तुम अगर ‘दामिनी’ हो,
तो, मत समझो कि तुम्हारा दमन हुआ है।
तुम्हारी तो शहादत हुई है,
और शहादत कभी व्यर्थ नहीं जाती।
तुम्हारी इस शहादत ने
जगा दिया है, सोए हुए लोगों को।
मजबूर कर दिया है,
अब तक बंद आंखों को खोलने हेतु।
झकझोर कर रख दिया है,
इंसानियत का नकाब ओढ़े
हैवानियत के पुतलों को
जला कर रख दिया है।
आज नहीं तो कल
कल नहीं तो परसों,
ये पुतले जरूर राख हो जाएंगे।
हैवानियत के पुतलों का दमन कर
अमर हो जाएगा
तुम्हारा ‘दामिनी’ नाम।
और अगर तुम ‘वेदना’ हो,
तो मत समझो
कि तुमने वेदना झेली है।
समझो कि कई वेदनाओं को
मुक्त कर दिया है, वेदना से।
वेदना भी यूं ही नहीं होती,
यह तो अन्तर्तम की आवाज
सीधे ईश्वर के कानों तक जाती है
फिर जब उसकी प्रतिक्रिया होगी
तो बिन आवाज की लाठी
हैवानियत और दरिंदगी की
पराकाष्ठा को
पलभर में चकनाचूर कर देगी।
और तब,
चिर अमर और चिर स्मरणीय
बन जाएगी तुम्हारी शहादत।
और तब तुम-
न ‘दामिनी’ कहलाओगी
न ‘वेदना’ कहलाओगी
कहलाओगी तो सिर्फ
‘निर्भया’
