Varmala Significance: लगभग सभी धर्मों में शादी के दौरान कई तरह की रस्में मनाई जाती हैं। कई रस्में वक्त के साथ थोड़ी मॉर्डन हो चुकी हैं, लेकिन उनके मूल रूप में कोई बदलाव नहीं है। अगर बात की जाए हिंदू धर्म की, तो शादी के दौरान न जानें कितनी ही रस्में निभाई जाती हैं। ऐसे ही एक रस्म है, जिसे जयमाला या वरमाला के नाम से जाना जाता है।
क्या आपने कभी इसके नाम के बारे में या इस रस्म के महत्व के बारे में सोचा है? अगर नहीं सोचा, तो आज हम आपको इस रस्म का मतलब और इसका महत्व बताएंगे। शायद इसके बारे में आपने पहले कभी न सुना हो।
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क्यों कहते हैं वरमाला?
अगर आपके मन में भी ये सवाल है कि इसे वरमाला ही क्यों कहा जाता है और वधुमाला क्यों नहीं, तो आपको बताते हैं इसके पीछे की बड़ी वजह। दरअसल वरमाला पहनाने का कनेक्शन लड़की द्वारा लड़के को स्वीकार कर लेने से है। ये रस्म रामायण काल से ही चली आ रही है। जिस तरह से माता सीता ने भगवान राम को अपने वर के रूप में स्वीकार करते हुए उन्हें वरमाला पहनाई थी।
इसके बाद से ही हिंदू धर्म में इस रस्म की शुरूआत हुई। पहले के समय में लड़कियां अपने वर को चुनने के बाद उन्हें सबसे पहले माला पहनाती थीं, इसलिए इस रस्म का नाम वरमाला पड़ गया। वहीं कई जगहों पर इसे जयमाला के नाम से भी जाना जाता है।
क्यों पहनाई जाती है वरमाला?

आपको बता दें कि वरमाला पहनाने का सीधा मतलब है सामने वाले को स्वीकार करना। पुराने समय में जब लड़का और लड़की दोनों एक-दूसरे को माला पहना देते थे, तो इसे उनकी मनजूरी माना जाता था। इसका अर्थ है कि दूल्हा-दुल्हन ने एक दूसरे को पसंद कर लिया है। प्राचीनकाल में गंधर्व विवाह में भी इस रस्म को निभाया जाता था।
स्वयंवर में भी है वरमाला की रस्म
आपने अक्सर पुराने समय में होने वाले स्वयंवर के बारे में सुना होगा। स्वयंवर में सीधे तौर पर लड़का-लड़की का विवाह नहीं किया जाता है। बल्कि जैसे ही लड़की या लड़का एक दूसरे को पसंद कर लेते थे, तो वो बिना कुछ कहे अपनी स्वीकृति दर्शाने के लिए वरमाला पहनाया करते थे। शिव पुराण में भी शिव और पार्वती के स्वयंवर और वरमाला का जिक्र मिलता है।
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एक मजेदार रस्म

आजकल इस रस्म को लोग बहुत ही फन वे में लेते हैं। इस रस्म के दौरान लड़का-लड़की कोशिश करते हैं कि उनके पार्टनर को वरमाला पहनाने में काफी मेहनत लगे। इसे आसपास खड़े मेहमान भी काफी एंजॉय करते हैं।
