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anubhav

मेरी उम्र 12 वर्ष की थी जब मेरा मासिक चक्र शुरू हुआ . हालाँकि हमारे पारंपरिक भारतीय परिवारों में यूँ तो दादी -नानी या माँ-चाची जैसी औरतें हर बा पर अपना ज्ञान उरी तरह भावी पीढ़ी पर उड़ेल देतीं हैं लेकिन मासिक चक्र एक ऐसी परेशानी है जिस पर कुछ कहने या समझाने में वो ज्ञानवान महिलाएं भी  अपने आप को कुछ खास गर्वान्वित महसूस नहीं करती है . अब ऐसी स्थिति में भला किशोरावस्था में प्रवेश की हुई लड़की को कौन इस प्रक्रिया से वाकिफ कराये, ये सवाल बड़ा ही पेचीदा हो जाता है . उस समय तक तो  परिवार या स्कूल में इस तरह की शिक्षा नाम की भी  कोई चीज़ भी नहीं थी . खैर समाज की इस परेशानी से मुझे क्या, यहाँ तो में आपको कुछ आपबीती बताने की कोशिश कर रही हूँ .  

मेरे घर में , मेरे अलावा मेरी माँ ,मेरे पापा , एक बड़ी बहन और एक छोटा भाई था . बिलकुल सही समझा आपने छोटा परिवार यानि सुखी परिवार . लेकिन इस छोटे से परिवार में एक ज्ञानवान दादी या नानी का अभाव था  जो रोज़ रोज़ अपना ज्ञान बांटती . मम्मी को दिन भर अपने घर के काम  से फुर्सत नहीं होती थी और बड़ी बहन से ज्यादा मैं खुद को समझदार समझती थी . तो ऐसी परिस्थिति में  सिर्फ एक टेलीविज़न ही था जो ज्ञान का भंडार था . मुझे दुनिया की हर चीज़ वही समझ आती थी, जो टी वी में दिखाई जाती थी . फिल्में देखने का मुझे  बहुत शौक था . 90 के दशक में टी वी पर या तो पुरानी  फिल्में आती थी या फिर सास बहु के सीरियल .हाँ  इसके अलावा मेरे जीवन में एक ज्ञान की देवी भी  थी, मेरी हमउम्र  एक,  इकलौती सहेली – तरन्नुम .  यूँ तो जितना ज्ञान मुझे था शायद उतना ही तरन्नुम को रहा होगा लेकिन मुझे ऐसा लगता था कि वो बहुत ही समझदार है क्यूंकि वो क्लास में हमेशा फर्स्ट आती थी. मुझे जब भी कोई परेशानी होती थी तो  तरन्नुम ही मेरी नैया पार लगाती थी .

साल १९९२   की बात है , शायद अगस्त का महिना था . मेरी उम्र यही कोई 12 वर्ष की थी . हर लड़की की तरह मेरे जीवन में भी मासिक चक्र का आगमन हो गया . लेकिन परेशानी की बात ये थी कि मैं इस प्रक्रिया से बिलकुल ही अनजान थी. हालाँकि मासिक चक्र शुरू होने से एक दो  दिन पहले  से हल्का-हल्का कमर में दर्द था लेकिन मैंने सोचा कि भाई के साथ बेडमिन्टन ज्यादा खेल लिया शायद इस वज़ह से होगा . घर में दर्द वाली बात किसी को बतानी ज़रूरी नहीं समझी . सुबह-सुबह तैयार होकर स्कूल पहुँच गयी . लेकिन एक दो पीरियड के  बाद ही पता नहीं कुछ अजीब सा महसूस होने लगा . ऐसा लगा जैसे शरीर के निचले हिस्से से कुछ  रिसाव हो रहा है . पहले  मुझे लगा कि शायद थोडा सा सुसु निकल गया . इस शर्म से कि कोई का कहेगा मैं दौड़कर बाथरूम गयी . लेकिन बाथरूम में जाकर देखा तो मेरे निचले हिस्से से खून निकल रहा था . खून देखकर ही मेरे हाथ-पांव ठन्डे हो गए . ऐसा लगा जैसे सर में चक्कर अ रहा हो .लेकिन फिर कुछ देर में ही खुद को संभाला और वापस क्लास में आ गई . क्लास में आते ही सबसे पहले मैंने अपनी प्रिय सहेली तरन्नुम को बोला कि” तरन्नुम अब हम दोनों ज्यादा दिन एकसाथ नहीं रह पायेंगे… मैं मरने वाली हूँ .”… मेरी बात सुनते ही तरन्नुम के चेहरे पे परेशानी के भाव आ गए . घबराते हुए उसने  मुझसे पूछा कि “हुआ क्या है”? तो मैंने रोते -रोते बताया कि “जैसे फिल्मों में होता है न बीमारी …. ब्लड कैंसर … वैसे मुझे भी ब्लड कैंसर हो गया है. अब जल्दी ही मर जाउंगी”. मेरी बात सुनते ही तरन्नुम भी रोने लगी . हम दोनों एक-दुसरे से लिपट कर रोने लगे .हमारा रोना देखकर क्लास के कुछ बच्चे  हमारी क्लास टीचर कौशिक मैडम को बुलाकर ले आये. जब कौशिक  मैडम ने आकर हमसे पूछा कि “तुम दोनों क्यूँ रो रही हो” ? तो मेरे मुंह  से तो एक शब्द भी नहीं निकला, बेचारी तरन्नुम ने ही हिम्मत करके बताया “मेम रिंकी मरने वाली है उसको ब्लड कैंसर हो गया है” . तरन्नुम की बात सुनते ही पहले तो उनके चेहरे की हवाइयां उड़ गयी . फिर उन्होंने मेरे सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा ” बेटा रिंकी तुम्हें कैसे पता चला की तुम्हें ब्लड कैंसर है ? मैंने रोते -रोते सारी  बात मैडम को बता दी . मेरी बात सुनते ही पहले तो वो जोर से हंसी . लेकिन फिर उन्होंने सिर्फ मुझे ही बल्कि पूरी क्लास को मासिक चक्र के बारे में सब कुछ समझाया और मुझे एक सेनेटरी पैड भी दिया और बताया की इसको किस तरह इतेमाल करते हैं. जब कौशिक मैडम की  बात सुनी तो एक तरफ तो ख़ुशी हुई की चलो मैं मरने से बच गयी लेकिन दूसरी तरफ अपनी नादानी पर बड़ी शर्म भी महसूस हुई .

सच! आज भी अपना ये वाकया याद करती हूँ तो अपनी बेवकूफी पर बहुत हंसी आती है . लेकिन फिर मन ये भी सोचता है कि आज भी हमारे देश में महिलाओं से सम्बंधित समस्याओं को समझना तो दूर  लोग उन  पर  बात तक करने में झिझकते हैं . सिर्फ इतना ही नहीं मासिक चक्र की  इस प्राकृतिक क्रिया को पवित्रता और अपवित्रता से जोड़कर भी देखा जाता है . ऐसी परिस्थिति में न जाने आज भी  कितनी ही ऐसी मासूम होंगी जो इस मासिक धर्म की प्रक्रिया को शर्म से  एक अपराध की तरह देखती होंगी.

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