महिलाओं के लिए सोशल मीडिया

आज अगर हम बैठकर सोचें तो लगता है कि ये बात न जाने कितने ही ज़माने पुरानी है, जब आते-जाते लोग अपने दोस्तों-परिचितों को देखकर रुककर हाल-चाल पूछते थे, दुआ-सलाम करते थे। उनकी जि़ंदगी में इतनी गुंजाइशें होती थीं कि वे अपनों के लिए पल-भर रुक सकें। पूरा गांव-मोहल्ला ही अपना होता था। फिर भी दोस्त बड़े गिने-चुने ही होते थे और दोस्ती की उम्र भी, जि़ंदगी की उम्र जितनी ही लंबी होती थी। मेहमान ‘अतिथि’ होते थे, यानी कोई भी बिना बताए कभी भी आ सकता था। मेहमान को आने के लिए खास मौके का इंतज़ार नहीं होता था, उनका आ जाना ही खास मौका होता था। अगर कहीं कोई झगड़ पड़े तो लोग अजनबियों में भी सुलह करा देते थे।

फिर समय थोड़ा बदला, लोग भी थोड़े बदले और खुद आने-जाने का सिलसिला कम और चिट्ठियां भेजने का सिलसिला ज़्यादा बढ़ गया। एक चिट्ठियों जाती। फिर हफ्तों और कभी महीनों बाद उसका जवाब आता। लोगों के पास इंतज़ार करने लायक वक्त भी होता था और धैर्य भी। ट्रंककॉल या तार तो हडबड़ी नहीं, हादसों की सूचना समझ लिए जाते थे।

फिर ये सिलसिला थोड़ा और आगे बढ़ा। चिट्ठीयों में ही लोग इस तरह से अपना दिल खोलकर रख देते थे और दस-दस पेज की चिट्ठी के आखर में लिखा होता था- थोड़े लिखे को ज़्यादा समझना। चिट्ठियां अपनों ही नहीं, अजनबियों तक के बीच ‘पेन-फ्रेंड’ के रूप में दोस्ती करा देती थीं। चिट्ठियों से ही लोग एक-दूसरे के व्यक्तित्व की खूबियां, आदतें, पसंद-नापसंद वगैरह जान लेते थे। 

फिर व$क्त थोड़ा और बदला, लंबी चिट्ठियों की जगह अंतर्देशीय ने ले ली और सारी सूचनाएं, अपनी अहमियत के आधार पर संक्षेप में दी जाने लगीं। अंत में अब भी यही लिखा होता था- थोड़े लिखे को ज़्यादा समझना।

फिर धीरे-धीरे लोगों ने अजनबियों के ही नहीं, बल्कि पास-पड़ोस के झगड़े सुलझाना बंद कर दिया। अब ये झगड़े ऐसा झंझट समझी जाने लगीं, जिससे बचने के लिए यही मानना समझदारी समझा जाने लगा कि ‘हमें क्या’ और- दूसरों के लफड़े में टांग कौन अड़ाए। दोस्तों की संख्या थोड़ी और कम हो गई और आना-जाना भी खास मौकों तक ही सीमित हो गया

और अब हम हैं सोशल मीडिया के ज़माने में। सोशल मीडिया, यानी एक ऐसा प्लेटफॉर्म, जहां पूरी दुनिया इंटरनेट के ज़रिये एक छोटे से फोन तक सिमट आई है। कुछ वक्त पहले तक किसी ने शायद ही सोचा हो कि उसके पांच हज़ार दोस्त हो सकते हैं, लेकिन सोशल मीडिया के इस ज़माने में ये बड़ी आसानी से मुमकिन है। दुनिया के किसी एक कोने में बैठकर दूसरे कोने की जाने कितनी ही बातें बड़ी आसानी से जानी जा सकती हैं। जानकारियों का आदान-प्रदान काफी आसान हो गया है। सोशल मीडिया पर सिर्फ़ बातें ही नहीं होती हैं, बल्कि उन बातों का असर लोगों से लेकर न्याय व्यवस्था तक पर भी कितना हो सकता है, ये हमने जेसिका लाल हत्याकांड और निर्भया कांड जैसे मामलों में देखा। सैकड़ों ऐसी $खबरें, जो प्रमुख न्यूज़ चैनल्स से लेकर न्यूज़ पेपर्स तक में दबा दी जाती हैं या जिन्हें न्यूज़ ही नहीं माना जाता, वे तक इसी सोशल मीडिया की बदौलत आम लोगों तक पहुंच पाती हैं। इसी सोशल मीडिया की बदौलत अपनी आवाज़ उन कानों तक भी पहुंचाई जा सकती है, जिन्हें हमने अपनी आवाज़ का ही प्रतिनिधि बनाकर जि़म्मेदार पदों पर बिठाया था, लेकिन वहां बैठने के बाद उन्हें कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती है।

सोशल मीडिया ने लोगों की रचनात्मकता को पहचान भी दी और प्लेटफॉर्म भी। जाने कितने ही लोग पहले अपने एक छोटे से आर्टिकल या कविता को लेकर पब्लिशर या मैगज़ीन के चक्कर काटते रहते थे, लेकिन अब इस सोशल प्लेटफॉर्म के ज़रिये अपनी वॉल पर ही अपनी बात खुलकर कही जा सकती है और वह लोगों तक बड़े पैमाने पर पहुंचती भी है।

सिंगिंग, डांसिंग, म्यूजि़क जैसे न जाने कितने ही शौकों को यहां समझा गया, उन्हें जगह, मौका और पहचान एक साथ मिली। छोटे-छोटे फोन के ज़रिये बने बड़े-बड़े महत्वपूर्ण वीडियोज़ ने ये साबित कर दिया कि रचनात्मकता और प्रतिभा हर कोने में मौजूद है और ये प्लेटफॉर्म उन्हें भी मौका दे सकता है, जिन्हें कभी किसी मौके के लायक ही नहीं समझा गया।

सोशल मीडिया की ये सुनहरी तस्वीर ही इसका पूरा सच नहीं है, क्योंकि अब सोशल मीडिया की कहानी भी भस्मासुर का रूप ले चुकी है। यहां हज़ारों की संख्या में मौजूद फ्रेंड्स भी किसी की ज़िंदगी का सूनापन नहीं मिटा पाते। वह अकेलेपन से जूझता शख्स कब सभी को छोड़ जाता है, इसका पता भी किसी दूसरे की पोस्ट से चलता है।

इतनी सारी जानकारियां यहां मौजूद हैं कि उन पर भरोसा करने से पहले हड़बड़ी के मारे लोग उनके सही-गलत की जड़ तक पहुंचने का भी इंतज़ार नहीं करते और तुरंत शेयरिंग में लग जाते हैं। लोग सोशल मीडिया पर सिर्फ़ आवाज़ ही नहीं उठाते, बल्कि इतना फज़ूल शोर भी मचाने लगे हैं, जिसकी न कोई तुक होती है, न ज़रूरत। कोई किसी भी हद तक जाकर, कुछ भी बोल सकता है। बिना अपने हिस्से की जि़म्मेदारी की परवाह किए। लोग अब किसी मामले में सिर्फ़ आवाज़ ही नहीं उठाते, बल्कि फैसला भी खुद ही सुना देते हैं और सज़ा भी खुद ही देने लगे हैं भीड़ की शक्ल में।

हादसों पर अब भीड़ भी खूब जुटने लगी है, लेकिन मदद करने के लिए नहीं, वीडियो बनाने के लिए और उसे किसी सोशल प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने के लिए। ये कितनी बड़ी ताकत है, इसका अंदाज़ा उन लोगों को भी है, जो खुद समाज के सबसे ताकतवर वर्ग समझे जाते हैं। हाल-फिलहाल में हुए चुनावों पर सोशल मीडिया का असर इसका ताज़ातरीन उदाहरण है कि सोशल मीडिया हवा बना भी सकता है और बिगाड़ भी।

सोशल मीडिया नाम की ये सुविधा अब ऐसी समस्या का रूप ले चुकी है कि लोगों को इससे थोड़ा दूरी बनाने की सलाह डॉक्टर्स भी देने लगे हैं, मनोवैज्ञानिक भी और समाजशास्त्री भी। इस माध्यम से हम दूसरों के तो करीब आ गए, लेकिन अपनों के साथ एक ही घर में रहते हुए भी उनसे बहुत दूर हो गए हैं।

न तो हम नई तकनीकी को बुरा बता रहे हैं और न ही समय के साथ चलने को। हमारा इशारा तो सिर्फ़ इस तरफ है कि सोशल मीडिया के ज़रिये दूरियों को नज़दीक बनाते-बनाते हम अपनों से ही दूर हो गए हैं। सोशल मीडिया की ही वजह से अब लोग ‘सोशल’ भी ज़रा कम ही हो रहे हैं। ये आदत अब तनाव तक की वजह बनने लगी है और डॉक्टर तक कहने लगे कि फोन छोड़, बाहर निकलकर लोगों से मिलो-जुलो।

हमने तो इस विषय पर सिर्फ़ अपनी बात कही है, आपको क्या करना है, ये आप खुद तय कीजिए। बस- थोड़े लिखे को ज़्यादा समझना। 

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