Hindi Kahaniya: घर में आज बहुत गहमागहमी थी,बहुत सारे रिश्तेदार आ चुके थे और बहुत से आ रहे थे। तरह- तरह के पकवानों की महक से सारा घर भरा हुआ था लेकिन मीना का दिल बिलकुल खाली था,वो शून्य में ताकती, चुपचाप अपने कमरे में लेटी हुई थी।कहने को उसकी प्यारी पोती नव्या की आज गोद भराई का फंक्शन था,कितने अरमान सजाए थे उसने,इस दिन को लेकर और करती भी क्यूं ना,नव्या उसकी इकलौती पोती है…वो भी उसे
बहुत प्यार करती थी लेकिन फिर डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए विदेश चली गई थी,अब उसके मम्मी पापा ने उसकी शादी तय कर दी थी यहां इंडिया में,कल ही आई थी बेचारी…व्यस्तता के कारण दादी से नहीं मिल पाई
थी अभी तक।
मीना की आंखें डबडबा रही थीं।सारी जिंदगी उसने इतने बड़े घर को संभाला,उसकी आंखों के सामने अतीत
की परिछाइयां चलचित्र बन घूमने लगी थीं।
वो शादी होकर ससुराल आई थी तो औरतों का हुजूम का हुजूम, उसे देखकर आशीर्वाद दे रहा था,उसकी
सास को कह रहा था,चांद का टुकड़ा ढूंढ लाई हो अपने राजेश के लिए तुम और वो गर्व से भरी जा रही थीं।
शादी के बाद,सब कुछ मीना को सौंप कर वो तीर्थ यात्रा पर चली गई थीं कुछ महीनो को और मीना ने कितनी
खूबसूरती से सारा घर संभाल लिया था।
ससुर,दो ननद,एक देवर,पति और वो खुद सबका ध्यान रखना,उनकी जरूरते पूरी करना उसकी जिंदगी का
उद्देश्य बन गया था और वो इसमें सफल हुई थी।
उसकी सास लौट कर आई तो बहुत खुश थीं और फिर उनके आशीर्वाद से उसकी गोद जल्दी भर गई।उसकी
गोद में नन्हा आरव खेलने लगा था,सारा घर उस नन्हीं जान की देखभाल करता।देखते देखते दिन गुजरते
गए।
सब लोगों की सुबह मीना के इर्द गिर्द शुरू होती,”मां…मेरा लंच..”उसका बेटा आरव कहता,
“मम्मा!मेरी पिंक वाली ड्रेस कहां रखी,स्त्री कर दी थी ना आपने?”उसकी बेटी रिया चिल्लाती,
“नाश्ता मिलेगा आज?”उसके पति दामोदर कहते …
और मीना चकरघिन्नी बनकर नाचती रहती सबकी ख्वाहिश पूरी करते…कभी उसके दिल में नहीं आया एक
बार भी कि वो ही क्यों करे?
उसे लगता,वो कितनी सौभाग्यशाली है जो इस तरह भरे पूरे परिवार में रह रही है,ये ही तो उसका संसार
हैं…इनसे कुछ उम्मीद क्या लगाना,ये तो भगवान का न्याय ही ऐसा है,जैसा करोगे,वैसा पाओगे।
आज तक कहां कुछ उम्मीद की थी मैंने पर सब कुछ मिला न?मैंने तो और लड़कियों की तरह सोलह सोमवार
के व्रत भी नहीं किए पर मुझे भगवान आशुतोष जैसे वर मिले न।
दामोदर उसे बहुत प्यार करते थे,उसकी छोटी बड़ी सब इच्छाओं का ख्याल रखते और मीना खुश रहती कि ये
हैं तो क्या गम है!ये गम की परछाई भी मेरे पास फटकने नहीं देंगे।
दोनो बच्चे बड़े होने लगे थे पर मीना और दामोदर का प्यार अब भी वैसा ही था एक दूसरे के लिए।आज भी
मीना की बर्थडे के दिन,दामोदर बहुत बड़ी पार्टी करते जिसमें दिल खोल कर खर्च करते।
मीना के कपोल रक्तिम हो उठे थे याद करके जब दामोदर के दोस्त ने जिद करके उससे गाना गाने को कहा
था और दामोदर ने गाना शुरू किया था..”ओ मेरी जोहराजबी!तुझे मालूम नहीं,तू अभी तक हैं हंसी और मै
जवान..तुझपे कुर्बान मेरी जान!मेरी जान।”
वाह!वाह की करतल ध्वनि ने पांच मिनट तक उनका स्वागत किया था और मीना के फ्रेंड सर्कल में मीना की
तारीफें हो रही थीं…मोती दान किए हैं मीना ने जो ऐसा प्यार करने वाला पति मिला है।
इतने प्यार और सम्मान पाकर मीना और उत्साह से घर के कामों में लगी रहती,उसका फंडा था ,जिंदगी में
खूब काम करो,दिमाग को व्यस्त रखो फिर कहीं और फालतू बातों में तुम्हारा दिमाग जायेगा ही नहीं।
लेकिन भाग्य को कुछ और मंजूर था।एक दिन दामोदर का एक्सीडेंट हो गया।बहुत चोटे आई थीं उसे,मीना
की सारी हिम्मत,अक्ल जबाव देने लगी थी,वो दिन पर दिन कमजोर हो रहा था और चिड़चिड़ा भी।
बिस्तर पर पड़े पड़े,वो चिड़चिड़ाने लगा था और मीना ने उड़ान के लिए फैलाए अपने पर समेट कर खुद में
ही छुपाने शुरू कर दिए थे,उसके बचे खुचे आत्म विश्वास को दामोदर की अकाल मौत ने कुचल दिया और वो
पत्थर की मूरत बनती चली गई। उसकी बेटी की शादी हो गई थी,सिर्फ वो और उसका बेटा थे घर में,वो पूरा ध्यान रखता अपनी मां मीना का
लेकिन अब वो भी शादी करने वाला था।
मीना,फिर से,पुराने गम भूलकर नई जिंदगी का स्वागत करने बाहें पसार कर खड़ी थी।उसकी बहू रूपम,रूप
सौंदर्य में जितनी धनी थी,दिल की उतनी ही संकीर्ण।
शुरू शुरू में ,अपने पति आरव के कहने पर वो मीना को झेलती रही पर जल्दी ही उसने अपने रंग दिखाने शुरू
कर दिए।
मीना के प्यार और स्नेह को वो अपनी निजी जिंदगी में उसका अतिक्रमण करार देती जिसे आरव ने भी कभी
दिल से कभी बेदिली से स्वीकार कर लिया।
जब भी रूपम,पूरा श्रृंगार कर,अपनी अदाओं से आरव को रिझाती तो वो ,वो सब भी कह देता अपनी मां को
जो सामान्य समय में वो खुद सुन भी न सके।
जैसे एक दिन,आरव की बर्थडे पर मीना ने सारा दिन लगकर उसके लिए गाजर का हलुआ और कचोड़ी
बनाए,जब शाम को वो दोनो घर आए,आरव खिंच रहा था चिरपरिचित खुशबू की तरफ पर रूपम ने उसे रोक
दिया…डार्लिंग!आज खास तुम्हारे लिए
“व्हिस्पर्स चॉइस” का केबिन बुक किया है,चलना है न वहां…जल्दी रेडी हो।
बस दो मिनट ,आता हूं,देखता हूं मां को…वो कहने को हुआ।
और रूपम ने उसके होंठ लॉक कर दिए अपने होंठों से…चलो न!देखो छह बज रहे हैं…उसने अपनी नर्म
कलाइयों का हार आरव को पहनाते कहा।
मां तब तक वहां आ चुकी थी,वो झट उल्टे पांव लौट गई…बहू वैसे ही उस पर अतिक्रमण का आरोप लगाती
है,अब बेटा भी लगा देगा।
थोड़ी देर बाद,आरव ने रूपम की टोन मिलाते कह दिया था…मां!बस विश कर दिया करें,ये इतना ऑयली और
स्पाइसी खाना आजकल कोई नहीं खाता।
ठगी से रह गई थी वो…ये आरव कह रहा है जो कल तक जिद करके उससे ये बनवाता था,कभी उसके हाथ चूम
लेता था,सारे खानदान में ढिंढोरा पीटे रहता…हमारी अम्मा तो हलवाई हैं,शायद नानाजी ने कभी हलवाई का
काम किया होगा जो मां इतना लजीज मीठा बनाती हैं।
धीरे धीरे,मीना घर का एक बेकार सामान ही बनती जा रही थी।खाने के वक्त खाना मिल जाता,उसका अलग
कमरा था,सब सुख सुविधाओं से युक्त..टीवी, ए सी,गद्देदार मुलायम बिस्तर,जरूरत का सब सामान पर वो
बिलकुल अकेली होती चली गईं।लोगों को लगता कि मीना जी के ठाठ हैं,मजे से बुढ़ापा कट रहा है लेकिन
अंदर की बात तो वही जानती थीं।
उन्हें उम्मीद थी कि इन दोनो की औलाद मुझसे जरूर प्यार करेगी और ऐसा हुआ भी।नव्या आई थी कुछ
साल बाद और दादी की लाडली बन गई।
मीना का अकेलापन छंटने लगा था,दुनिया भर की खुशी उन्हें,उस मासूम की तोतली बातों और मुस्कराहट में
मिल जाती।लेकिन वो साथ भी ज्यादा दिनों नहीं चला।
अच्छी पढ़ाई का हवाला देकर,रूपम ने उसे छोटे में पहले हॉस्टल,फिर विदेश भेज दिया,अब लौटी थी वो वहां
से ,सीधे शादी से पहले।
मीना ने कल्पना की कि उसकी नन्हीं नव्या कैसी लग रही होगी और आशीर्वाद दे दिया उसे कि वो हमेशा
खुश रहे अपनी आगामी जिंदगी में।
तभी,उसका दरवाजा खुला…उसे लगा,कोई खाना रखने आया होगा,उसने आंखें मूंदे रखीं।
नव्या की चहकती आवाज सुनकर वो हड़बड़ा के उठ बैठी।
“दादी…आप यहां क्यों हैं,मेरी गोद भराई में नहीं जायेंगी? वो ठिनकते हुए बोली।
उसने ,उसके पीछे आती रूपम को देखा और सहम कर बोली,मेरी तबीयत खराब है बेटा..बस इसलिए।
तभी नव्या की कोई फोन कॉल आई और वो उसे रिसीव करने बाहर चली गई ये कहती हुई,आती हूं अभी
दादी…।
और इधर रूपम उसकी तरफ बढ़ी….नहीं…ऐसे कैसे…लीजिए ये साड़ी पहन लें और तैयार हो जाएं… रूपम ने
उनके हाथ में साड़ी देते हुए कहा।
आश्चर्य से आंखे फैलते मीना बोली,”लेकिन मैं…कैसे जाउंगी वहां?”
उसे समझ नहीं आ रहा था,आज सूरज पश्चिम से तो नहीं निकला कहीं?
अम्मा!तभी आरव कमरे में आता बोला,”आपकी नव्या भूख हड़ताल पर बैठी है सुबह से,दादी नहीं तो फंक्शन
नहीं…
अरे!नादान है वो तो पर तुम लोग तो समझदार हो…छोड़ो! मैं उसे समझाती हूं।” मीना बोली।
नव्या मुस्कराते हुए मीना के कान में बोली,समझना इन्हें है अब दादी,इन दोनो को मैंने साफ कह दिया है, मै
आपकी अकेली संतान हूं,बेटा और बेटी दोनों मैं ही हूं,मेरी दादी ने जीवनभर सबके लिए किया है तो क्या वो
किसी से कुछ उम्मीद नहीं रख सकती,अब ऋण अदायगी का वक्त आ गया है,आप उनकी देखभाल ठीक से
करोगे,उनको प्यार और सम्मान दोगे तभी मुझसे कुछ उम्मीद लगाना,देखा!दोनो लाइन पर आ गए तब से।”
मीना नतमस्तक थी ईश्वर के न्याय पर।
