाने की चिंता करते हुए उसने मिटको के लिए एक मनपसंद स्वस्थ युवक की तलाश की और उसे लमसेना (मंगेतर) बनाकर अपने घर ले आया। उस युवक का नाम झिटकू था। मिटको और झिटकू एक-दूसरे के मन भा गए। धीरे-धीरे दोनों में प्यार हो गया।

मिटको के पिता का एक लंबा मुंडा (तालाब) था जिससे वह अपने खेतों की सिंचाई करता और मछली आदि पकड़ता। लगातार कई सालों तक अकाल होने के कारण उस तालाब का पानी सूख गया था। इस कारण खेतों में सिंचाई न होने से फसल कमजोर हुई। मछली आदि मिलना भी बंद हो गया। फिर भी मिटको, उसका पिता और झिटकू तालाब की देखरेख करते, तालाब को गहरा करते और उस मिट्टी से मेंड़ की मरम्मत करते ताकि बरसात होने पर उसमें पानी भर सके। मुसीबत का समय किसी प्रकार कटता जा रहा था।

कहते हैं ‘सब दिन जात न एक समान।’ एक दिन आसमान में बदल छाये और गरजते हुए झमाझम पानी बरसाने लगे। मिटको, पिता और झिटकू तीनों का मन नाचने लगा। उनकी मेहनत सफल हो रही थी। तालाब में पानी भर रहा था लेकिन यह खुशी अधिक दिनों तक न रह सकी। लगातार मूसलाधार वर्षा से तालाब लबालब भर गया लेकिन बारिश रुक ही नहीं रही थी। अब तो तीनों का कलेजा काँपने लगा। जहाँ कुछ दिन पहले भगवान से बारिश होने के लिए प्रार्थना कर रहे थे, वहीं अब बारिश रोक देने के लिए प्रार्थना कर रहे थे।

एक दिन मिटको के पिता ने दिन भर तालाब की देख-रेख की और शाम को घर आया कि कमर सीधी कर अगले दिन के लिए फिर तैयार रह सके। उसने रात में तालाब की रखवाली के लिए झिटकू को भेज दिया और खाना खाकर सो गया। उस रात पानी की धार ने टूटने का नाम नहीं लिया। मेंड कब तक पानी का दबाव सहती, कमजोर होकर टूट गई। तीनों ने जी तोड़ मेहनत कर जो मेंड़ बनाई थी, उसकी मिट्टी टूट-टूट कर पानी में बहने लगी। झिटकू लगातार दौड़-दौड़ कर यहाँ-वहाँ से पत्थर मिट्टी और लकड़ियाँ ला-लाकर डाल रहा था कि किसी प्रकार मेंड़ बची रह सके। उसे दम मारने की फुर्सत न थी कि मिटको या उसके पिता को बुलाकर ला सके। झिटकू की हर मुमकिन कोशिश के बाद भी मेंड़ बची न रह सकी, टूट गयी और पानी हरहराकर बहने लगा। अन्य कोई उपाय न देखकर झिटकू खुद ही मेंड पर लेट गया। लगातार बहती मिट्टी में उसकी देह डूब गई और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। भगवान को उसका यह बलिदान देखकर शायद दया आ गई, बारिश रुक गई।

दूसरे दिन बारिश रुकने और झिटकू के घर न आने से चिंतित मिटको और उसका पिता झिटकू की तलाश करते-करते तालाब की ओर गए। गप्पा (बाँस की टोकरी) लिए मिटको को खेत में एक ओर अपने पति झिटकू का फावड़े का हत्था दिखाई दिया। उसने पिता को आवाज दी। दोनों ने मिट्टी खोद कर फावड़ा निकाला तो समीप ही झिटकू की टाँग दिखी, खुदाई करने पर झिटकू की लाश मिल गई। मिटको का रो-रोकर बुरा हाल था। वह अपने पिता को कोसने लगी कि उसने झिटकू को अकेले क्यों जाने दिया? उसे क्यों न बताया कि वह भी साथ आ जाती। पिता ने बहुत समझाया कि यह अनहोनी हुई, उसे ऐसा होने की आशंका होती तो वह दामाद को आने ही न देता पर मिटको को समझा नहीं सका। मिटको का पिता लोगों को बुलाने गया कि झिटकू की लाश को उठाकर अंतिम संस्कार करा सके। एकांत पाकर मिटको ने झाड़ की डाल से लटककर फाँसी लगा ली।

मिटको आखिरी समय में गप्पा लिए थी इसलिए बस्तर और अन्यत्र घड़वा जाति के आदिवासी ‘गप्पा गोसाइन (माँझिन)’ की यह करुण कथा कहते हैं और झिटकू-मिटको की मूर्ति बनाकर अपने देवता के रूप में पूजते हैं।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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