आयुर्वेद में कहा गया- जब व्यक्ति में पित्त का प्रकोप होता है तब क्रोध का प्रकोप बढ़ जाता है। कफ का प्रकोप होता है तो लोभ बढ़ जाता है। अपान वायु दूषित होता है तो भी क्रोध बढ़ जाता है।
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चेतना का रूपांतरण – आचार्य महाप्रज्ञ
जब चेतना बदलती है तो हृदय बदल जाता है। चेतना नहीं बदलती है तो कुछ भी नहीं बदलता। युक्ति को जाने बिना चेतना का रूपांतरण नहीं हो सकता। अचेतन में छलांग नहीं होती, चेतन में छलांग होती है।
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मन एक महासागर है – आचार्य महाप्रज्ञ
मनोविज्ञान में मन और चित्त-दोनों में भेद नहीं किया गया। मन ऊपर का हिस्सा है, जो चित्त का स्पर्श पाकर चेतना जैसा प्रतीत होता है। चित्त हमारी भीतर की सारी चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। अज्ञात मन, अवचेतन मन को चित्त कहा जा सकता है और ज्ञात मन को मन कहा जा सकता है।
