बदला—गृहलक्ष्मी की कहानियां: Badla Grehlakshmi Story
Badla

Badla Grehlakshmi Story: “मिस्टर नरेंद्रनाथ !, आप यहां खड़े होने के लिए लायक भी नहीं है।
आप अभी इस जगह से निकल जाइए!”
चिल्लाते हुए वीरेंद बोलता जा रहा था..। अपमान की आग में झुलस कर नरेंद्र अपना सिर झुकाए खड़े थे।
“पर वीरु…,तुम्हें हुआ क्या है?तुमने धोखे से मेरी सारी प्रॉपर्टी और बिजनेस में साइन करवा लिया…अब हमलोगों को घर से भी…जाने को बोल रहे हो…!”
“शट अप… पूरा बिजनेस तुमने मुझे संभालने दिया था तो वह मेरा है।
अपनी प्रॉपर्टी पर साइन तुमने किया था मैंने नहीं छीना है।अब यह सब मेरा है!..तुम्हें इस घर से निकल जाना चाहिए।”
शैतानी से मुस्कुराते हुए वीरेंद्र ने कहा।
अपने छोटे भाई की करतूत देखकर नरेंद्र जी की आंखें भर आईं।

कुछ गलती उन्होंने की थीअपने भाई पर भरोसा कर अपना सारा बिजनेस उसके हाथ दे दिया था। जिसे वह धीरे-धीरे अपने नाम कर लिया और अपनेही भाई को बिजनेस से बेदखल कर दिया।
अब धीरे धीरे उसकी नजर घर की प्रॉपर्टी पर पड़ने लगी थी।
उसने बड़ी चालाकी से नरेंद्र से उसका साइन लेकर पूरी प्रॉपर्टी और बिजनेस अपने नाम कर लिया।
लाचारी नरेंद्र जी की आंखों से बरस रही थी। थोड़ी देर बाद विरेंद्र नाथ ने अपने गुर्गों से कहा
“एक घंटे का समय दे दो यदि अपनेआप घर से नहीं निकलता है तो इसे सामान समेत फिकवा देना!”
यह बोलकर वह अपनी बड़ी सी गाड़ी में बैठ कर चला गया।
उसे जाते हुए नरेंद्र जी देखते रहे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था।
अपनी भरी हुई आंखों को अपने रुमाल से पोंछा। उनके दोनों बच्चे चिड़िया की तरह मासूम आंखों से उन्हें देख रहे थे।
उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वहां क्या हो रहा था और उनकी पत्नी शोभा तो सीता की प्रतिमूर्ति थी।
नरेंद्र जी फफक फफक कर रो पड़े।
“शोभा, आखिर मैंने तुम्हें दिया क्या? यह एक छत था वह भी छिन गया।अब हम कहां जाएंगे?”
“सब ठीक होगा जी!,भगवान पर भरोसा रखिए।उनकी पत्नी ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा।
आपने अपना भाई नहीं सांप पाला है तो फिर उपाय क्या है? अब चलिए यहां से!” नरेंद्र जी की पत्नी शोभा ने कहा।
” पर जाएंगे कहां रोंआसी आवाज में नरेंद्र जी ने कहा।
“कहीं भी जाएंगे पर अब यहां नहीं रहेंगे!”
उसने गणपति की प्रतिमा अपने हाथों में लिया।
दोनों बच्चों और अपने पति को लेकर घर से बाहर निकल गई।
बड़ी मुश्किल से एक धर्मशाला का बंदोबस्त हुआ। सब लोग वहां जाकर रुक गए।
नरेंद्र जी ने बड़ी मुश्किल से एक मैकेनिक के यहां नौकरी ढूंढ लिया।
एक झुग्गी में वह अपने परिवार के साथ रहने लगे।
वीरेंद्र को नरेंद्र के पिता ने गोद लिया था लेकिन वह आस्तीन का सांप निकल गया।
नरेंद्र के सीधापन का फायदा उठाकर घर के सारे कागजात पर अपना साइन करा लिया और उन्हें घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
जब भी नरेंद्र जी को अपने छोटे भाई की करतूत याद आती, उनकी आंखें भर आती।
वह यह नहीं समझ पाए कि उनका बेटा विवेक उनकी इन आंसुओं के अपमान का बदला लेने के लिए तैयार हो रहा है।
” विवेक तुम कहां खोए हो?”
“कहीं नहीं माँ! बस कुछ पुराने हिसाब थे उन्हें चुकता करना था।”
“मतलब?”शोभा जी ने चौंक कर पूछा।
तेरे चाचा का खून हो गया है। किसी ने उन्हें बेदर्दी से मार डाला और उनके सारे जायदाद भी किसी ने हड़प लिया है।
ऐसा लगता है की आपसी रंजिश के शिकार हो गए। देखो बेटा, वह तुम्हारे चाचा थे इसलिए तुम्हें 13 दिन के नियम तो करने होंगे।”
” मां यह सब ढकोसला होगा! मैं तो हमेशा से यही चाहता था कि चाचा का ऐसा ही अंत हो।”
विवेक ने आंखें चुराते हुए कहा।
“ऐसा नहीं बोलते बेटा!”शोभा जी पुरानी बातें याद कर सिसक उठीं।
इतने बड़े संपत्ति के मालिक होने के बावजूद पति को दिनरात गधे की तरह काम करते हुए देख कर उनका दिल भर उठता।
आखिरी समय में जब वह पैसे के अभाव में तकलीफ से मर रहे थे, वह दृश्य वह आजतक नहीं भूल पाई थीं।
वह उठकर अपने कमरे में आ गई।आज के लोकल अखबार में न्यूज का हेडलाइन था–वीरेंद्र शर्मा की दर्दनाक हत्या…किसी अनजान व्यक्ति ने बुरी तरह से उनकी हत्या कर दी।
एक समय उन्होंने इसी संपत्ति के लिए अपने भाई और उनके परिवार को घर से बेदखल कर दिया था, आज किसी ने खुद उनके साथ धोखाधड़ी कर उनकी हत्या कर दिया।
“आखिर कौन हो सकता है जिसने इतनी बेदर्दी से वीरेंद्र का खून किया होगा…!”
वह बैठी सोच रहीं थीं कि पुलिस सायरन बजाते घर पहुंच गई।
“आपके बेटे पर वीरेंद्र के कत्ल का आरोप है।इन्हें कस्टडी में लिया जाता है।”
“क्या…!!!,शोभा चिल्ला उठीं।..नालायक, इसी दिन के लिए तुम्हें पैदा किया था। आज तुम्हारे पिता होते तो उनके दिल पर क्या गुजरती!”
“माँ,चाचा की तेरहवीं मनाने से अच्छा है कि मैं जेल की सलाखों के पीछे रहूं।
मैं आपके और पापा का अपमान आजतक नहीं भूल पाया कि किस तरह से उन्होंने आपलोगों को घर से निकाल दिया था।
पापा की तकलीफ देह मौत…!विवेक सिसकने लगा।
मैंने ही उस कमीने को मरवाया है।
उसकी सारी जायदाद जिसपर उसे बहुत गुरूर था उसे छीनने में मेरा ही हाथ है।
उसे सड़क पर लाकर मैंने खड़ा कर दिया और फिर उससे कुत्ते की मौत मरवा दिया।”
“अब यह संपत्ति किस काम की बेटा!तुमने गलत किया। ऊपर वाला बैठा था दंड देने को, तुमने कानून अपने हाथ में क्यों लिया?”
विवेक थोड़ा रुक कर अपने हाथ जोड़कर कहा
“मां, मैं बचपन से एक नफरत जीता आ रहा हूँ। हम सभी को धक्के मार कर चाचा ने हमारे ही घर से निकाल दिया था… मैं बचपन से बदला लेने के लिए तैयार था।

इंसान तो मैं रहा नहीं! आपका बेटा कहलाने लायक भी नहीं हूँ। प्लीज मुझे माफ कर देना!
आप लोगों का अपमान मुझसे सहा नहीं गया।”
विवेक पुलिस के साथ आगे बढ़ा रहा था। शोभा के साथ पुलिसकर्मियों की भी आंखें नम हो गई थीं।
एक पुलिस अधिकारी ने शोभा से कहा
” हम पूरी कोशिश करेंगे कि विवेक को इस केस में क्लीन चिट मिल जाए…माताजी!आप निश्चिंत रहें।”
शोभा फूट फूट कर रो पड़ी।