मन और विचार से एक बनो - स्वामी विवेकानंद की कहानी
मन और विचार से एक बनो - स्वामी विवेकानंद

स्वामी जी का मानना था कि हमें समाज से पुरुष और नारी का भेद मिटा देना चाहिए। कोई भी छोटा या बड़ा नहीं है। हम सभी उसी ईश्वर की संतान हैं। हमें किसी भी तरह से नारियों को अपने अपने से कम नहीं आंकना चाहिए। स्वामी जी असीम साहस व बल पर अपनी बात कहने से नहीं डिगते थे। भले ही वह समाज के नियमों के विरुद्ध क्यों न जाती हो। उन्होंने ईसा मसीह तथा भगवान बुद्ध की तुलना में बुद्ध को श्रेष्ठ कहा, जिन्होंने स्त्रियों को अपने पंथ में शिष्या बनने की अनुमति दी थी।

वे कहते थे-

“वेदांत तो यही सिखाता है कि हम सबमें एक ही आत्मा वास करती है। चाहे हम नर हों या नारी इसलिए किसी पुरुष को नारी की निंदा नहीं करनी चाहिए।”

उन्होंने एक अन्य प्रसंग में महिलाओं की दशा पर कहा था कि विश्व में नारियों की स्थिति एक सी है।

“हमारे देश में विधवाएं रोती हैं और पश्चिमी देशों में कुआरियां रोती हैं । ” स्वामी जी आंखें मूंद कर धर्म का पालन करने को नहीं कहते थे। उन्होंने ऐसी अनेक क्रांतिकारी बातें कहीं, जो समाज का रूप बदलने में सहायक रहीं। वे चाहते थे कि समाज में सभी को फलने-फूलने के एक समान अवसर मिलें। इस बात के लिए वे ब्राह्मणों को भी फटकारने से बाज़ नहीं आते थे।

मन और विचार से एक बनो - स्वामी विवेकानंद की कहानी
मन और विचार से एक बनो – स्वामी विवेकानंद

उनका कहना था कि ब्राह्मणों ने भारतीय शिक्षा व संस्कृति पर अपना अधिकार जमा लिया था। यही वजह थी कि समाज के बाकी वर्गों के लोग पिछड़े हुए थे। हमारे इसी पिछड़ेपन और दुर्बलता का लाभ विदेशियों ने उठाया और हमारे देश पर राज करने लगे।

प्रत्येक व्यक्ति को इतना सबल होना चाहिए कि वह अपने साथ-साथ अपने देश की भी रक्षा कर सके। यह तभी संभव होगा सभी को एक ही नज़र से देखा जाएगा। एक से अधिकार दिए जाएंगे और सभी को शिक्षा व ज्ञान पाने का हक मिलेगा।

वे कई बार ब्राह्मणों की तुलना सांप से करते हुए कहते थे कि जिस तरह सांप के काटे मनुष्य को बचाने का एक ही उपाय होता है कि वही सांप आ कर उसका जहर चूस ले, जिसने उसे काटा था। उसी तरह ब्राह्मणों को भी अपना जहर वापिस लेना होगा। तभी ये समाज जीवित हो सकेगा।

उन्हें अपनी धर्म सभाओं में घोषण करनी होगी कि भारत में जन्म पाने वाले सभी ब्राह्मण हैं और उन्हें सभी अधिकार प्राप्त हैं तो समाज में एकता का सूत्र बनाया जा सकता है। वे कहते थे कि हम सभी को मन से एक होना होगा।

मन और विचार से एक बनो - स्वामी विवेकानंद की कहानी
मन और विचार से एक बनो – स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद किसी एक जाति के विरोधी या किसी दूसरी जाति का पक्ष लेने वालों में से नहीं थे। वे तो केवल इतना चाहते थे कि सभी लोग परस्पर मिल-जुल कर रहें। वे अपने-आप को विश्व नागरिक मानते थे क्योंकि उनका कहना था कि हम सभी मनुष्य एक ही पिता की संतान हैं। इस तरह हम सभी आपस में संबंध रखते हैं, भले ही हम विश्व के किसी भी कोने में क्यों न रहते हों। राजनीति के विषय में उन्होंने कहा था-

“किसी प्रकार की राजनीति में मुझे विश्वास नहीं है। ईश्वर तथा सत्य ही जगत में एकमात्र सत्य है, बाकी सब कूड़ा-करकट है। “

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