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A lady listening a music

शादी के वक्त अक्सर कहा और सुना जाता है कि लडक़े की नौकरी बाहर है कौन बेटी को सास के साथ रहना है। लोगों का यह नजरिया शायद उनको फौरी तौर पर राहत देता होगा पर क्या वास्तव में ऐसा होता है? यकीनन जवाब होगा नहीं। हो सकता है बहु को ससुराल में न रहने के कारण सास के साथ कम रहना पड़े पर उसका साबका सास के रूतबे से न हो ऐसा होना थोड़ा मुश्किल है। बल्कि सास के साथ न रहने का सबसे बड़ा ड्रॉबैक यह है कि बहु को कंधों पर जिम्मेदारी उन दिनों में कुछ ज्यादा ही आ जाती है जब सास बेटा-बहु के घर पहुंचती है। 

बेटे-बहु के घर पहुंची सास की तुलना उस हेडमास्टर से की जा सकती है जो हर क्लास के औचक निरीक्षण पर निकला हो। सास बहु और उसकी गृहस्थी को अपनी नजरिए से आंकती है। ऐसे में उसमें कमियां निकलना लाजमी है। हर शख्स और परिवार की आवश्यकताएं अलग होती है और उसी के मुताबिक व्यवस्थाएं होती है जबकि सास तुलनात्मक रवैए के साथ वहां पहुंची होती है। कई बार सास बहु की गृहस्थी का अवलोकन शुरू करती है और अपने समय से उसकी तुलना करती है। वह इस बात को भी नजरअंदाज कर जाती है कि समय बदल गया है या बदल रहा है। कई बार सास बहु की पसंद को भी नजरअंदाज कर उसे कटघरे में खड़ा करने से भी नहीं चूकती। जबकि ज्यादातर मामलों बहू सास के यात्रा को पूरे दिल स्वीकार करती है और उसका स्वागत करने की कोशिश करती है। सास बहु के बच्चों की ओर रुख पर भी अक्सर पटाछेप कर बैठती है। ऐसा होना लजमी में है क्यूंकि यहां फर्क असल और मूल के बीच है। यहां पर जजमेंटल होने का एक शायद एक कारण यह भी है कि वह वर्तमान की दुष्विारियों पर गौर नहीं कर पाती। 

उपाय निकालें यूं 

आपको मालूम है कि वह कुछ रोज के लिए आपके पास आई हैं तो कुछ बातों को नजरअंदाज कीजिए। जितने दिन सास आपके साथ रहने वाली हैं उतने दिन सास के स्वभाव के अनरूप अपनी दिनचर्या में परिवर्तन ले आना बेहतर होगा। बच्चों की जिम्मेदारी उन दिनों के लिए सासू मां के कंधों पर डाल दीजिए। आप यह भी कर सकती हैं कि सास को मेहमान बनाए रखने के बजाए उन्हें मेजबान बना दीजिए। मैन्यू, खरीददारी सरीखे तमाम जिम्मेदारी उनके कंधों पर डाल दीजिए ताकि वह दुष्वारियों को समझने की भी कोशिश कर पाएं।

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