कई दिन गुजर गये। राजा साहब हरि-भजन और देवोपासना में व्यस्त थे। इधर 5-8 वर्ष में उन्होंने किसी मन्दिर की तरफ झांका भी न था। धर्मचर्चा की बहिष्कार-सा कर रखा था। रियासत में धर्म का खाता ही तोड़ दिया गया था। मगर अब एकाएक देवताओं में राजा साहब की फिर श्रद्धा हो आयी थी। धर्म-खाता फिर खोला गया और जो वृत्तियाँ बन्द कर दी गयी थीं, वे फिर बांधी गयीं। राजा साहब ने फिर चोला बदला। शंखधर के लौटते ही उनका धर्मानुराग फिर जागृत हो गया। सम्पत्ति मिलने ही पर तो रक्षकों की आवश्यकता होती है।
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इन दिनों राजा साहब बहुधा एकान्त में बैठे किसी चिन्ता में निमग्न रहते थे, बाहर कम निकलते थे। भोजन से भी उन्हें कुछ अरुचि हो गयी थी। वह मानसिक अंधकार जो नैराश्य की दशा में उन्हें घेरे हुए था, अब एकाएक आशा के प्रकाश से छिन्न-भिन्न हो गया था। धर्मानुराग के साथ उनका कर्त्तव्य-ज्ञान जाग पड़ा था। जैसे जीवन लीला के अन्तिम काण्ड में हमें भक्ति की चिन्ता सवार होती है, बड़े-बड़े भोगी भी रामायण और भगवान का पाठ करने लगते हैं, उसी भांति राजा साहब को भी अव बहुधा अपनी अपकीर्ति पर पश्चात्ताप होता था।
रात आधी से अधिक बीत चुकी थी। रनिवास में सोता पड़ा हुआ था। अहल्या के बहुत समझाने पर भी मनोरमा अपने पुराने भवन में न आयी। वह उसी छोटी कोठरी में पड़ी हुई थी। सहसा राजा साहब ने प्रवेश किया। मनोरमा विस्मित होकर उठ खड़ी हुई।
राजा साहब ने कोठरी को ऊपर-नीचे देखकर करुण-स्वर में कहा-नोरा, मैं आज तुमसे अपना अपराध क्षमा कराने आया हूं। मैंने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया है, इसे क्षमा कर दो।
मनोरमा ने सजल-नेत्र होकर कहा-उन बातों को याद न कीजिए। आपको भी दुःख होता है और मुझे भी दुःख होता है। मेरा ईश्वर ही जानता है कि एक क्षण के लिए भी मेरे हृदय में आपके प्रति दुर्भावना नहीं उत्पन्न हुई।
राजा-जानता हूं नोरा, जानता हूं। तुम्हें इस कोठरी में पड़े देखकर इस समय मेरा हृदय फटा जाता है। हां! अब मुझे मालूम हो रहा है कि दुर्दिन में मन के कोमल भावों का सर्वनाश हो जाता है। और उनकी जगह कठोर एवं पाशविक भाव जागृत हो जाते हैं। सच तो यह है नोरा, कि मेरा जीवन ही निष्फल हो गया। मैं कमी-कभी सोचता हूं। मुझे यह रिसायत न मिली होती, तो मेरा जीवन कहीं अच्छा होता। मनोरमा-मुझे भी अकसर यही विचार हुआ करता है।
राजा-अब, जीवन-लीला समाप्त करते समय अपने जीवन पर निगाह-डालता हूं तो मालूम होता है, मेरा जन्म ही व्यर्थ हुआ। मुझसे किसी का उपकार न हुआ। मैं गृहस्थी के उस सुख से भी वंचित रहा, जो छोटे-छोटे मनुष्यों के लिए भी सुलभ है। शंखधर अपने साथ मेरे हृदय की सारी कोमलताओं को लेता गया था। उसे पाकर आज मैं फिर अपने को पा गया हूं। लेकिन नोरा, हृदय अन्दर-ही-अन्दर कांप रहा है। मैं इस शंका को किसी तरह दिल से बाहर नहीं निकाल सकता कि कोई अनिष्ट होने वाला है।
मनोरमा-अब ईश्वर ने गयी हुई आशाओं को जिलाया है, तो अब कुशल ही होगी।
राजा-क्या करूं नोरा, मुझे इस विचार से शान्ति नहीं होती। मुझे भय होता है कि यह किसी अमंगल का पूर्वाभास है।
यह कहते-कहते राजा साहब मनोरमा के और समीप चले आये और उसके कान के पास मुंह ले जाकर बोले -यह शंका बिलकुल अकारण ही नहीं है, नोरा! रानी देवप्रिया के पति मेरे बड़े भाई होते थे। उनकी सूरत शंखधर से बिलकुल मिलती है। जवानी में मैंने उनको देखा था। हूबहू यही सूरत थी। तिल-बराबर भी फर्क नहीं। भाई साहब का चित्र भी मेरे अलबम में है। तुम यही कहोगी कि यह शंखधर का ही चित्र है। इतनी समानता तो जुड़वां भाइयों में भी नहीं होती। कोई पुराना नौकर नहीं है, नहीं तो मैं इसकी साक्षी दिला देता। पहले शंखधर की सूरत भाई साहब से उतनी ही मिलती थी, जितनी मेरी। अब तो ऐसा जान पड़ता हैं कि स्वयं भाई साहब ही आ गये हैं।
मनोरमा-तो इसमें शंका की क्या बात है? उसी वृक्ष का फल शंखधर भी तो हैं।
राजा-आह! नोरा, तुम यह बात नहीं समझ रही हो। तुम्हें कैसे समझा दूं? इसमें भयंकर रहस्य है, नोरा! मैंने अबकी शंखधर को देखा, तो चौंक पड़ा। सच कहता हूं उसी वक्त मेरे रोये खड़े हो गये।
मनोरमा ने अबकी दृढ़ता से कहा-शंकाए निर्मूल हैं।
राजा ने जांघ पर हाथ पटकर कहा-नोरा, तुम अब भी नहीं समझी। खैर, कल से तुम नये भवन में रहोगी। यह मेरी आज्ञा है।
यह कहते हुए वह उठ खड़े हुए। बिजली के निर्मल प्रकाश में मनोरमा उन्हें खड़ी देखती रही। गर्व से उसका हृदय फूला न समाता था। गर्व इस बात का था कि मेरे स्वामी मेरा इतना आदर करते हैं। प्रेम सहृदयता ही का रसमय रूप है। प्रेम के अभाव में सहृदयता ही दम्पत्ति के सुख का मूल हो जाती है।
राजा साहब को अब किसी तरह शान्ति न मिलती थी। कोई-न-कोई भयंकर विपत्ति आने वाली है, इस शंका को वह दिल से न निकाल सकते थे। दो-चार प्राणियों को जोर-जोर से बातें करते सुनकर वह घबरा जाते थे कि कोई दुर्घटना तो नहीं हो गयी। शंखधर कहीं जाता, तो जब तक यह कुशल से लौट न आये, वह व्याकुल रहते थे। उनका जी चाहता था कि यह मेरी आंखों के सामने से दूर न हो। उसके मुख की ओर देखकर उनकी आंखें आप-ही-आप सजल हो जाती थी। वह रात को उठकर ठाकुरद्वारे में चले जाते और घण्टों ईश्वर की वन्दना किया करते। जो शंका उनके मन में थी, उसे प्रकट करने का उन्हें साहस न होता था। वह उसे स्वयं न व्यक्त करते थे। वह अपने मेरे हुए भाई की स्मृति को मिटा देना चाहते थे; पर वह सूरत आंखों से न टलती थी। कोई ऐसी क्रिया, ऐसी आयोजना, ऐसी विधि न थी, जो इस पर मंडराने वाले संकट का मोचन करने के लिए न की जा रही हो; पर राजा साहब को शान्ति न मिलती थी।
संध्या हो गयी थी। राजा साहब ने मोटर मंगवायी और मुंशी वज्रधर के मकान पर जा पहुंचे। मुंशीजी की संगीत-मण्डली जमा हो गयी थी। संगीत ही उनका दान, व्रत, ध्यान और तप था। उनकी सारी चिन्ताएं और बाधाएं संगीत स्वरों में विलीन हो जाती थीं। मुंशीजी राजा साहब को देखते ही खड़े होकर बोले-आइए, महार! आज ग्वालियर के आचार्य का गाना सुनाऊं। आपने बहुत गाने सुने होंगे, पर इनका गाना कुछ और ही चीज है।
राजा साहब मन में मुंशीजी की बेफिक्री पर झुंझलाये। ऐसे प्राणी भी संसार में हैं, जिन्हें अपने विलास के आगे किसी वस्तु की परवाह नहीं। शंखधर से मेरा और इनका एक-सा सम्बन्ध है; पर यह अपने संगीत में मस्त हैं। और मैं शंकाओं से व्यग्र हो रहा हूं, सच है- सबसे अच्छे मूढ़, जिन्हें न व्यापत जगत गति।’ बोले-इसीलिए तो आया ही हूं पर जरा देर के लिए आपसे कुछ बातें करना चाहता हूं।
दोनों आदमी अलग एक कमरे में जा बैठे। राजा सोचने लगे, किस तरह बात शुरू करूं? मुंशीजी ने उनको असमंजस में देखकर कहा-मेरे लायक जो काम हो, फरमाइए। आप बहुत चिन्तित मालूम होते हैं। बात क्या है?
राजा-मुझे मालूम हो रहा है कि संसार में मन लगाना ही सारे दुःख का मूल है। जगदीशपुर-राज्य को भोगना ही मेरे जीवन का लक्ष्य था। मैंने अपने जीवन में जो कुछ किया, इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए। अपने जीवन पर उसने एक क्षण के लिए विचार नहीं किया। जीवन का सदुपयोग कैसे होगा, इस पर कभी ध्यान नहीं दिया। जब राज्य न था, तब अवश्य कुछ दिनों के लिए सेवा के भाव मन में जागृत हुए थे-वह भी बाबू चक्रधर के सत्संग से। राज्य मिलते ही मेरी कायापलट हो गयी। फिर कभी आत्मचिन्तन की नौबत न आयी। शंखधर को पाकर मैं निहाल हो गया। मेरे जीवन में ज्योति-सी आ गयी। मैं सब कुछ पा गया; पर अबकी जब से शंखधर लौटा है, मुझे उसके विषय में भयंकर शंका हो रही है। आपने मेरे भाई साहब को देखा था?
मुंशी-जी नहीं, उन दिनों तो मैं यहां से बाहर नौकर था।
राजा-भाई साहब की सूरत आज तक मेरी आंखों में फिर रही है। ये देखिये, उनकी तस्वीर है।
राजा साहब ने एक फोटो निकालकर मुंशीजी को दिखायी। मुंशीजी उसे देखते ही बोले-यह तो शंखधर की तस्वीर है।
राजा-नहीं साहब, यह मेरे बड़े भाई का फोटो है। शंखधर ने तो अभी तक तस्वीर ही नहीं खिंचवायी। न जाने तस्वीर खिंचवाने ने उसे क्यों चिढ़ है!
मुंशी-मैं इसे कैसे मान लूं? यह तस्वीर साफ शंखधर की है।
राजा-तो मालूम हो गया कि मेरी आंखें धोखा नहीं खा रही थीं।
मुंशी-तब तो बड़ी विचित्र बात है।
राजा-अब आपसे क्या अर्ज करूं? मुझे बड़ी शंका हो रही है, रात को नींद नहीं आती। दिन को बैठे-बैठे चौंक पड़ता हूं, दो प्राणियों की सूरत कभी इतनी नहीं मिलती। भाई साहब ने ही फिर मेरे घर में जन्म लिया है, इसमें मुझे बिलकुल शंका नहीं रही। ईश्वर ही जाने, क्यों उन्होंने कृपा की है, अगर शंखधर का बाल भी बांका हुआ, तो मेरे प्राण न बचेंगे।
मुंशी-ईश्वर चाहेंगे, तो सब कुशल होगा। घबराने की कोई बात नहीं। कभी-कभी ऐसा होता है।
राजा साहब उठ खड़े हुए और चलते-चलते गम्भीर भाव से बोले-जो बात पूछने आया था, वह तो भूल ही गया। साधु-सन्तों की बहुत सेवा की है। मरने के बाद जीव को किसी बात का दुःख नहीं होता?
मुंशी-सुना तो यही है कि होता है और उससे अधिक होता है जितना जीवन में।
राजा-झूठी बात है, बिलकुल झूठी। विश्वास नहीं आता। उस लोक के दुःख-सुख और ही प्रकार के होंगे। मैं तो समझता हूं किसी बात की याद ही न रहती होगी। मेरे बाद जो कुछ होना है, वह तो होगा ही, आपसे इतना ही कहना है कि अहल्या को ढाढस दीजिएगा। मनोरमा की ओर से मैं निश्चिन्त हूं। वह सभी दशाओं में संभल सकती है। अहल्या उस वज्रघात को न सह सकेगी।
मुंशीजी ने भयभीत होकर राजा साहब का हाथ पकड़ लिया और सजल नेत्र होकर बोले-आप इतने निराश क्यों होते है? ईश्वर पर भरोसा कीजिए। सब कुशल होगी।
राजा-क्या करूं, मेरा हृदय आपका-सा नहीं है। शंखधर का मुंह देखकर मेरा खून ठण्डा हो जाता है। वह मेरा नाती नहीं, शत्रु है। इससे कहीं अच्छा था कि निस्सन्तान रहता। मुंशीजी, आज मुझे ऐसा मालूम हो रहा है कि निर्धन होकर मैं इससे कहीं सुखी रहता।
राजा साहब द्वार की ओर चले। मुंशीजी भी उनके साथ मोटर तक आये। शंका के मारे मुंह से शब्द न निकलता था। दीन भाव से राजा साहब की ओर देख रहे थे, मानो प्राण-दान मांग रहे हों।
राजा साहब ने मोटर पर बैठकर कहा-अब तकलीफ न कीजिए। जो बात कही है, उसका ध्यान रखिएगा।
मुंशीजी मूर्तिवत खड़े रहे। मोटर चली गयी।
अभी राजा विशालसिंह द्वार पर आकर खड़े ही थे कि अहल्या ने विलाप करके कहा-हाय बेटा! तुम मुझे छोड़कर कहाँ चले गये? क्या इसीलिए मुझे आगरा से लाये थे?
राजा साहब ने यह करुण-विलाप सुना और उनके पैरों-तले से जमीन निकल गयी। वह अपनी आंखों से जो कुछ न देखना चाहते थे, वह देखना पड़ा और इतनी जल्द! अभी ही यह मुंशी वज्रधर के पास से लौटे थे। आह! कौन जानता था विधि इतनी जल्द यह सर्वनाश कर देगा! इससे पहले कि यह अपने जीवन का अन्त कर दें, विधि ने उनकी आशाओं का अन्त कर दिया।
राजा साहब ने कमरे में जाकर शंखधर के मुख की ओर देखा। उनके जीवन का आधार निर्जीव पड़ा हुआ था। यही दृश्य आज से पचास वर्ष पहले उन्होंने देखा था।
उनके मुख से विलाप का एक शब्द भी न निकला। आंखों से आंसू की एक बूंद भी न गिरी। खड़े-खड़े भूमि पर गिर पड़े और दम निकल गया।
