मेरे मोबाइल में भी व्हाट्सएप्प है और व्हाट्सएप्प में कई ग्रुप हैं। इनमें से कुछ ग्रुप में मैं अपनी इच्छा से जुड़ा हूं, किसी में जबरन जोड़ लिया गया हूं, किसी में हाथ-पैर जोड़ कर जुड़ा हूं, क्योंकि किसी व्हाट्सएप्प ग्रुप का सदस्य या एडमिन न होना मतलब किसी के पास आधार कार्ड न होने जैसा है।
Tag: स्थानीय लोक कथा
छोटी भाभी आपने मेरा मायका लौटा दिया – गृहलक्ष्मी कहानियां
दीदी स्टेशन पे आ गया हूँ मैं, तुम अपने सीट पे ही रहना मैं आ जाऊंगा… “|
“हाँ ठीक है वीनू.., मैंने कहा और फ़ोन वापस अपने पर्स में रख मैंने नज़रे खिड़की के बाहर टिका दी ” |
मेहमान बन कर आएंगे – गृहलक्ष्मी कहानियां
कलेक्टर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वसुधा ने अपने पति से कहा, “अशोक हम दोनों सेवानिवृत्त हो चुके हैं, क्यों ना अब हम राहुल के साथ रहें। उन्हें सहारा मिल जाएगा और हमारे लिए भी कितना अच्छा होगा, इकट्ठे होकर रहना।”
बहू, जरा भल्ले लाना!
शादी के बाद मैं पहली बार अपने पति के साथ पंजाब गई थी। मेरी छोट ननद का पूरा परिवार वहीं रहता है। मेरे जाने के दो-चार दिन के बाद ही मेरे भांजे का जन्मदिन पड़ा। मैं मेहमानों को खाना परोस रही थी, वहां पर दही-बड़ों को भल्ले कहा जाता है। खाना खाने बैठी तो कुछ […]
सच्चा प्रेम – गृहलक्ष्मी कहानियां
प्रताप की जि़ंदगी से अनुपमा जा चुकी थी और अब उसकी जि़ंदगी में ल्युसी ही सब कुछ थी। और एक दिन अचानक अनुपमा और ल्युसी दोनों ही संसार से विदा हो गए। अपनी पत्नी की मौत की खबर पर वह लाख कोशिशों के बावजूद एक आंसू न बहा सका, लेकिन अपने पालतू जानवर की मौत पर उसके आंसू रोके न रुके।
कुंठित भूख – गृहलक्ष्मी कहानियां
वो सड़क पर लापरवाह उद्देश्यहीन इधर-उधर यूं ही भटक रहा था। काम की तलाश में था मगर काम मिलने की कोई संभावना नहीं थी, दूर-दूर तक न थी, मास्क लगा ये वक्त है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। उसने कुंठित हो अपना मास्क नोंच फेंका, हालांकि बड़े कष्ट सहने के बाद पूर्वजन्म के सद्कर्मों के पुण्य से या कह लो देवयोग से कल ही उसे यह मास्क मिला था।
अपरिग्रह – गृहलक्ष्मी कहानियां
‘बस से उतर कर मैं घर की तरफ चल पड़ा। परसों ही छोटे भाई का फोन आया था कि भैया एक बार घर आ जाओ, पिताजी-माँ आपको बहुत याद करते हैं।’ मैं समझ गया था, ज़रूर पैसों की ज़रूरत होगी।
प्रेम की दीवार – गृहलक्ष्मी कहानियां
नदी के किनारे छोटे-छोटे कंकड़ों को लेकर फिर नदी में फेंकना और उनकी डुबुक-डुबुक लहराती कई जगह कूदती चाल देखना ये भी अपने आप में इंतज़ार का समय बिताने का एक कतिपय साधन है। रोहित आज अपनी प्रेमिका सुधा का इंतज़ार ऐसे ही कर रहा था।
शाबाश – गृहलक्ष्मी कहानियां
तन्वी छोटी सी थी जब उसके पिता नहीं रहे, नानी नानाजी उसे और उसकी माँ को अपने घर ले आये थे। ननिहाल में वैसे बाक़ी सब ठीक था किन्तु माँ ने सबके लाख समझाने पर भी दूसरा विवाह नहीं किया था।
इसलिये जब कभी नानी और माँ में खटकती तो नानी पहले उसके मरहूम पापा को कोसती जो अपनी जिम्मेदारी पूरी किये बिना इस दुनिया से चले गए और फ़िर तन्वी की बारी आती, जिसके मोह में उनकी बेटी जीवन भर वैधव्य की चादर ओढ़ कर बैठी थी। तीसरा वार वो ईश्वर पर करती थी। जिसने उसकी पुत्री और नातिन को आश्चर्यजनक रूप दिया, और इतनी ख़राब किस्मत दी, अब इन दो प्राणियों की चिन्ता में वो स्त्री दिन प्रतिदिन चिड़चिड़ी होती जा रही है।
धूप की तलाश – गृहलक्ष्मी कहानियां
बड़ी देर से धूप की तलाश थी। पता नहीं आज सूरज भगवान कहाँ गायब हो गए हैं। ठंढ से बदन अकड़ा जा रहा है। ऊपर नजर दौड़ाई, आसमान दिख ही नहीं रहा है। यानी नीला आसमान गायब है। उसकी जगह मटमैली, भूरी, फटी सी चादर दिख रही है। झबरी बोली-कई दिनों से ये धुँध बढ़ती ही जा रही है।
