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ध्यान

मेडिटेशन शब्द के साथ लोगों के दिमाग में कई तरह की गलत धारणाएं हैं। आमतौर पर मेडिटेशन से लोगों का मतलब ध्यान से होता है। ध्यान कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप कर सकते हैं। जिन लोगों ने भी ध्यान करने की कोशिश की है, उनमें से ज्यादातर अंत में इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि इसे करना या तो बेहद मुश्किल है या फिर असंभव। और इसकी वजह यह है कि आप इसे करने की कोशिश कर रहे हैं। आप मेडिटेशन नहीं कर सकते, लेकिन आप मेडिटेटिव हो सकते हैं।

ध्यान एक खास तरह का गुण है, कोई काम नहीं। अगर आप अपने तन, मन, ऊर्जा और भावनाओं को परिपक्वता के एक खास स्तर तक ले जाते हैं, तो ध्यान स्वाभाविक रूप से होने लगेगा। यह ठीक ऐसे है, जैसे आप किसी जमीन को उपजाऊ बनाए रखें, उसे वक्त पर खाद पानी देते रहें और सही समय पर सही बीज उसमें डाल दें तो निश्चित तौर से इसमें फूल और फल लगेंगे ही, क्योंकि आपने उनके खिलने के लिए एक उचित वातावरण और अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर दीं हैं। ठीक इसी तरह अगर आप अपने भीतर भी एक उचित और जरूरी माहौल पैदा कर लें, अपने सभी पहलुओं को सही परिस्थितियां प्रदान कर दें तो मेडिटेशन आपके भीतर अपने आप होने लगेगा।

शरीर और मन की सीमाओं से परे जाना
जब आप अपने शरीर और मन की सीमाओं से परे जाते हैं, केवल तभी आप अपने अंदर जीवन के पूर्ण आयाम को पाते हैं। जब आप खुद को शरीर के रूप में देखते हैं तो आपकी पूरी जिंदगी बस भरण-पोषण में निकल जाती है। जब आप खुद को मन के रूप में देखते हैं तो आपकी पूरी सोच सामाजिक, धार्मिक और परिवारिक नजरिए से तय होती है। आपकी सोच एक तरह से गुलाम बन जाती है। फिर आप उससे आगे देख ही नहीं सकते। जब आप अपने मन की चंचलता से मुक्त हो जाएंगे, केवल तभी आप शरीर और दिमाग से परे के पहलुओं को जान पाएंगे।

यह शरीर और यह मन आपका नहीं है, इन्हें आपने धीरे-धीरे समय के साथ एकत्र किया है। आपका शरीर उस भोजन का बस एक ढेर भर है, जो आपने खाया है। आपका मन भी बस बाहरी दुनिया के असर और उससे मिले विचारों का ढेर है। आपके मकान और बैंक बैलेंस की तरह ही आपके पास एक शरीर और एक मन है। अच्छा जीवन जीने के लिए इनकी जरूरत पड़ती है, लेकिन कोई भी इंसान इन चीजों से संतुष्ट नहीं होगा। इन चीजों के जरिये लोग अपने जीवन में केवल आराम और सुख जुटा सकते हैं। पश्चिमी समाज में देखें तो जाहिर है कि आज आप जिन चीजों को पाने का सपना देखते हैं, वे ज्यादातर पहले से ही उनके पास हैं। क्या आपको लगता है, वे संतुष्ट हैं, आनंदमय हैं? नहीं, वे आनंद के आसपास भी नहीं हैं।

बस खाना, सोना, बच्चे पैदा करना और मर जाना, इससे पूर्ण संतुष्टि नहीं होती। इन सभी चीजों की जीवन में जरूरत पड़ती है। लेकिन इन चीजों से हमारा जीवन पूर्ण नहीं हो पाता। अगर आपने अपने जीवन में इन सब चीजों को पा लिया है तो भी आपका जीवन पूर्ण नहीं होता। इसकी वजह यह है कि मानव जागरूकता की एक खास सीमा को लांघ चुका है। इंसान हमेशा कुछ और अधिक चाहता है, नहीं तो वह कभी संतुष्ट नहीं होगा। इसे तो असीमित होना है, अनंत होना है। तो ध्यान एक ऐसा जरिया है जो आपको, असीमित और अनंत की ओर ले जाता है।

मन को ध्यान क्यों नहीं सुहाता?
अगर आप शरीर को स्थिर और शांत कर देंगे, तो मन अपने आप शांत और स्थिर हो जाएगा। यही वजह है कि योग में आसनों पर इतना ज्यादा जोर दिया गया है। अगर आप यह सीख लें कि शरीर को शांत और स्थिर कैसे रखा जाता है तो आपका मन अपने आप शांत और स्थिर हो जाएगा।
अगर आप अपने शरीर पर गौर करें तो आप पाएंगे कि जब आप चलते हैं, बैठते हैं या बोलते हैं, तो आपका शरीर ऐसी बहुत सी हरकतें करता है, जो गैर जरूरी हैं। इसी तरह अगर आप अपने जीवन को गौर से देखें तो पाएंगे कि जीवन का आधे से ज्यादा समय ऐसी बातों में बर्बाद हो जाता है, जिनकी आप खुद भी परवाह नहीं करते।

अगर आप शरीर को स्थिर रखेंगे तो मन धीरे-धीरे अपने आप शिथिल पडऩे लगेगा। मन जानता है कि अगर उसने ऐसा होने दिया तो वह दास बन जाएगा। अभी आपका मन आपका बॉस है और आप उसके सेवक। जैसे-जैसे आप ध्यान करते हैं आप बॉस हो जाते हैं और आपका मन आपका सेवक बन जाता है और यही होना भी चाहिए।

किसी ने मुझसे पूछा कि कोई कैसे ध्यान की अवस्था में पहुंच सकता है? आपको ध्यान में जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह आपसे बाहर नहीं है। अगर आप इस स्थूल शरीर को, इस मन को, इन भावों को और इस ऊर्जा को एक खास स्तर की परिपक्वता तक पालें-पोसेंगे, तो ध्यान की अवस्था अपने आप आ जाएगी। योग में हम ध्यान की कोई तकनीक नहीं सिखाते। हम बस शरीर, मन, भावनाओं और ऊर्जा को एक खास तरह से काम करने के लिए तैयार कर रहे हैं, जो एक बहुत आनंददायक अनुभव होता है। योग का पूरा विज्ञान या जिसे आप ध्यान कहते हैं, वह दरअसल आपके बोध को बढ़ाने का एक तरीका है।

आप इस जीवन को जितनी गहराई में अनुभव कर सकते हैं, महसूस कर सकते हैं, आप इसे उतनी ही अच्छी तरह से जी सकते हैं। आप बस ऐसे ही संयोग से जीते रहेंगे। दूसरों की समझ और सलाह, दूसरों के उपदेश और विचारों के सहारे जीते रहेंगे। आप जीवन को कभी उस रूप में नहीं जान पाएंगे जैसा कि वह है। अगर आप जीवन को जानने में, उसे अनुभव करने में सफल नहीं हो पाए तो मानव शरीर का क्या फायदा हुआ? तो ध्यान इस दिशा में एक संभावना है, एक साधन है। अभी आपका मन आपका बॉस है और आप उसके सेवक। जैसे-जैसे आप ध्यान करते हैं, आप बॉस हो जाते हैं और आपका मन आपका सेवक बन जाता है।