जंगल में एक कौआ और हिरण रहते थे। वे दोनों अच्छे दोस्त थे। हिरण बहुत सेहतमंद था व अपनी सुंदर त्वचा के कारण बहुत अच्छा दिखता था। वह बहुत ही आनंदी था, सारा दिन जंगल में कुलाँचे भरता।
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बीरबल की खिचड़ी : अकबर बीरबल की कहानियाँ
सर्दियों का मौसम था। तालाबों का पानी ठंड से जम रहा था। दरबार में अकबर ने बीरबल से पूछा, बीरबल बताओ, क्या कोई आदमी पैसे के लिए कुछ भी कर सकता है? बीरबल ने कहा, “हाँ महाराज।” बादशाह ने कहा, “साबित करके दिखाओ।” अगले दिन बीरबल दरबार में एक गरीब ब्राह्मण के साथ आया। उसका परिवार भूखों मर रहा था। बीरबल ने कहा, “जहांपनाह! ब्राह्मण अपने परिवार के लिए कुछ भी करने को तैयार है।”
भैया जी, चाय
मेरा मायका पक्ष पूरा व्यापारी वर्ग था, जहां काफी लोगों का आना-जाना लगा रहता था। अत:सभी को चाचा, भैया, दादा आदि संबोधन से बात करना हमारे घर की चलन में था। मेरी इच्छा के अनुसार मेरी शादी व्यापारी घर में न करके एक सर्विस वाले माहौल में की गई।
क्रेडिट – बचपन से पचपन तक – गृहलक्ष्मी कहानियां
अब तो क्रेडिट ही जीवन है। यदि जीवन से क्रेडिट निकल जाये तो सब डेबिट ही डेबिट है। महीने का राशन भी क्रेडिट कार्ड से ही आता है, अत: अब तो रग-रग में क्रेडिट ही है।
मोक्ष – गृहलक्ष्मी कहानियां
पुण्य कमाने की लालसा लिए गोमती चल पड़ी थी अपने बेटे श्रवण के साथ इलाहाबाद। आखिर उसकी वर्षों की अभिलाषा जो पूरी होने वाली थी, लेकिन कुंभ स्नान में ऐसा क्या हुआ जिसकी गोमती ने कभी कल्पना भी नहीं की थी?
हृदय परिवर्तन – गृहलक्ष्मी कहानियां
यूं तो जि़ंदगी हमेशा कोई न कोई सबक उम्र भर ही देती रहती है, लेकिन कई बार इसके सबक जीना सिखाने के लिए, पहले मौत की दहलीज़ तक पहुंचा देते हैं। रमेश और रीता के बिखरते घरौंदे का अंजाम क्या हुआ, ये बताती इस कहानी में कई टूटते घरों को बचाने की ताकत है।
विधवा – गृहलक्ष्मी कहानियां
कुछ लोग इंसानियत की बहुत सुंदर-सुंदर बातें करते हैं। कुछ लोग इंसान होते हैं। क्या फर्क है इन दोनों बातों में, इसी पर गहरी रोशनी डालती है वरिष्ठ साहित्यकार आबिद सुरती की ये कहानी-
सशक्तीकरण – गृहलक्ष्मी कहानियां
सारा देश महिला सशक्तीकरण की राह पर दौड़ा चला जा रहा है और बेचारे पुरुषों की सुध लेने की कोई ज़रूरत ही महसूस नहीं करता। पुरुष सशक्तीकरण की आवश्यकता बताता व्यंग्य
यही सच है – गृहलक्ष्मी कहानियां
सामने आँगन में फैली धूप सिमटकर दीवारों पर चढ़ गई और कंधे पर बस्ता लटकाए नन्हे-नन्हे बच्चों के झुंड-के-झुंड दिखाई दिए, तो एकाएक मुझे समय का आभास हुआ। …घंटा-भर हो गया यहाँ खड़े-खड़े और संजय का अभी तक पता नहीं! झुँझलाती-सी मैं कमरे में आती हूँ। कोने में रखी मेज़ पर किताबें बिखरी पड़ी हैं, कुछ खुली, कुछ बंद।
जिजीविषा – गृहलक्ष्मी लघुकथा
‘क्या देख रही हो, माला?’
‘यह कोई नयी बेल है। अपने आप उग आयी है और देखो कितनी जल्दी-जल्दी बढ़ रही है।’
‘अरे, वह तो जंगली है। उखाड़ फेंको उसे।’
