मैं एक कवयित्री हूँ I कविता पढ़ने का शौक बहुत था लेकिन मंच पर जा कर कविता पढूंगी, ऐसा कभी सोचा नहीं था I पढ़ते-पढ़ते कभी-कभी शौक चर्रा जाता था तो, एकाध चिड़िया और गुडिया जैसी कविताओं का लेखन भी कर लेती थीI

हालाँकि ये सच है कि बचपन में मन में ख्याल ज़रूर आता था कि काश! एक दिन मैं भी बड़ी कवयित्री बनू और मंच पर जाकर कविता पढूं और लोग वाह-वाह करें I लेकिन साहब, जब भी कभी कविता लिखने का जूनून शुरू होता था तो, पिताजी की गुस्से से भरी आँखें देखकर, सारा जूनून ठंडा हो जाता था I अब उनका गुस्सा भी लाज़मी ही थाI भला कौन माँ-बाप चाहेंगे कि उनकी लड़की काँधे पर थैला लटकाए, आँखों पर मोटा चश्मा चढ़ाये कागज़ पर कालिख पोतती फिरे I उन्हें तो लगता था कि वो काम सीखो, जो शादी के बाद घर गृहस्थी चलाने में काम आयेI खैर ये तो माता-पिता के मन की बात थी I लेकिन मेरा मन तो टीवी पर जब भी कवि सम्मलेन आता था, तो उसमें सजी-सवरीं कवयित्रियों को देखकर डोलता था I कल्पना के झूले में उड़ान भरने लगता था I लेकिन सपने भी तो नेताओं के वादों की तरह ही होते हैं, इतनी जल्दी कहाँ पूरे होते हैं या यूँ कहिये कि कभी-कभी  ही पूरे होते हैं या नहीं भी पूरे होते I 

लेकिन मुझ पर किस्मत थोड़ी सी मेहरबान हुई थी I वो भी तब जब माता-पिता ने अपने सर का बोझ उतारने के लिए एक भले परिवार में मेरी शादी करा दी I हमारे देश की तो यही परम्परा है कि हर कोई अपनी परेशानी किसी दूसरे को सौपना चाहता है……अब शादी में जो पंडित ने सात वचन भरवाए उन पर तो मैंने कुछ खास ध्यान नहीं दिया था I लेकिन अपनी अनुभवी सहेलियों की अनमोल सलाह पर मैंने पतिदेव से शादी की रात ही अपने सात वचन अलग से और  अच्छे से भरवाए I अब बाकि छ वचन थोड़े निजी हैं, वो आपको नहीं बता सकती  लेकिन हाँ, एक वचन मैंने बड़ी ही कटिबद्धता के साथ भरवाया I मेरा सातवाँ वचन था कि “देखो जी ! हर रोज़ मेरी एक कविता सुनोगे और उस पर वाहवाह ज़रूर करोगेI मुझे कविता लिखने और सुनाने से कभी नहीं रोकोगे I पतिदेव बेचारे भगवान् जी की गाय की तरह सीधे-सादे निकले और मेरी हर बात को आसानी से मान गए I शादी के अगले ही दिन से कविताओं का सिलसिला शुरू हो गया I मैं कविता सुनाती रहती और वो वाहवाही करते रहते I उसी जोश में मैंने एक दिन अपनी एक कविता एक पत्रिका में भेज दी I अब उपरवाले का आशीर्वाद कहें या अपना हुनर कि, कविता पत्रिका में छप भी गयी I एक कविता छपने के बाद से ही मेरा नाम भी कवित्रियों की श्रेणी में आ गया I फिर फेसबुक बाबा का आशीर्वाद प्राप्त हुआ और धीरे-धीरे मेरी कवितायेँ लोगों तक भी पहुँचने लगीं I 

आखिरकार वो दिन भी आ गया जिसका सपना वर्षों से संजोया हुआ था I एक कवि सम्मेलन में मुझको भी मंच पर कविता पढने का निमंत्रण आया I निमंत्रण पत्र देखकर पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थेI कवि सम्मलेन की तैयारी जोर-शोर से शुरू हो गयी I सबसे पहले तो पार्लर में बुकिंग करायी I भई, मंच पर खूबसूरत नज़र आना भी तो ज़रूरी था I फिर पतिदेव के पैसों से एक महंगी सी साड़ी खरीदी और मन ही मन सोचा कि आज कवि सम्मेलन से जो पैसे मिलेंगे, उनसे ये सारा खर्चा वसूल तो हो ही जायेगाI साथ ही माँ और पिताजी को भी बताउंगी कि काश! आप लोगों ने मुझे पहले सपोर्ट किया होता, तो अब तक तो मैं बहुत बड़ी कवयित्री बन गयी होती I

पार्लर में लीपा-पोती कराके, आखिरकार मैं पहुँच ही गई कवि सम्मेलन में I सजा-धजा मंच बड़े-बड़े कवियों से सुसज्जित था I सामने बैठी जनता भी बड़े ही जोश के साथ हर कवि का मनोबल बड़ा रही थी I मंच पर बैठे कवि अपने आप को किसी बादशाह से कम नहीं आंक रहे थे I जिस किसी की बारी आती वो सीना चौड़ा करके ऐसे जाता, जैसे राजा जनक के दरबार में धनुष तोड़ने जा रहा होI सभी पुरुष कवियों के बीच मैं मंच पर अकेली कवयित्री थी I उस दिन एहसास हो रहा था कि भारत में स्त्रियों की साक्षरता और प्रगति पर सचमुच अभी भी बहुत कार्य करने की ज़रूरत है I खैर अब वो घड़ी भी आ गयी, जब मंच संचालक ने मुझे कविता पाठ के लिए मंच पर आमंत्रित करते हुए बड़े ही भारी-भरकम शब्दों में मेरी तारीफों के पुल बांधने शुरू किये I मंच संचालक के मुंह से अपने बारे में इतनी तारीफ सुनकर तो ऐसा लगा रहा था, जैसे डायनासौर की तरह में भी कवयित्रियों की आखिरी प्रजाति हूँ I अगर आज श्रोताओं ने मुझे नहीं सुना तो फिर न जाने उन्हें ये मौका फिर कभी नसीब होगा भी या नहीं I मैं मंच पर पहुँची तो श्रोताओं ने भी खूब जोर से तालियाँ बजा दी I मैंने कविता पाठ किया, सबने खूब सराहा भीI धीरे-धीरे कवि सम्मेलन समापन पर आ गया I अब हर कवि की तरह मेरी भी निगाह आयोजक की ओर ताक रही थी I तभी आयोजक महोदय मंच पर तशरीफ़ लाये I बारी-बारी उन्होंने सभी कवियों को बुलाया I एक शाल और एक लिफाफे के साथ सभी का सम्मान किया I मेरा दिल तो चाहा कि उसी समय लिफाफे के अन्दर झांक कर देखूं, लेकिन शिष्टाचारवश ऐसा करना मैंने उचित नहीं समझा I मन बहुत ही प्रफुल्लित था I सोच रही थी कि आज घर जाकर सबको बताउंगी कि कविता लिखना कोई निठल्लों का काम नहीं है I ये भी एक ऐसी योग्यता है, जिसके बल पर भी धन कमाया जा सकता है I

जैसे ही कवि सम्मेलन समाप्त हुआ, सब लोग अपने-अपने घर जाने लगे I मैं भी झट से बाहर निकलकर टैक्सी खोजने लगी I कुछ देर बाद ही टैक्सी आ पहुँची और मैं उसमें बैठ गयी I टैक्सी में बैठते ही मेरी नज़र फिर से लिफाफे पर पड़ी I मन को बहुत रोका कि घर पहुंचकर पतिदेव के हाथों में लिफाफा पकड़ा कर, उन्हें एक प्यारा सा धन्यवाद कहूँगी I आखिर मेरी कविताओं में उनका भी तो योगदान है I लेकिन मन कहाँ मानता है, मन की कशमकश के बाद आखिर मैंने लिफाफा खोल ही लिया I लिफाफा खोलते ही चेहरे की सारी ख़ुशी उड़न छू हो गयी I लिफाफे के अन्दर 101 रुपये के साथ छोटा सा धन्यवाद का परचा रखा हुआ था I जिसमे लिखा था “आपने आकर मंच की शोभा बढ़ाई, बहुत-बहुत धन्यवाद”I परचा पढ़कर कलेजे पे कटार सी चलने लगीI हाय राम! सिर्फ 101 रुपयेI इससे ज्यादा तो यहाँ आने जाने में खर्च हो गए I उस पर 5000 रुपये की साड़ी भी और 2500 का पार्लर का खर्चा I मन ही मन खुद को खूब कोसा I माता-पिता की याद भी आई कि अच्छा ही था जो मना करते थे I आखिर ये कविता लिखने से भला मिलता ही क्या है? घर जाकर क्या मुंह दिखाउंगी सबको? रास्ते भर इसी सोच में डूब रही I

घर पहुँची तो पतिदेव को सारा किस्सा कह सुनाया और दर्द आँखों से आंसुओं में बहाया I पतिदेव ने मुस्कुराते हुए अपनी बाहों में लिया और समझाया “सच्चा सुख इसमें नहीं कि पैसे कितने मिले, ये सोचो कि तुम्हें अपना मनपसंद काम करने में ख़ुशी कितनी मिलीI आज तुम्हारा वर्षों का सपना सच हुआ है I और दुनिया में बहुत कम लोग होते हैं, जो अपने मन की कर पाते हैं I” पतिदेव के मुंह से ये शब्द सुनकर सारी तकलीफ़ दूर हो गयी I और बस उस दिन से,  फिर से कविता लिखने का सिलसिला शुरू हो गया जो आजतक बदस्तूर जारी हैI सच! पैसा भले न हो लेकिन कला मन को सुकून ज़रूर देती है I

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