Shivratri
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Shivratri : जो उस दिन उपवास करता है, वह मुझे प्रसन्न कर लेता है। मैं अभिषेक, वस्त्र, धूप, अर्चन, तथा पुष्पादि समर्पण से उतना प्रसन्न नहीं होता जितना कि व्रतोपवास से। ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को आदि देव भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए।

 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है। अत: उसी समय जीवनरूपी चन्द्रमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है। अत: इस चतुर्दशी को शिव पूजा करने से जीव को अभीष्टतम पदार्थ की प्राप्ति होती है। यही शिवरात्रि का रहस्य है।

महाशिवरात्रि का पर्व परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगलसूचक है। उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है। वह हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि विकारों से मुक्त करके परम सुख, शान्ति, ऐश्वर्यादि प्रदान करते हैं। यह भी पढ़ें-क्यों है महामृत्युंजय मंत्र भगवान शिव का सबसे प्रभावशाली मंत्र

Shivratri पर चार प्रहर में चार बार पूजा का विधान है

इसमें शिव जी को पंचामृत से स्नान कराकर चन्दन, पुष्प, अक्षत, वस्त्रादि से श्रृंगार कर आरती करनी चाहिये। रात्रिभर जागरण तथा पंचाक्षर-मन्त्र का जाप करना चाहिये। रुद्राभिषेक, रुद्राष्टाध्यायी तथा रुद्रीपाठ का भी विधान है।

 कथा

पद्म कल्प के प्रारम्भ में जब भगवान ब्रह्मा जब अण्डज, पिण्डज, स्वेदज, उद्भिज एवं देवताओं आदि की सृष्टि कर एक दिन स्वेच्छा से घूमते हुए क्षीरसागर पहुंचे तब उन्होंने देखा भगवान नारायण शुभ्र, श्वेत सहस्त्रफण मौलि शेष की शैय्या पर शान्त अध लेटे हुए हैं। भूदेवी, श्रीदेवी, श्रीमहालक्ष्मी जी शेषशायी के चरणों की चरण सेवा कर रही हैं। गरुड़, नन्द, सुनन्द, पार्षद, गन्धर्व, किन्नर आदि विनम्रता से हाथ जोड़े खड़े हैं। यह देख ब्रह्मा जी को आश्चर्य हुआ। ब्रह्मा जी को गर्व हो गया था कि मैं एकमात्र सृष्टि का मूल कारण हूं और मैं ही सबका स्वामी, नियन्ता तथा पितामह हूं। फिर यह कौन वैभवमण्डित निश्चिन्त सोया हुआ है।

 Shivratri
Lord Shiva

श्री नारायण को अविचल शयन करते हुए देखकर उन्हें क्रोध आ गया। ब्रह्मा जी ने समीप जाकर कहा- तुम कौन हो? उठो! देखो, मैं तुम्हारा स्वामी, पिता आया हूं। शेषशायी ने केवल दृष्टि उठायी और मन्द-मन्द मुस्कान से बोले-वत्स! तुम्हारा मंगल हो। आओ इस आसन पर बैठो। ब्रह्मा जी को अधिक क्रोध हो आया, झल्लाकर बोले- मैं तुम्हारा रक्षक, जगत का पितामह हूं। तुमको मेरा सम्मान करना चाहिये। इस पर भगवान नारायण ने कहा- जगत मुझमें स्थित है, फिर तुम उसे अपना क्यों कहते हो? तुम मेरे नाभि कमल से पैदा हुए हो, अत: मेरे पुत्र हो। मैं सृष्टा, मैं स्वामी यह विवाद दोनों में होने लगा।

श्री ब्रह्मा जी ने पाशुपत एवं श्री विष्णु जी ने माहेश्वर अस्त्र उठा लिया। दिशाएं अस्त्रों के तेज से जलने लगीं, सृष्टि में प्रलय की आशंका हो गयी थी। देवगण भागते हुए कैलाश पर्वत पर भगवान विश्वनाथ के पास पहुंचे। अन्तर्यामी भगवान शिव जी सब समझ गये। देवताओं द्वारा स्तुति करने पर वह बोले- मैं ब्रह्मा-विष्णु के युद्ध को जानता हूं। मैं उसे शान्त करूंगा। ऐसा कहकर भगवान शंकर सहसा दोनों के मध्य में अनादि अनन्त-ज्योतिर्मय स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए। माहेश्वर, पाशुपत दोनों अस्त्र शान्त होकर उसी ज्योतिर्लिंग में लीन हो गये। यह लिंग निष्कल ब्रह्मा, निराकार ब्रह्मï का प्रतीक है। श्री विष्णु एवं ब्रह्मा जी ने उस लिंग (स्तम्भ) की पूजा-अर्चना की। यह लिंग फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को प्रकट हुआ, तभी से आज तक लिंगपूजा निरंतर चली आ रही है। श्री विष्णु एवं श्री ब्रह्मा जी ने कहा- महाराज! जब हम दोनों लिंग के आदि-अन्त का पता न लगा सके तो आगे मानव आपकी पूजा कैसे करेगा? इस पर कृपालु भगवान शिव द्वादश ज्योतिर्लिंग में विभक्त हो गये। महाशिवरात्रि का यही रहस्य है।

 Shivratri
Shiv and Parvati

दूसरी कथा-

ईशान संहिता के अनुसार वाराणसी के वन में एक भील रहता था। उसका नाम गुरुद्रु था। उसका कुटुम्ब बड़ा था। अत: प्रतिदिन वन में जाकर मृगों को मारता और वहीं रहकर नाना प्रकार की चोरियां करता था। शुभकारक महाशिवरात्रि के दिन उस भील के माता-पिता, पत्नी एवं बच्चों ने भूख से पीडि़त होकर भोजन की याचना की। वह तुरंत धनुष लेकर मृगों के शिकार के लिये सारे वन में घूमने लगा। दैवयोग से उस दिन कुछ भी शिकार नहीं मिला और सूर्यास्त हो गया। वह सोचने लगा- अब मैं क्या करूं? कहां जाऊं? माता-पिता, पत्नी, बच्चों की क्या दशा होगी? कुछ लेकर ही घर जाना चाहिये, यह सोचकर वह व्याध एक जलाशय के समीप पहुंचा कि रात्रि में कोई न कोई जीव यहां पानी पीने अवश्य आयेगा- उसी को मारकर घर ले जाऊंगा। यह व्याध किनारे पर स्थित बिल्ववृक्ष पर चढ़ गया। पीने के लिये कमर में बंधी तूम्बी में जल भरकर बैठ गया। भूख-प्यास से व्याकुल वह शिकारी शिकार की चिंता में बैठा रहा। रात्रि के प्रथम प्रहर में एक प्यासी हिरनी वहां आयी। उसको देखकर व्याध को अति हर्ष हुआ, तुरंत ही उसका वध करने के लिये उसने अपने धनुष पर एक बाण का संधान किया। ऐसा करते हुए उसके हाथ के धक्के से थोड़ा जल एवं बिल्वपत्र टूटकर नीचे गिर पड़े। उस वृक्ष के नीचे शिवलिंग विराजमान था। वह जल एवं बिल्वपत्र शिवलिंग पर गिर पड़े।

उस जल एवं बिल्वपत्र से प्रथम प्रहर की शिवपूजा सम्पन्न हो गयी। खडख़ड़ाहट से हिरनी ने भय से ऊपर की ओर देखा। व्याध को देखते ही मृत्युभय से व्याकुल हो वह बोली-व्याध! तुम क्या चाहते हो, सच-सच बताओ। व्याध ने कहा- मेरे कुटुम्ब के लोग भूखे हैं, अत: तुमको मारकर उनकी भूख मिटाऊंगा। मृगी बोली- भील! मेरे मांस से तुमको, तुम्हारे कुटुम्ब को सुख होगा, इस अनर्थकारी शरीर के लिये इससे अधिक महान पुण्य का कार्य भला और क्या हो सकता है? परन्तु इस समय मेरे सब बच्चे आश्रम में बाट जोह रहे होंगे। मैं उन्हें अपनी बहन को अथवा स्वामी को सौंपकर लौट आऊंगी। मृगी के शपथ खाने पर व्याध ने उसे जाने दिया। दूसरे प्रहर में उस हिरणी की बहन उसी की राह देखती हुई, उसे ढूंढती हुई जल पीने वहां आयी। व्याध ने उसे देखकर बाण को तरकश से खींचा।

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Lord Shiva

ऐसा करते समय पुन: पहले की भांति जल एवं बिल्वपत्र शिवलिंग पर गिर पड़े। इस प्रकार द्वितीय प्रहर की पूजा सम्पन्न हो गयी। मृगी ने पूछा- व्याध! यह क्या करते हो? व्याध ने पूर्ववत उत्तर दिया-मैं अपने भूखे कुटुम्ब को तृप्त करने के लिये तुझे मारूंगा। मृगी ने कहा- मेरे छोटे-छोटे बच्चे घर में हैं। अत: मैं उन्हें अपने स्वामी को सौंपकर तुम्हारे पास लौट आऊंगी। मैं वचन देती हूं। व्याध ने उसे भी जाने दिया। व्याध का दूसरा प्रहर भी जागते-जागते बीत गया। इतने में ही एक बड़ा हृष्ट-पुष्ट हिरण मृगी को ढूंढता हुआ आया। व्याध के बाण चढ़ाने पर पुन: कुछ जल एवं बिल्वपत्र लिंग पर गिर पड़े।अब तीसरे प्रहर की पूजा सम्पन्न हो गयी।

मृग ने आवाज से चौंककर व्याध की ओर देखा और पूछा- क्या करते हो? व्याध ने कहा- तुम्हारा वध करूंगा, हिरण ने कहा- मेरे बच्चे भूखे हैं। मैं बच्चों को उनकी माता को सौंपकर तथा उनको धैर्य बंधाकर शीघ्र ही लौट आऊंगा। व्याध बोला जो-जो यहां आये वे सब तुम्हारी ही तरह बातें तथा प्रतिज्ञा कर चले गये, परन्तु अभी तक नहीं लौटे। शपथ खाने पर उसे भी छोड़ दिया। मृग-मृगी अपने स्थान पर मिले। तीनों प्रतिज्ञाबद्ध थे, अत: तीनों जाने के लिये हठ करने लगे अत: उन्होंने बच्चों को अपने पड़ोसियों को सौंप दिया और तीनों चल दिये। उन्हें जाते देख बच्चे भी भागकर पीछे-पीछे चले आये। उन सबको एक साथ आया देख व्याध को अति हर्ष हुआ। उसने तरकश से बाण खींचा जिससे पुन: जल एवं बिल्वपत्र शिवलिंग पर गिर पड़े। इस प्रकार चौथे प्रहर की पूजा भी सम्पन्न हो गयी। रात्रिभर शिकार की चिंता में व्याध निर्जल, भोजन रहित जागरण करता रहा। शिव जी का रंचमात्र भी चिंतन नहीं किया। चारों प्रहर की पूजा अनजाने में स्वत: ही हो गयी। यह भी पढ़ें- जानिए शिव के 18 रूप और नामों की कहानी

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Lord Shiva became famous as Vyadheshwar

उस दिन महाशिवरात्रि थी, जिसके प्रभाव से व्याध के सम्पूर्ण पाप तत्काल भस्म हो गये। इतने में ही मृग एवं मृगियों ने कहा व्याध शिरोमणे! शीघ्र कृपाकर हमारे शरीरों को सार्थक करो। व्याध को बड़ा विस्मय हुआ। ये मृग ज्ञानहीन पशु होने पर भी धन्य हैं, परोपकारी हैं और प्रतिज्ञापालक हैं। मैं मनुष्य होकर भी जीवनभर हिंसा, हत्या एवं पाप कर अपने कुटुम्ब का पालन करता रहा। मैंने जीव हत्या कर उदरपूर्ति की, अत: मेरे जीवन को धिक्कार है! धिक्कार है! व्याध ने बाण को रोक लिया और कहा- श्रेष्ठ मृगों! तुम सब जाओ। तुम्हारा जीवन धन्य है। व्याध के ऐसा कहने पर तुरंत भगवान शंकर लिंग से प्रकट हो गये और उसके शरीर को स्पर्श कर प्रेम से कहा- वर मांगो। मैंने सब कुछ पा लिया- यह कहते हुए व्याध उनके चरणों में गिर पड़ा।

श्री शिव जी ने प्रसन्न होकर उसका गुह नाम रख दिया और वरदान दिया कि भगवान राम एक दिन अवश्य ही तुम्हारे घर पधारेंगे एवं तुम्हारे साथ मित्रता करेंगे। तुम मोक्ष प्राप्त करोगे। वही व्याध श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह बना, जिसने भगवान राम का आतिथ्य किया। वे सब मृग भगवान शंकर का दर्शन कर मृगयोनि से मुक्त हो गये तथा शापमुक्त हो विमान से दिव्य धाम को चले गये। तब से अर्बुद पर्वत पर भगवान शिव व्याधेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए। दर्शन-पूजन करने पर वह तत्काल मोक्ष प्रदान करने वाले हैं।

Shivratri
This Mahashivratri fast is known as Vratraj.

यह महाशिवरात्रि व्रत व्रतराज के नाम से विख्यात है। यह शिवरात्रि यमराज के शासन को मिटाने वाली है एवं शिवलोक को देने वाली है। शास्त्रोक्त विधि से जो इसका जागरण सहित उपवास करेंगे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। शिवरात्रि के समान पाप एवं भय को मिटाने वाला दूसरा व्रत नहीं है। इसके करने मात्र से सब पापों का क्षय हो जाता है।