अगर आप अपने तन, मन, ऊर्जा और भावनाओं को परिपक्वता के एक खास स्तर तक ले जाते हैं, तो ध्यान स्वाभाविक रूप से होने लगेगा। इसी तरह अगर आप अपने भीतर भी एक उचित और जरूरी माहौल पैदा कर लें, अपने सभी पहलुओं को सही परिस्थितियां प्रदान कर दें तो मेडिटेशन आपके भीतर अपने आप होने लगेगा।
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ध्यान का पहला सोपान है चिंतन
जहां ज्ञान चंचलता से मुक्त होगा, वहां वह ध्यान बन जाएगा। सस्पंदनं ज्ञानम्ï- अर्थात्ï चंचलता ज्ञान है। निस्पंदनं ध्यान- अर्थात अचंचलता ध्यान है। जहां स्पंदन है, वह ज्ञान और निस्पंदन है, वह ज्ञान ध्यान है।
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ध्यान यानी शांत हो जाना
ध्यान स्व का बोध है और बिना स्वबोध के ध्यान संभव नहीं है। स्वबोध के अभाव में प्रार्थना का कोई मूल्य नहीं है। इसलिए जहां स्वबोध है, वहां सम्यक चिंतन होगा और इसलिए उचित कर्म होगा।
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विपश्यना साधना की विधि व अभ्यास
अपने बारे में इस क्षण का जो सत्य है, जैसा भी है उसे ठीक वैसा ही, उसके सही स्वभाव में देखना समझना ही विपश्यना है
